महिला दिवसः हर बार हम अपने को छला-सा क्यों महसूस करती हैं?

International Women's Day 2020

एकता प्रकाश

सभी को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ ! ऐसे तो हर दिन ही महिलाओं का दिन हैं. हर दिन दिवस, जश्न और उत्सव है. ये हमारी-आपकी जिम्मेदारी बनती है कि कैसे सबके साथ मिलकर सबकी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं. इसकी पहले-पहल शुरुआत हमें अपने घर में पल्लवित संस्कारों से शुरू करनी होगी. अपने इंसान होने के एहसास के साथ। तभी ये महिला दिवस हर महिलाओं का दिवस होगा.

इस दिन हम महिलाओं के साहस, ताकत, जज़्बे तथा शक्ति को यादकर उनको सलाम करते हैं.

महिलाएँ अपनी सोच, साहस, और संघर्ष से दुनिया के लोगों, समाज, परिवार, अपने प्रति नजरिया बदलती आई है. सबकी प्रेरणा बनकर उसने दुनिया के सामने मिसाल रखी है. जीवन में आने वाली चुनौतियों का डटकर सामना किया, संघर्ष किये, फिर एक मुकाम हासिल किया. कहते हैं, “कैलेंडर बदलने के लिए भले ही पूरा साल चाहिए, लेकिन लोगों की सोच बदलने के लिये सिर्फ एक जज्बा चाहिए”.

अभी भी हालात बहुत ज्यादा बदले नहीं है.

एक समय था जब सिर्फ मर्दों का आधिपत्य और सत्ता कायम थी पर आज ऐसा नहीं है. जिन क्षेत्रों में पुरूषों की सत्ता थी, उन्होंने दखल दिया. पुलिस, आर्मी, एयरफोर्स, कर्मशियल पायलट, आटो ड्राइवर, रेलवे ड्राइवर, कैब चलाना, खेती करना, सरपंच, मुखिया, राजनीति, हर क्षेत्र में महिलाओं ने एकाधिकार का क्षेत्र पुरुषों का तोड़ा है. ये सभी पुरुषों के एकाधिकार वाले क्षेत्र थे.

लोगों का मानना था और पंरपरा थी कि महिलाओं का काम सिर्फ घर की देखभाल और घरेलू काम निबटाना होता है. पर अपने इरादे और सामर्थ्य से स्त्री ने सभी धारणाओं को गलत साबित किया. महिलाओं की प्रगति हमें देखने को मिल रही है और इसको और आगे ले जाने की जरूरत है.

पुरूषों को पितृसत्तात्मक मानसिकता से बाहर निकलकर महिलाओं के घरेलू कामों में हाथ जरूर बंटाना चाहिए. इससे महिलाओं के लिये घर-परिवार का काम आसान हो जायेगा. बच्चे की देखरेख, रोजमर्रा के कामकाज, परिवार की जिम्मेदारी एक साथ मिलकर उठानी चाहिए. जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों के कंधों पर समान हो. तभी समानता हमें देखने को मिलेगी.

बदलाव तो हो रहा मगर धीमी गति से

बदलाव की गति बहुत धीमी है. शहरों में लड़कियां स्कूटी, मोटरसाइकिल, कार सब कुछ चला रही हैं. पर गांवों में छोटे शहरों में लड़कियों को नहीं चलाने चाहिए जैसे सोच अब भी हावी है. जहाँ हम रहन-सहन की, पहनावे की, अपने मनपसंद कपड़े पहनने की अगर बात करे तो यहाँ रूप बदला बदला सा नजर आता है. महिलाएं अपनी सेहत के प्रति जागरुक हुई है. अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हुई है. जींस, टॉप, शॉर्ट्स सब पहन रहीं.

बिना भेदभाव के महिलाओं के द्वारा समान कार्य करने पर पुरुषों के समान वेतन प्रदान करना चाहिए, छोटे-बड़े हर कार्यस्थल पर समान वेतन की बात होनी चाहिये. दोनों के कामों को एक ही क्षमता, एक ही नजरिये से भुगतान हो. महिलाओं को मातृत्व अवकाश, क्रैच जैसी सुविधाएं भी प्रदान हो. सामाजिक स्तर पर नारी का सम्मान नहीं होना हमारे लिए शर्म की बात है. समाज में बदलाव तो आ रहे हैं पर कहीं न कहीं बहुत सारी कमियाँ मुंह चिढ़ाती नजर आती है.

इन बदलावों का क्या फायदा जहाँ माँ, बहन, बेटी और पत्नी का सम्मान ही न हो. छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें हम देख-सुनकर भी अनसुना कर देते हैं. मोबाइल पर धड़ल्ले से अश्लील वीडियो अपलोड होना, धारावाहिक में स्त्री को कमतर दिखाना, अश्लील पत्रिकाओं, गानों पर प्रतिबंध ना लगना. ये सभी बातें स्त्री को महज एक सेक्स ऑब्जेक्ट में बदल देती हैं. #MeToo कैंपेन चला पर असरदार नहीं रहा. हम देख सकते हैं कि #MeToo के खिलाफ जो आवाजें बुलंद हुई वो किनकी हुई वो हम सब जानते हैं.

कानून बने लेकिन अपराध कम नहीं हुए

महिलाओं का सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य सूचकांक पहले से बेहतर हुआ है. लेकिन महिलाओं के आधार को मजबूती प्रदान करने के लिए बात सिर्फ़ कायदे-कानून से नहीं बनेगी. जमीनी धरातल पर भी उनको लागू करना होगा.
कानून बनने के बावजूद दहेज, बलात्कार और छेड़छाड़ में इजाफा हुआ है. महिलाओं के प्रति होनेवाली अपराधों पर सरकार, और हमारा समाज दोनों ही अंकुश लगाने में नाकामयाब रहे हैं.

औरतों से सम्बन्धित कानूनों में बदलाव आया है. लेकिन उसका कोई असर नहीं हो रहा है. कानूनों से अपराध करने वालों में भय पैदा नहीं होता. कुछ लोग संगठित होकर आवाज भी उठाते हैं तो उनकी आवाजों को दबाने की पुरजोर कोशिश होती है. और पूरे तरीके से पर्दा डाल दिया जाता है.

”नेशनल क्राइम ब्यूरो” के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के साथ होनेवाली अपराधों की रिपोटिंग पहले से अधिक हो रही है. जबकि पहले अलग-अलग कारणों से ये रिपोर्ट कम दर्ज की जाती थी. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून, ऑनलाइन शिकायत प्रणाली, महिला हेल्पलाइन, और पैनिक बटन जैसी पहल के बावजूद महिलाएँ, छोटी बच्चियाँ, उम्रदराज औरतें हर महीने शिकार होती है.

बातों और गोष्ठियों से आगे बढ़ना होगा

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता:” जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता बसते है. स्त्रियों को देवी माना जाता रहा है, पर हकीकत क्या है? क्या आज के समय में ये प्रासंगिक है? क्या यह सम्मान सिर्फ पूजा-हवन तक ही सीमित है. घर हो या बाहर सम्मान ना के बराबर. और तो और उन पर होनेवाली फब्तियां, छींटाकशी हमें हमेशा दो-चार होना पड़ता है. अरे वो देखो माल जा रही है. वो आइटम जबरदस्त है जैसे बहुत सारे यदा-कदा सुनने को मिलते हैं.

प्रेमचंद कहते गये कि ‘स्त्री पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अंधेरे से’. श्रेष्ठ तो है पर कितना जीवन में आत्मसात किया उसे माना, निभाया, औरतों से जुड़ी गालियाँ, वक्त-बेवक्त कान में चुभती हैं. ये टीस हमारी सांसों के साथ आती है, साथ जाती है. लोगों को अस्वीकार्य है ये सब वे तो अपनी ही मनमानी करेंगे. अपने पुरुष होने का, श्रेष्ठ होने का, दंभ पालेगें. रौंदते आये है और रौंदेंगें अगली और उससे अगली पीढ़ी के आने तक. ये दोहे, ये कविताएँ, ये क्षणिकाएँ, स्त्री विमर्श के नाम पर होने वाली काव्य-गोष्ठी सब भुलावा सा लगता है. हर बार हम स्त्रियां अपने को छला-सा महसूस करती हैं.

एकता प्रकाश, पटना विश्वविद्यालय पटना (बिहार) अनिसाबाद