बलात्कार पर मुआवजा क्या इंसाफ के लिए उठती आवाज़ दबाने का जरिया बन गया है?

Maitreyi Pushpa on rape victim compensation

मैत्रेयी पुष्पा

जुर्म और इंसाफ़ तराज़ू के दो पलड़ों में रहते हैं और हम हर हालत में जुर्म के बरअक्स इंसाफ़ चाहते हैं। इंसाफ़ होता है तो दिखता भी है जैसे कि किसी की ज़मीन को दूसरे के क़ब्ज़े से छुड़वाने को हम इंसाफ़ मानेंगे। किसी छीने हुये घर पर पुन: पुराने मालिक की दावेदारी होना बेशक इंसाफ़ में आयेगा। ज़मीन मकान ही नहीं किसी लड़की या स्त्री के अपहरणकर्ता को सजा देना और स्त्री को मुक्त कराना भी इंसाफ़ है। साथ ही चोरी डकैती में गया रुपया पैसा, गहना गुरिया और क़ीमती सामानों को बरामद करने के बाद उसके मालिक को लौटा देना भी न्याय ही है। ये न्याय इंसाफ़ पुलिस के ज़रिये आयें, कचेहरी के द्वारा दिये जायें या पंचायतों में मुक़र्रर किये जायें जहां स्त्री और पुरुष की आवाज़ बराबरी से सुनी जाती है।

इन सारे इंसाफ़ों के बाद हमारी नज़र में जो प्रमुख अपराध आता है- वह है किसी लड़की या औरत से बलात्कार। पुलिस से लेकर कोर्ट कचहरियों में इस अपराध के लिये भी क़ानून हैं, कड़े से कड़े क़ानून हैं। बलात्कार की घटना घटते ही हमारी नज़र पुलिस पर टिक जाती है। अगर पुलिस अपराधियों को खोज लेती है तो फिर हम कोर्ट से अपनी आशायें जोड़ते हैं। अपराधी को सजा मिल जाती है तो हम मान लेते हैं कि बलात्कृता को मिल गया इंसाफ़।

मगर देखने में यह भी आ रहा है कि सालों पहले से ही बलात्कार करने का ढंग बदल गया है। मर्दों ने बलात्कार को अकेले का शग़ल मानना बन्द कर दिया है। शायद सामूहिक यौनिक आनन्द ज़्यादा पैशाचिक बन जाता हो। दूसरी बात कि लड़की या औरत चार छ: मर्दों के घेरे और गिरिफ्त से छूट कर भाग नहीं पायेगी, यह भरोसा रहता है, तीसरे अगर पकड़ा-पकड़ी होने भी लगी तो पुलिस किस किस को कहाँ कहाँ ढूँढने जायेगी। ये सब औरत के शिकारियों के इरादे होते हैं जो समाज में खूब फल फूल रहे हैं। ये सामूहिक बलात्कार के वहशी हर हाल में लड़की के इस्तेमाल के बाद उसे मारने की कोशिश करते हैं। ज़िन्दा लड़की उनके लिये ख़तरे की घंटी होती है, वे ख़तरनाक इरादों वाली को क्यों छोड़ें? अब पुलिस क्या कर लेगी, मारे पीछे पुकार ही करते रहो।

माँ-बाप भाई-बन्धु पुकार करते हैं अपनी बेटी के लिये इंसाफ़ माँगते हैं। कैसा इंसाफ़ कौन-सा इंसाफ़ वे माँग रहे हैं यह भी एक सवाल है। क्या अपराधियों का जेल जाना और सजा हो जाना ही इंसाफ़ है? या बेटी के बदले सरकार जो लाखों का मुआवज़ा देती है, घर देती है घर के एक सदस्य को नौकरी दे देती है, यह मृत लड़की के लिये इंसाफ़ है? अपराधियों को फाँसी पर चढाकर समाज में भयानक सजा का सन्देश देना इंसाफ़ है?

इन सवालों के जबाव आप अपने मतानुसार कुछ भी दे सकते है लेकिन मेरे लिये इन इंसाफ़ों में से एक भी इंसाफ़ नहीं है।इंसाफ़ मृत लड़की को कैसे मिला? बेटी के बदले जो मिला घरवालों को मिला। वह तो दरिन्दों के हाथ वीभत्स बलात्कार की पीड़ा झेलती हुयी मौत के मुँह में चली गयी। यह भी कि इसे इंसाफ़ वे माँ बाप मान सकते हैं जिनकी वह बेटी थी उन्होंने मुआवज़े को लेकर और दरिन्दों को कड़ी सजा दिलाकर चैन की साँस ली। सरकार भी सहायता में पीछे नहीं रहती, मुआवज़ा आगे कर देती है चुप रखने का ज़रिया।

जब निर्भया के अपराधियों को फाँसी की सजा हुयी थी तो समाज में विजयघोष सा हुआ था। बहुत आशा जगी थी और लोगों में ‘इंसाफ़ इंसाफ़ ‘ की ध्वनि गूंजी थी। न्यायालय इंसाफ़ का मंदिर है और रहेगा। मगर कितने दिनों लोग इसी असमंजस में रहे कि फाँसी मांफ तो नहीं हो जायेगी। तारीख़ें बदल रही थीं और फाँसी टल रही थी, इंसाफ़ दूर की कौड़ी लग रहा था। मगर एक दिन उन दरिन्दों को फाँसी दे दी गयी। यही निर्भया की जीत मानी गयी और यही उस मृत लड़की के लिये इंसाफ़ हुआ। इंसाफ़, हमने और आपने मान लिया ।

फिर क्या हुआ?

निर्भया के बलात्कारियों और जघन्य हत्यारों के फाँसी चढ़ जाने से कितना क्या बदला? उस सूली के डर से क्या बलात्कार बन्द हुये? क्या बलात्कृताओं की हत्यायें बन्द हुयीं? अगर यह सब बन्द नहीं हुआ तो क्या इंसाफ़ बेअसर साबित हुआ? फिर यह कैसा इंसाफ़ मिला? क्या हम हाथरस और बलरामपुर की बलात्कृताओं के लिये निर्भया के इंसाफ़ को इंसाफ़ मान सकते हैं? हाँ मुआवज़े को ही इंसाफ़ मान लें तो बेशक मान सकते हैं।

इंसाफ़ एक व्यक्ति के लिये नहीं होता इंसाफ़ सामाजिक पटल पर घटित होता है और होना चाहिये। निर्भया का इंसाफ़ भी तब अपनी जगह इंसाफ़ है जब ये बलात्कार और हत्याओं का सिलसिला रुक जाता या कम ही हो जाता।

इंसाफ़ हमारे समाज से अभी बहुत दूर है, इसके क़रीब जाने के लिये तो सामाजिक अनुशासन की ज़रूरत है। यहाँ मुआवज़े की जगह मर्दों के लिये नैतिक शिक्षा की ज़रूरत है, बहुत ज़रूरत है क्योंकि मर्दाना समाज वहशी समाज में लगातार बदलता जा रहा है ।और हम निस्सहाय से चारों ओर देख रहे हैं, बस इंसाफ़ इंसाफ़ का शोर सुन रहे हैं…

  Maitreyi Pushpa
मैत्रेयी पुष्पा

नब्बे के दशक में जिन रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और जिन्हें पाठकों ने भी हाथों-हाथ लिया, मैत्रेयी पुष्पा का नाम उनमें प्रमुख है। उन्होंने हिन्दी कथा-धारा को वापस गाँव की ओर मोड़ा और कई अविस्मरणीय चरित्र हमें दिए। यह आलेख उनकी फेसबुक वॉल से साभार।