सुमन शर्मा की ‘अजन्मी बेटी की अन्तर्वेदना’ और अन्य कविताएं


प्रस्तुत है चर्चित कवयित्री, कथाकार व समालोचक डॉ.सुमन शर्मा की कुछ कविताएं। डॉ.सुमन ने ‘यशपाल साहित्य में नारी चित्रण’ विषय पर पीएचडी की है। ‘सैलाब’, (कविता संग्रह), ‘मन की पाती’ (कविता संग्रह), ‘रहोगी तुम वही’ (कहानी संग्रह), ‘यशपाल के उपन्यासों में नारी के विविध रूप’ आदि उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं। पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख व शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. सुमन को अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन तथा पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया है। वर्तमान में वे श्रीमती वीपी कापडिया महिला आर्ट्स कॉलेज, भावनगर में हिन्दी प्राध्यापिका हैं।

मैं

अक्सर ऐसा होता है,
मन ‘खुद’ को ही खोजता है।
लड़ती हूँ अपने आपसे
न जीतना, न खुद से
हारना ही होता है।

हाथ उलझते हैं कामों से,
मन उड़ना चाहता है
अधूरे रह गये चित्रों में,
जाने कब रंग भर आता है?
रंगकर उँगलियों से कोरे कैनवास को
उड़ लेता है सातवें असमानों में,
खुद ही खुद से जंग जीत जाता है।

कभी रोटी बेलते हाथ,
बंद खिड़कियों से देख,
उड़ती तितलियों को
रूक जाना चाहते हैं, उन्हें क़ैद करके
मन उड़ लेता है कुछ पल उन्मुक्त उड़ानों के,
संग उनके जी लेता है।

कामों में उलझे निश्चेष्ट से शरीर में,
पनपते रहते हैं कई सपने,
मन गुनगुनाना चाहता है,
जन्मना चाहती है कोई कविता,
हाथ बग़ावत कर थाम लेते हैं कलम,
कदम शिथिल हो रूक जाते हैं,
निजात पाती हैं उलझनें,
अपने ही भीतर से।
कभी राधा कभी मीरा बन,
मन प्रिय तक पहुँच ही पाता है।

यों होता रहता है संघर्ष,
वास्तविकताओं और संवेदनाओं के बीच,
हिस्सों, टुकड़ों में जीते जीते,
लड़कर ‘खुद’ से, ये मन जीवन का
हर पल जी भरकर जी लेता है।

अनोखे बंधन

ऐसे भी बंधन होते हैं,
जो बिन बाँधे बँध जाते हैं।
रिश्तों की फ़ेहरिस्तों में,
जगह कभी न पाते हैं।

मन घूम घूमकर उनसे ही,
अंतर्मन से जुड़ना चाहे,
अनंत सुकून की आस लिए,
उड़ उड़ जहाज़ के पंछी से,
हम,उड़ारी वहीं लगाते हैं।

दुख सुख बाँटें इस चाहत में,
खुदा बने से आते हैं,
प्रेम भरी छाया बनकर,
दिल में घर कर जाते हैं।

जीवन सफ़र में बन साथी,
साथ दूर तक चलते हैं,
जन्मों जनम के नाते रिश्ते,
बिन जोड़े जुड़ जाते हैं।

अनोखे तेरे इस आलम में,
जब हमख्य़ाल मिल जाते हैं,
मिल साथ निःस्वार्थ भावों की,
इक दुनिया अलग बसाते हैं।

उम्मीद

कल फिर सुरज निकलेगा नई उम्मीदों को लेकर।
है रहना खड़े तुम्हें भी गुंजाइशों को लेकर ।

उदास सहर में भी बजेंगे सुरों से राग सारे,
नये गीत भी सजेंगे फरमाइशों को लेकर ।

ये रात जब ढलेगी घने अंधेरों को सहेजे,
उजाले भोर के मिलेंगे नई ख़्वाहिशों को लेकर।

बहका है सारा आलम बने न कोई फ़साना,
कहीं खो न जाना तुम भी नुमाइशों को लेकर।

ख़्वाब सी बनी है ज़िन्दगानी की हक़ीक़त,
ज्यों जी रहे हों हम भी सिफ़ारिशों को लेकर।

अजन्मी बेटी की अन्तर्वेदना

मां… मुझे मत मारो,
जन्मने दो मुझे भी
अपने इस संसार में।
मैं भैया के साथ बड़ी हो जाऊँगी।

माँ..मुझे मत मारो,
आने दो मुझे भी
अपनी इस दुनिया में,
मैं तुम्हें नहीं सताऊँगी,
तुम भैया को सुलाओगी
मैं अपने आप से जाऊँगी।

मां… मुझे मत मारो
जन्मने दो अपने इस घर में,
थक जाओगी तुम
तब हाथ तुम्हारा बँटाऊँगी,
रह जाओगी अकेली,
अंत तक साथ तुम्हारा निभाऊँगी।
मां… पलने दो मुझे अपनी कोख में
जीवन भर जन्मने का ऋण चुकाऊँगी,
मां… मैं बेटी बनकर आऊँगी,
मैं बेटी बनकर आऊँगी।