नकली वर्जिनिटी एक कुंठित सोच है, इसे अपनाकर स्त्री खुद को अपमानित करती है

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निधि नित्य

हाइमन (hymen), वजाइना (vagina), वर्जिनिटी (virginity) फीमेल बॉडी (female body)। लड़की का चरित्र इन शब्दों से जुड़ा हुआ है।

‘नो हाइमन नो डायमंड’। ऐसा लिखा हुआ है अमेरिका की बेस्ट हायमन सेलिंग साइट पर। मतलब की यदि हायमन नही है तो डायमंड रिंग भी नही है। अर्थात जिस लड़की के पास हायमन नही है उससे विवाह भी नही करना है। गोया की अमेरिका जैसा विकसित देश भी हायमन में फंसा हुआ है। साफ तौर पर कहा जाए तो आज भी विश्व का सारा समाज अपनी सोच को हायमन में पैक करके वजाइना में सुरक्षित रखकर तीसरी दुनिया में प्रवेश कर रहा है।

शादी के पहले हायमन का होना इतना ज़रूरी है कि आज नकली हायमन बेचने वाली सैकड़ो कंपनियों से, लाखों लड़कियां हायमन खरीद कर इस्तेमाल कर रही हैं। ये सभी लडकियां जैसे वाइट् बेड शीट टेस्ट में पास होने के लिए चीटिंग चिट बना रही हैं।

सदियों से सारा समाज स्त्री की पवित्रता, मर्यादा और संस्कार के इर्द गिर्द बस वजाइना और हायमन का जाल बुनता रहा है। हमारे इतिहास की कहानियों में भी सारा चक्र इसी पर केंद्रित रहा है। विवाहित स्त्री का पर पुरुष के बारे में सोच लेना मात्र उसे अपवित्र बना देता था।

इंद्र, ऋषि का रूप रखकर ऋषि पत्नी के साथ एक रात बिताता है। और श्राप ऋषि पत्नी को दिया जाता है कि वो पराये पुरुष के साथ हमबिस्तर हुई, अपवित्र हुई है और क्यों उसके सतीत्व में इतना बल नही था कि वो इंद्र को पहचान पाती। इसलिए धोखा देने वाले इंद्र को नही बल्कि ऋषि पत्नी आहिल्या को पत्थर का हो जाने का श्राप मिलता है।

द्रोपदी को वरदान दिया जाता है की प्रत्येक पांडव के साथ एक माह सहवास करने के बाद जब वह रजस्वला होगी तो (मतलब उसके पीरियड्स होते ही) वो फिर से पवित्र हो जाएगी और वरदान स्वरूप उसे हायमन मेम्ब्रेन पुनः कुंवारी कन्या की तरह प्राप्त हो जाएगी।

मतलब सारा सिस्टम पुरुष के मन और तन की संतुष्टि के लिए रचा गया जिसमें वेश्या के पास जाने वाला या एक से अधिक पत्नी रखने वाला या स्त्रियों से संबंध रखने वाला पुरुष तो पवित्र होगा लेकिन कोई स्त्री यदि ऐसा करे तो नियम अलग होगा।

हम एक ऐसे दोगले समाज मे रहते हैं जहां देवी की योनि की मंदिर में स्थापना की जाती है और पूजा की जाती है। प्रसाद स्वरूप लाल कपड़े के टुकड़े दिए जाते हैं जिसे लोग अपने पर्स में रखते है। और वही समाज पीरियड्स के दौरान घर की स्त्री को मंदिर ,रसोई और अन्य स्थानों में प्रवेश नही देता है। (हालांकि उसका कारण धार्मिक ना होकर हाइजीन और स्त्री को आराम देना होता तो तर्कसंगत होता)।

अब सवाल यह नहीं है पूर्व मानसिकता क्या थी? सवाल यह है कि आज की आधुनिक लड़कियां जो ऑनलाइन हायमन खरीदने की सोच और स्मार्टनेस रखती है क्या वो खुद इस सोच से ग्रसित नही हैं? ऐसा करके वो खुद भी कहीं ना कहीं इस मानसिकता को सपोर्ट करती हैं कि वर्जिन होना या हायमन का होना चरित्र को आदर्श बनाता है। ये कुंठा उनको खुद भी है कि पति या प्रेमी के आगे वे स्वयं को इस तरह से कुँवारी साबित करके उसका विश्वास व सम्मान जीत सकती हैं ।
नकली हायमन का बेचा और खरीदा जाना कुंठित सोच का नमूना है और इसमें सबसे पहली ग्राहक स्त्री खुद है, जो स्वयं को अपमानित कर रही है।

क्यों आवश्यक है पति या प्रेमी के आगे ये साबित करना कि कन्या कुँवारी है? क्यों ये मालिकाना अधिकार पति या प्रेमी को है? कि वो प्रेम करने के पूर्व ये निश्चित कर ले कि कन्या का शरीर किसी और ने छुआ है या नही।

यदि वास्तव में हायमन का होना वजाइना की इज़्ज़त निश्चित करता है तो फिर किसी पुरुष का कुंवारा होना भी उतना ही ज़रूरी होना चाहिए। स्त्री मात्र वजाइना नहीं है। और अगर हायमन का होना स्त्री के लिए आदर और सम्मान को बढ़ाता है तो ये मान लिया जाना चाहिए कि स्त्री मात्र वजाइना है और कुछ नही। ना उसका कोई अस्तित्व है, ना कोई और पहचान है, ना कोई भावना है, ना कोई मन है और ना ही कोई और रूप है।

जैसे एक एडल्ट पुरुष को ये हक़ है कि वो कब और किसके साथ अपनी वर्जिनिटी को शेयर करेगा वैसे ही एक लड़की या स्त्री को भी हक़ है कि वो कब और किस उम्र में किसके साथ अपनी वर्जिनिटी को शेयर करेगी। साथ ही वो इस बारे में सवाल ना किये जायें ये भी उसका व्यक्तिगत अधिकार होगा।

हो सकता है ये बात कहने के बाद मेरे बारे में लोगो की राय बदल जाए पर इस बात से मुझे फर्क नही पड़ता कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं। मुझे फर्क इस बात से पड़ता है कि मैं अपने बारे में क्या सोचती हूँ और एक स्त्री के रूप में, मैं खुद को कितना सम्मान और स्थापित्व दे पाती हूँ। मुझे समस्या है सील टूटने जैसे घटिया शब्दों से। इस लेख में मेरी कोशिश है कि एक स्वतंत्र लेखिका के रूप में मैं अपनी कलम को न्याय दे सकूँ।

स्त्री पर किसी समाज का ,जाति का, परिवार का और ना ही पिता, पति या प्रेमी का अधिकार है। बल्कि प्रथम अधिकार उसका स्वयं का है। स्वयं पर रत्ती भर भी अधिकार यदि कोई स्त्री किसी को भी देती है तो ये उसका स्वयं का निर्णय और इच्छा है।

अब वक़्त है सोच को बदलने का। लड़कियों को साहस देने का और लड़कों को समझाने का की हायमन का होना या ना होना या वर्जिन होना जैसे मिथ से कहीं ऊपर स्त्री की गरिमा है। आत्मसम्मान है। हायमन मेम्ब्रेन ब्रेक होने के सेक्स के अलावा स्पोर्ट्स जैसे बहुत से और भी कारण हो सकते हैं।

यदि किसी भी लड़की का चरित्र हायमन के होने या ना होने से निश्चित किया जाता है तो ये हक़ है किसी भी स्त्री को कि वो भी अपने पति या प्रेमी का चरित्र परीक्षण करे और पूछ सके-

आर यू वर्जिन ??