एलिजाबेथ डेविड : एक स्त्री जिसने इंग्लैण्ड के लोगों के जीवन जीने का तरीका बदल दिया


अशोक पांडे

कमाल की औरत थी एलिजाबेथ डेविड। 1912 में इंग्लैण्ड के एक अमीर परिवार में पैदा हुई एलिजाबेथ ने पेरिस में अभिनय की शिक्षा ली और थियेटर में काम करना शुरू कर दिया। उसकी मुलाक़ात चार्ल्स गिब्सन नाम के एक अभिनेता से हुई। चार्ल्स उससे उम्र में ग्यारह साल बड़ा और शादीशुदा था। दोनों में प्रेम हुआ और वे लन्दन से भाग गए। दूसरे विश्वयुद्ध का दौर चल रहा था।

एक छोटी सी नाव में बैठ कर वे इटली पहुंचे जहाँ उनकी नाव को पुलिस ने जब्त कर लिया। वहां से भाग कर वे यूनान पहुंचे जहाँ दोनों जर्मन फौजों की पकड़ में आते आते बचे। यहाँ से भागकर वे पहले कोर्सिका फिर मिस्र पहुंचे जहाँ उनका सम्बन्ध ख़त्म हो गया। यहाँ पहुँच कर एलिजाबेथ को ब्रिटिश सरकार के काहिरा में एक पुस्तकालय चलाने की नौकरी दे दी। यहाँ उन्होंने एक दूसरे आदमी से बाकायदा शादी की लेकिन यह सम्बन्ध भी बहुत अधिक नहीं चल सका और उनका तलाक हो गया।

34 साल की आयु में वे वापस इंग्लैण्ड आईं जहाँ विश्वयुद्ध के कारण खाने में राशनिंग लागू थी। पिछले पंद्रह-बीस सालों से फ्रांस, यूनान और मिस्र में बेहतरीन मेडिटरेनियन भोजन का लुत्फ़ उठा चुकी एलिजाबेथ को ब्रिटेन का भोजन ज़रा भी पसंद नहीं आया। खीझ में आकर उन्होंने अपने पसंदीदा भोजन के बारे में लेख लिखना शुरू किया और दो साल बाद यानी 1950 में ‘अ बुक ऑफ़ मेडिटरेनियन फूड’ प्रकाशित की। इसके बाद उन्होंने इटैलियन, फ्रेंच और ब्रिटिश भोजन पर भी उम्दा किताबें लिखीं और 1960 के आते-आते वे अपने देश की सबसे बड़ी फूड-क्रिटिक बन गईं।

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मैं यहाँ उनकी जीवनगाथा नहीं लिखना चाहता, उनकी एक किताब ‘एन ऑमलेट एंड अ ग्लास ऑफ़ वाइन’ के बहाने कुछ और बात करने जा रहा हूं। तकनीकी रूप से देखा जाय तो यह किताब एलिजाबेथ द्वारा 1946 से 1960 के बीच लिखे गए अखबारी लेखों का संग्रह है जिसमें अनेक व्यंजन बनाने की विधियां भी बताई गयी हैं। कुकिंग की किताबों की दुनिया में इसे क्लासिक माना जाता है।

किताब में संग्रहीत एक लेख में उन्होंने लिखा है – “जब मैं इंग्लैण्ड लौटी तो मैंने पाया कि मेरे देश का भोजन भयानक था। मिस्र में मेरा जीवनस्तर कोई ख़ास नहीं था लेकिन वहां मैं जो खाना खाती थी उसके भीतर जीवन, रंग, खुशबू, उत्साह और ऊर्जा सब कुछ होता था। अंग्रेजी खाने से ये सारी चीजें सिरे से गायब थीं।” वतन वापस लौटने के बाद एलिजाबेथ ने ताजा और सीजनल सामग्रियों को अपने व्यंजनों का आधार बनाया। भोजन को लेकर लिखे गए उनके लेखों ने इंग्लैण्ड में सनसनी का माहौल बना दिया क्योंकि उनका ताल्लुक एक बेहद अमीर परिवार से था और ऐसे परिवारों की लड़कियों से खाना पकाने के बारे में जानने की उम्मीद नहीं की जाती थी। इसके अलावा औद्योगिक क्रान्ति का केंद्र रहे होने के कारण पिछली दो पीढ़ियों से सारे इंग्लैण्ड के भीतर डिब्बाबंद भोजन के लिए एक ख़ास तरह का ओब्सेशन पैदा हो चुका था। एक टिपिकल ब्रिटिश भोजन का मतलब था टोस्ट के ऊपर सार्डीन मछली के तीन टुकड़े, थके हुए स्पंज केक का एक टुकड़ा, दो डाइजेस्टिव बिस्कुट और गुनगुनी चाय। हद से हद और हुआ तो सूखे अण्डों से बनी स्वीटडिश और जरूरत से ज्यादा पकी हुई बंदगोभी।

एलिजाबेथ डेविड के लेखों के प्रकाशन के बाद समूचे इंग्लैण्ड की खानपान की आदतों में बदलाव आना शुरू हुआ। एक से एक मसालों, एग्ज़ोटिक फल-सब्जियों और दुनिया भर की शराबों की खपत बढ़ना शुरू हुई। लोग उनके लिखे के छपने का इन्तजार करते थे और जिन पत्रिकाओं में उनके लेख छपते थे उनकी बिक्री में कई गुना बढ़ोत्तरी हो गयी। इस तरह एक अकेली औरत ने स्वाद से वंचित देश को अपनी स्वाद ग्रंथियों को खोजना सिखाया और उसके खाने की मेज को अधिक संपन्न और आनंदपूर्ण बनाया।

‘एन ऑमलेट एंड अ ग्लास ऑफ़ वाइन’ में एलिजाबेथ डेविड इतिहास, भूगोल और साहित्य के बीच आवाजाही बनाए रखती हैं और उनके लेखों में भोजन निर्माण पर लिखी गईं प्राचीनतम पुस्तकों से लेकर वाल्टर स्कॉट, वर्जीनिया वूल्फ और मॉन्टेन जैसे लेखकों का जिक्र आता रहता है। एलिजाबेथ डेविड के यहाँ भोजन और उसकी कला जीवन का हिस्सा नहीं समूचा जीवन होता है।

अपने बूते पर अपनी पहचान बनाने वाली एलिजाबेथ डेविड प्रेम से भरपूर एक जिद्दी औरत थी जिसे उसके आलोचकों ने सिर्फ एक गुस्सैल स्त्री की तरह देखा। उसके जीवन में अनेक पुरुष आये जिनके प्रेम ने उसके व्यंजनों को उसके जीवन की तरह मसालेदार बनाने में मदद की। मृत्यु से एक साल पहले उनका कार एक्सीडेंट हुआ जिसके कारण वे व्हीलचेयर पर रहने को विवश हुईं। इसके बावजूद वे वैसी ही रहीं। उनके बारे में एक संस्मरण आधुनिक समय के बड़े शेफ गिने जाने वाले केन हॉम ने लिखा है। लिखते हैं, “वे बिस्तर पर थीं लेकिन उन्होंने नफीस वाइन की एक चिल्ड बोतल निकाली जिसे हमने मिलकर पीना शुरू किया। वाइन ख़त्म हो गयी तो मैं चलने को उठने लगा और उनसे अनुमति माँगी। बिस्तर के नीचे से एक और बोतल निकालती हुई वे बोलीं – नॉनसेन्स!” केन हॉम संसार के उन अनेक मशहूर मास्टर शेफों में से एक हैं जो अपनी कला के लिए सार्वजनिक रूप से एलिजाबेथ डेविड का ऋण स्वीकारते हैं।

यह जानने का मन हो कि युवावस्था में की गयी एक दुस्साहसी यात्रा कैसे आपके जीवन की दिशा बदल सकती है या यह कि अमूमन पुरुषों द्वारा संचालित किये जाने वाले संसार के एक अनूठे इलाके में एक अकेली स्त्री किस तरह अपना साम्राज्य स्थापित करती है आपको एलिजाबेथ डेविड के जीवन के बारे में जानना चाहिए। अगर सिर्फ खाने-पीने के शौकीन हैं तो भी आपको एलिजाबेथ डेविड के जीवन के बारे में जानना चाहिए और उनकी किताबों को पढ़ना चाहिए।

मेरी बात न भी मानें कम से कम मशहूर ब्रिटिश लेखक-पत्रकार ऑब्रोन वॉग की तो सुन लीजिये जो कहते हैं – “अगर मुझसे पिछले सौ सालों की ऐसी इकलौती स्त्री का नाम लेने को कहा जाय जो इंग्लैण्ड के जीवन में सबसे महान बदलाव लेकर आई हो तो मैं एलिजाबेथ डेविड का नाम लूँगा।”

यह लेख जाने-माने कवि, गद्यकार, अनुवाद और यायावर अशोक पांडे की फेसबुक वाल से साभार