यौन उत्पीड़न का शिकार हों तो खुलकर बोलें, अपराधबोध और शर्मिंदगी में जीना बंद करें

Sexual harassment in India

तारा शंकर

फेसबुक पर स्त्री मुद्दों पर लिखने के दौरान बहुत सारी महिला दोस्तों ने छेड़खानी और सेक्सुअल हरैस्मेंट के बारे में मुझसे अपनी आपबीती शेयर की। कुछ ने तो अपने साथ घटित बलात्कार की भी बात साझा की जिसको वो अब तक गोपनीय रखे हुए थीं! क्यों? शायद इसलिए कि उनके अंदर का बोझ, गुस्सा और उस घटना के समय तत्काल कुछ न कर पाने का मलाल कुछ कम हो सके।

कई महिला दोस्तों ने बताया कि उनके साथ जब छेड़खानी हुई तो जब तक वो कुछ समझ पातीं, तब तक प्रतिक्रिया का समय निकल गया और रिएक्ट नहीं कर सकीं, अपना विरोध नहीं जता सकीं या उसको दो थप्पड़ नहीं लगा सकीं। इसलिए आज भी कहीं न कहीं ऐसा न कर पाने का मलाल और अपराधबोध उनके मन में है! शायद शेयर करके वो इसे ही कुछ कम करना चाहती थीं। कुछ दोस्तों ने पूछा कि मैं विरोध क्यों नहीं कर सकी? ऐसा कभी आइन्दा हो तो क्या करना चाहिये और अब तक जो अपराधबोध और मलाल है उसका क्या किया जाये?

मेरी सलाह और मेरा मानना ये है कि जो भी महिला साथी इस तरह की परिस्थिति में हैं अथवा कभी ख़ुद को पायें तो कुछ बातों की मन में गाँठ बाँध लें:

पहला तो ये कि आपके साथ जो हो चुका है उसपे पछताने, अपराधबोध के बोझ से दबा महसूस करने, बेइज्ज़ती महसूस करने अथवा शर्मिंदा होने की ज़रुरत नहीं क्योंकि ग़लत आपने नहीं किया, बल्कि आपके साथ ग़लत हुआ है! इसलिए दूसरों की घटिया करतूत की सज़ा ख़ुद को तो बिल्कुल न दें। ये सब उसके लिए छोड़ दो जिसने तुम्हारे साथ ऐसा किया है।

दूसरा, ये बात जान लो कि समाज ने आपके शरीर की कीमत तय कर रखी है, आपकी वैल्यू उन्होंने परिवार-जात-बिरादर-समाज की इज्ज़त से बाँध रखी है, आपकी स्वतंत्र पहचान को उन्होंने आपकी देह से अटैच कर रखा है! ऐसी किसी घटना पर आप शर्मिंदा, अपराधबोध अथवा बेइज्ज़त महसूस करके उन्हीं को सही साबित कर रही हो! इसीलिए समाज ऐसी किसी घटना पर बकवास करता है कि ‘उसकी इज्ज़त लुट गयी’ ‘वो जिंदा लाश बन कर रह गयी है’ ‘अब जीकर क्या करेगी’ ‘कौन करेगा उससे शादी’ ‘कैसे मुँह उठाकर जी पायेगी वो बेचारी’ इत्यादि… और इसे अपने ऊपर अप्लाई भी कर लेती हो! क्यों भला?

इसलिए पहले इन बेमतलब की बातों को अपने ऊपर बेअसर कीजिये! पहले से अधिक सर ऊँचा करके चलें, नज़रें मिलाकर चलें, सीना तान के चलें क्योंकि ग़लती आपने नहीं किसी और ने की है! बेचारा-बेचारी इस समाज की सोच है, तुम नहीं हो! इस फ़र्ज़ी इज्ज़त के बोझ को उतार फेंकिये। अगर तुम जिंदा हो, ख़ुश हो, बेख़ौफ़ हो तो इज्ज़त-पिज्ज़त की किसे परवाह!

तीसरे, आप छेड़खानी करते समय विरोध क्यों नहीं जता सकी इसका का भी उत्तर तुम्हारी सोशल कंडीशनिंग में छिपा है! उस वक़्त तुम शर्म, डर, ‘बेइज्ज़ती’, विरोध करने के बाद कोई साथ नहीं खड़ा हुआ तो वाली सोच, मैं ख़ुद को सही साबित न कर पायी तो टाइप की सोच के एक साथ दिमाग़ में चलने के कारण विरोध नहीं कर सकीं। तब? कोई बात नहीं! आइंदा के लिए सतर्क हो जाओ, भीड़ में हो तो कूट देना, हल्ला मचा देना, बवाल काट देना वहीं लेकिन शर्मिंदगी, बेइज्ज़ती टाइप का मत महसूस करना बिल्कुल भी! क्योंकि विरोध करोगी तो भीड़ में बहुत से अच्छे लोग भी होते हैं जो तुम्हारे साथ खड़े हो जायेंगे और कुछ तो अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए भी तुम्हारे पक्ष में खड़े हो जायेंगे।

चौथे, ऐसी घटना के बाद आपको अगर कुछ महसूस ही करना है तो वो है गुस्सा और फिर उस गुस्से को चैनलाइज़ करना है अपने साथ ऐसा होने पर चुप न रहने की ख़ुद से प्रॉमिस द्वारा, अन्य किसी महिला दोस्त के साथ ऐसा न होने देने की कसम द्वारा।

पाँचवा, कई बार होता है कि ऑफेंडर तुमसे शारीरिक, सामाजिक या फिर पेशे की हैसियत से मजबूत है और तुम तुरंत प्रतिक्रिया नहीं कर सकी या सच कहो तो डर गयीं, तो भी कोई बात नहीं, बाद में ही सही हिम्मत जुटाओ और पुलिस में जाओ, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री, सोशल मीडिया, न्यूज़ मीडिया सब जगह बवाल मचा दो लेकिन छोड़ो मत! घर वाले साथ न दें तो अकेले भिड़ जाओ! लेकिन जिंदा लाश, इज्ज़त लुटी, शर्मिंदगी की मारी बनकर अपराधबोध मत ढोना!

छठां, अक्सर ऐसे लोग जान-पहचान या रिश्तेदार-फैमिली के लोग होते हैं! ऐसे में तो और भी ज़ोर से बोलो! सिर्फ़ अपने बारे में नहीं अपने जैसी लाखों लड़कियों के बारे में सोचो। बोलोगी तभी तुम्हारे साथ माँ-बाप या कोई भी खड़ा होगा वरना सब तुम्हें ही चुप रहने की सलाह देते रहेंगे।

सातवाँ, छेड़खानी, सेक्सुअल हरैस्मेंट, बलात्कार इत्यादि से सम्बंधित लेटेस्ट कानूनी प्रावधानों व प्रक्रियाओं की जानकारी रखें, इससे भी संबल मिलता है।

अंतिम बात, ये कि समाज हमेशा से तुम्हारे शरीर से ‘इज्ज़त’ ‘पहचान’ जोड़कर उसकी ‘कीमत’ तय करता है! इसी ‘कीमत’ के आधार पर तुम्हारी सेक्सुअलिटी, मोबिलिटी, शादी, संपत्ति सब कुछ कण्ट्रोल करता है समाज और मौका मिलते ही कैश करने की भी कोशिश करता है। इसी कीमत को ये समाज छेड़खानी हो जाने, लैंगिक शोषण या बलात्कार हो जाने की स्थिति में ‘इज्ज़त लुट’ जाना कहती है! और जब तब तुम भी ऐसा ही मानती रहोगी, तब तक तुम उन्हीं को सही ठहरा रही होगी और तब तक तुमको अपराधबोध भी होगा, शर्मिदगी भी होगी, आत्महंता फ़ीलिंग भी आएगी, पहचान का संकट भी आयेगा! इसी ‘कीमत’ ‘इज्ज़त’ को सबसे पहले दिमाग़ से निकालो! तुम्हारा अस्तित्व, तुम्हारी आज़ादी इसका मोहताज़ नहीं!


तारा शंकर दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से सोशल जियोग्राफी की पढ़ाई की है और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर पीएचडी की है। वे सोशल मीडिया पर जेंडर आधारित भेदभाव पर लगातार मुखर रूप से लिखते रहते हैं।


LEAVE A REPLY