सितारा देवी : परंपराओं से विद्रोह करके अपनी अलग पहचान बनाने वाली नृत्यांगना

सितारा देवी

प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सितारा देवी को एक विद्रोही नृत्यांगना भी कहा जाता है। आज से करीब 75 साल पहले कोई भी यह नहीं सोचता था कि एक शरीफ़ घराने की लड़की नाच-गाना सीखे। धार्मिक और परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में लड़कियों को नृत्य और संगीत की शिक्षा देने की परंपरा नहीं थी। सितारा देवी जब सिर्फ 16 साल की थीं, तब उनके नृत्य को देखकर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें ‘नृत्य सम्राज्ञी’ कहकर सम्बोधित किया था। बतौर नर्तकी अपने लंबे जीवन में सितारा देवी ने देश-विदेश में कई कार्यक्रमों और महोत्सवों में चकित कर देने वाली ऊर्जा के साथ नृत्य कार्यक्रम प्रस्तुत किये।

सितारा देवी ने अपने नृत्य का जादू लंदन में प्रतिष्ठित रायल अल्बर्ट और विक्टोरिया हाल तथा न्यूयार्क में कार्नेगी हाल में बिखेर चुकी हैं। सितारा देवी के कथक में बनारस और लखनऊ घराने की तत्वों का सम्मिश्रण दिखाई देता है। सितारा देवी न सिर्फ कथक बल्कि भारतनाट्यम सहित कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों और लोकनृत्यों में पारंगत हैं। उन्होंने रूसी बैले और पश्चिम के कुछ और नृत्य भी सीखें हैं।

बताते हैं कि उनका जब जन्‍म हुआ था तो माता-पिता ने उनको अपनी नौकरानी को सौंप दिया गया था क्योंकि उनका मुंह थोड़ा टेढ़ा था। नौकरानी ने बचपन में सितारा देवी की खूब सेवा करके उनका मुंह ठीक कर वापस उनके माता-पिता को लौटा दिया। धनतेरस को पैदा होने की वजह से लोग उन्हें धन्नो कहकर बुलाने लगे थे। काशी के कबीरचौरा की गलियों में पली यही धन्नो सितारा बनकर छा गईं।

उस दौर में एक ब्राह्रण परिवार में लड़कियां नृत्य करें यह एक चौंकाने वाली बात थी। सितारा देवी के पिता आचार्य सुखदेव ने यह क्रांतिकारी कदम उठाया और पहली बार परिवार की परंपरा को तोड़ा। सुखदेव जी नृत्य कला के साथ-साथ गायन से भी ज़ुडे हुए थे। वे नृत्य नाटिकाएँ लिखा करते थे। अपनी नृत्य नाटिकाओं में वास्तविकता लाने के लिए उन्होंने घर की बेटियों को नृत्य सिखाना शुरू किया। उनके इस फैसले पर पूरे परिवार ने कड़ा विरोध प्रदर्शित किया था, किंतु वे अपने निर्णय पर अडिग रहे।

सितारा देवी का विवाह उस समय की परम्परा के अनुसार आठ वर्ष की उम्र में हो गया। अन्य परिवारों की तरह उनके ससुराल वाले चाहते थे कि वह घरबार संभालें लेकिन वह स्कूल में पढना चाहती थीं। स्कूल जाने के लिए जिद पकड लेने पर उनका विवाह टूट गया और उन्हें कामछगढ़ हाई स्कूल में दाखिल कराया गया। वहां उन्होंने स्कूल के कार्यक्रमों में नृत्य का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। सत्यवान और सावित्री की पौराणिक कहानी पर आधारित एक नृत्य नाटिका में भूमिका हासिल करने के साथ ही अपने साथी कलाकारों को नृत्य सिखाने की जिम्मेदारी भी ले ली।

सितारा देवी ने आगे चलकर अपने बचपन की शादी तोड़ दी और सारा जीवन नृत्य को समर्पित कर दिया। 16 साल की उम्र में उनका नृत्य देखकर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘कथक क्वीन’ के खिताब से नवाजा था। सितारा देवी को कला और नृत्य के प्रति उनके विशेष योगदान के लिए ‘पद्मश्री’ (1970) और ‘कालिदास सम्मान’ (1994) से भी सम्मानित किया गया है। कई बॉलीवुड फिल्मों की हिरोइनों को सितारा देवी ने नृत्य के गुर भी सिखाए, इनमें रेखा, मधुबाला, माला सिन्‍हा और काजोल जैसी एक्‍ट्रेस के नाम शामिल हैं।

सितारा देवी ने बॉलीवुड की अनेक अभिनेत्रियों को नृत्य का प्रशिक्षण दिया है। एक समय में उन्हें सुपर स्टार का दर्जा प्राप्त था लेकिन नृत्य की खातिर उन्होंने फिल्मों से किनारा कर लिया। वे सिर्फ 12 साल की थीं जब सागर स्टूडियोज के लिए काम करना आरंभ किया। शुरुआती बॉलीवुड की फिल्मों में उन्हें छोटी-छोटी भूमिकाएं मिलीं और कई नृत्य संबंधी रोल भी मिले। उनकी फिल्मों में हलचल (1950) और मदर इंडिया (1957) उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा शहर का जादू (1934), जजमेंट ऑफ अल्लाह (1935), नगीना, बागबान, वतन (1938), मेरी आंखें (1939) होली, पागल, स्वामी (1941), रोटी (1942), चांद (1944), लेख (1949) आदि फिल्मों में भी उनके नृत्य का जादू देखने को मिलता है।