मैत्रेयी पुष्पा का आलेख, ‘शोषण पर चुप्पी को शह देने वालों से सावधान रहें’

मैत्रेयी पुष्पा

मैत्रेयी पुष्पा

मैत्रेयी पुष्पा अपने निर्भीक लेखन और बेबाकबयानी के लिए हमेशा जानी जाती रही हैं। वह एक बार जो ठान लेती हैं, सो ठान लेती हैं, फिर चाहे कितना भी विरोध होता रहे। अपने इस आलेख में वे स्त्रियों को उस खतरे से सावधान करती हैं जिसमें विक्टिम स्त्री का हौसला तोड़ने के लिए उसके चारो तरफ खतरे का घेरा बनाकर पेश किया जाता है।

मैं अक्सर यह कहा करती हूँ कि जब स्त्रियाँ मौक़ा देखकर बरसों पुराने छेड़खानी और सहमति से बने सम्बंध या बलात्कार की शिकायतें उठाती हैं तो उनकी बातें संदेह पैदा करती हैं। पूछा जा सकता है कि आपने उसी वक्त खुलासा क्यों नहीं किया?

कुछ दिन पहले अपने पुराने दिनों के अत्याचारों को खोलने के लिये स्त्रियों ने ‘मी टू‘ नाम की मुहिम चलाई थी लेकिन वह मुहिम कुछ दिनों की ही मेहमान रही और फिर भरे ग़ुब्बारे की तरह फुस्स हो गयी क्योंकि सम्मानित महिलायें सबूत नहीं जुटा पायीं। अब इस सवाल के लिये हमारे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जगह ही नहीं बनाई। मर्दों की मनमानी के लिये यह कहने न कहने का ग़ैप अच्छी ख़ासी सुविधा बनाये हुये है।

हमारे तथाकथित शुभचिंतक पुरुष तमाम ऐसी दलीलें पेश कर देते हैं जो साहसी से साहसी महिला का इरादा तोड़ देती हैं। और विक्टिम स्त्री के चारों ओर उन ख़तरों का घेरा बना दिया जाता है जिन में फँसकर वह डर जाये, जैसे घर वाले पढ़ाई छुड़ा देंगे, मेरी बदनामी होजायेगी तो शादी कैसे होगी? अगर मैं शादीशुदा हूँ तो मेरा पति और पति का परिवार क्या कहेगा? मैं नौकरी कर रही हूँ और छेड़खानी मेरे बॉस ने की है, खुलासा करूँगी तो मेरी नौकरी का क्या होगा? इतनी मुश्किल से मिली नौकरी अपने दिल से उठी इस चीख जैसी आवाज़ के कारण गँवा दूँगी?

ऐसे न जाने कितने कितने ख़तरे हैं जो हमारे मर्दाने समाज ने एक औरत के लिये नियमों में शामिल किये हुये हैं। ज़ाहिर है स्त्री ख़तरों से डरती है। अपने भविष्य को दांव पर नहीं लगाना चाहती। दूसरे शब्दों में कहें तो मर्द की शिकार बने रहने को तैयार/ मजबूर हो जाती है। सेफ़ लाइफ़, सुरक्षित नौकरी और ऊँचाई छूता कैरियर। वाह क्या बात है। चुप्पी सेफ़ गार्ड है। मान, आत्मसम्मान और स्वाभिमान जैसे शब्द कहने में अच्छे लगते हैं, व्यवहार में क़तई नुक़सानदेह हैं, इन्हें भूल जाना ही अच्छा। कैरियर की सीढ़ियाँ आत्मा की आवाज़ को थामकर नहीं चढ़ी जा सकतीं क्योंकि हमारे समाज के ज़्यादातर विभागों के बॉस मर्द हैं।

तय रहा ‘स्वतंत्रता के ख़तरे और ग़ुलामी का आनंद’ राजेन्द्र यादव का कहा सुना। बेशक हमारे समाज में स्त्रियाँ खतरे उठाने से डरती हैं। लाभ, लोभ और लालच उनके भय का कारण है। यह भी सच है कि जो भयभीत रहता है उसका मनमाना शोषण किया जा सकता है। लाभ के लालच में मनुष्य शिकार बनते दिख जायेगा। मगर आपको सोशल स्टिग्मा जैसी कुरीति पर प्रहार करना है। चुप्पियों को चुनौती देनी है।

प्यारी बहनों, जानती हो कि अत्याचार सहना सबसे बड़ा अपराध है और अत्याचार पर ज़ुबान न खोलना अत्याचारियों की पीढ़ियाँ बढ़ाते जाना है। आज जो आप के शोषण पर आपकी चुप्पी को शह दे रहे हैं, वे स्त्री को शिकार करने वालों के ही संगी साथी हैं। ये लोग तुम्हारी तरह तरह की मजबूरियाँ गिनाकर तुम्हारे बढ़ते कदमों को रोकने की साज़िशों में शामिल हैं। ये तुम्हें ‘बेचारी‘ की तरह चाहते हैं और तुम्हें अबला मानकर तुम से मोहब्बत करते हैं। मगर ‘मैं चुप रहूँगी‘ वाली अदा यहाँ नहीं चलती, यहाँ तो सिर से कफ़न बांधकर निकलना पड़ता है।

स्त्री के साथ जब दुर्व्यवहार होता है यौनाचार होता है या ऐसी कोशिशें हेती हैं तो इस अपमान को खोलने और इस पर कड़ी से कड़ी प्रतिक्रिया देने में क़तई देर मत करिये। मर्द के पास बचने के कई कई रास्ते होते हैं। ऐसा नाका डालिये कि वह बचकर निकलने नहीं पाये। बहुत मुमकिन है कि वह आपके सिर ही इलजाम लगा दे अगर आप तुरन्त नहीं बोलीं तो उसे मौक़ा मिल जायेगा। आपको अपनी मुहिम को ज़िन्दा रखना होगा तभी तो वह उफान की तरह उठेगी और झाग की तरह बैठेगी नहीं।