स्त्री की आत्मनिर्भरता का अर्थ सिर्फ पैसे कमाना नहीं, निर्णय की स्वतंत्रता भी है

marriage story

शैली 

पिछले दिनों दो फिल्में देखीं – ‘ मैरिज स्टोरी’ (2019) और ‘क्रैमर वर्सेस क्रैमर’ (1979)। इन दोनों फिल्मों को देखकर स्त्री की आत्मनिर्भरता से जुड़े कुछ विचार मन में आए जिन्हें मैं यहां रख रही हूँ। 

दोनों ही फिल्मों की थीम थी – तलाक। दोनों ही फिल्मों में अवॉर्ड विनिंग अभिनेता हैं और उन्होंने परिवार की जद्दोजहद को बड़ी कुशलता से अभिनीत किया है।

इन फिल्मों को देखकर कुछ विचार जागे। पहला – अगर तलाक की स्थिति आ जाए तो पति, पत्नी और बच्चा, तीनों सिर्फ दुख ही पाते हैं । जिंदगी भर के लिए एक गहरा घाव बन जाता है, जो आगे की पूरी जिंदगी पर बुरा प्रभाव डालता है। दोनों ही फिल्में काफी संवेदनशील तरीके से यह सब दर्शाती हैं।

दूसरा यह कि ये स्थिति आती ही क्यों आती है? जितने परिवार, उनके अपने किस्से…अपने हालात। पर इन दोनों फिल्मों में तो यही दिखाया गया है कि शादीशुदा जिंदगी में स्त्री अपनी पहचान खोने लगती है। शादी के कुछ सालों बाद उसे अहसास होने लगता है कि उसे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीनी है, अपनी पहचान बनानी है, अपनी काबिलियतों का बेहतर उपयोग करना है। और वह खुद को पाने के लिए अलग होने का फैसला करती है।

अब इससे मेरे मन में कई विचारों पर विचार उभरे। ऐसा अक्सर क्यों होता है कि कुछ सालों बाद स्त्री के मन में खुद की पहचान बनाने की जरूरत पैदा हो?

स्त्री सशक्तिकरण की बातें बेवजह और ओवररेटेड नहीं हैं। अधिकतर स्त्रियों को तो उम्र भर पता ही नहीं चलता कि उनकी जिंदगी और काबिलियत को सही नहीं आंका जा रहा है, या पता चलता है तो वह उसे व्यक्त नहीं कर पातीं।

मैं एक शहरी मध्यमवर्गीय परिवार से आती हूं जहां लड़कियों को लड़कों के समान परवरिश देने की बात की जाती है। जब मैं अपने परिवार और पड़ोस में देखती हूं तो शायद 5-10% महिलाएं ही होंगी जो पूरी जागरूकता के साथ जीवन जी पाती होंगी।

अब ऐसा क्यों? क्योंकि हमें बचपन से ही इसी सोच के साथ बड़ा किया गया होता है कि हमें परिवार के प्रति समर्पित रहना है। खुद के प्रति जिम्मेदारी से पहले परिवार की जिम्मेदारी निभानी है। दूसरों के बारे में संवेदनशीलता, प्रेम, समर्पण, वात्सल्य रखना है। बहुत सुंदर सीख है यह। पर साथ में खुद को भी उतना ही आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और प्रसन्न बनाए रखना सिखाना चाहिए। यहां आत्मनिर्भर का मतलब सिर्फ पैसे कमाने से ना लगाया जाए। हर कदम पर अपने निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता, अपने खुद के विचार होने की – रखने की क्षमता और उन पर अमल कर सकने का सामर्थ्य होना आत्मनिर्भरता है।

अगला पहलू यह है कि यह सब बातें घर के लड़कों-पुरुषों को भी बतायी और सिखाई जानी चाहिए। उन्हें तो हम जरूरत से ज्यादा आत्मसम्मान सिखा देते हैं जिससे वह महिलाओं का आत्मसम्मान समझ ही नहीं पाते, फॉर ग्रांटेड लेते हैं, और उनका सम्मान जाने अनजाने छलनी कर देते हैं।

तो अब क्या करें??

यदि किसी स्त्री को मेरी यह बातें सही लग रही हों और अपने ‘स्व के तंत्र’ के लिए कुछ जागरूकता लानी हो तो पिछले खोये सालों का सोचे बिना या आगे आने वाली बाधाओं से डरे बिना आज से, अभी से अपने बेहतर जीवन की ओर अग्रसर हो। आपको देखकर ही कई जिंदगियां बेहतर हो जाएंगी। साथ ही अपने आसपास के लड़के – लड़कियों को भी उनके खुद के और दूसरों के सम्मान के बारे में जागरूक करें। जब यह कर लेंगे तब शायद हम उन अतिवंचित महिलाओं के लिए भी कुछ कर पाएं जिन का तो जिक्र भी इस लेख में नहीं हो पाया है।

अंत में उन पांच 5-10% महिलाओं के परिवार वालों का आभार, जिन्होंने उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर खुद को सबसे पहले रखना सिखाया। जी हां, सबसे पहली और सबसे प्रभावशाली शिक्षा घर से ही मिलती है। दोनों फिल्मों में पत्नी यदि शुरू से ही अपने सम्मान के प्रति जागरूक होती तो उनके संवेदनशील पति, जो उनके जाने के बाद अपनी पत्नी की बुनियादी जरूरतें और अधिकार समझ कर अब अफसोस कर रहे थे, शुरू से ही परिवार में बराबर की हिस्सेदारी रखते और तलाक के कारण तीन जिंदगियां यूं दर्द से ना गुजरती। और यहां बराबरी की बात हर स्तर पर की जा रही है।

‘क्रैमर वर्सेस क्रैमर’ में एक वाक्य बहुत सुंदर था कि महिला होने पर जरूरी नहीं कि आप बेहतर पैरेंट हो । सिर्फ महिला होने के कारण बच्चे की कस्टडी मिलने में जो पक्षपात होता है वह भी तो गलत है। इसलिए महिला और पुरुष दोनों के परिवार में और समाज में समान अधिकार और सम्मान होना चाहिये।