स्टैंडअप कॉमेडियन वासु प्रिमलानीः जिन्होंने माउण्टेन बाइक में कभी जंग नहीं लगने दी

वासु प्रिमलानी

सीरज सक्सेना

इतनी बड़ी दिल्ली में महिला साइकिल चालक कम ही हैं और उनमें वासु प्रिमलानी अपने बहुआयामी व्यक्तित्व की वजह से काफी प्रसिद्ध हैं। वासु प्रिमलानी से मेरी दोस्ती दिल्ली में शाम के रीगल सिनेमा के पास हुई एक हास्य प्रस्तुति के बाद हुई थी। अंग्रेजी भाषा में हुआ यह हास्य कार्यक्रम अनेकों रोचक प्रस्तुतियों से सराबोर था। वासु ने भी अपनी एक प्रभावशाली हास्य प्रस्तुति दी। किसी महिला हास्य कलाकार को मंच पर मैंने पहली बार देखा। कार्यक्रम खत्म होने के बाद मैं वासु से मिला और उनकी प्रभावी प्रस्तुति के लिए उन्हें बधाई दी। मेरी हिंदी में दी गई बधाई सुन कर उन्हें ख़ुशी भी हुई और आश्चर्य भी।

साइकिल वाली मुलाकात

फिर हमारी मुलाक़ात एक सुबह दिल्ली के अक्षरधाम सेतु के पास हुई इस बार हम अपनी-अपनी साइकिल पर थे। सुबह का प्रकाश अभी बिखरने ही वाला था। हम यमुना सेतु पार कर जब इंडिया गेट पहुंचे तब तक सुबह का नरम प्रकाश दिल्ली पर छा चुका था। लौटते हुए वासु अपने घर और मैं अपने घर की और रवाना हुए। सड़क पर मिलने का यह सिलसिला आज भी बना है। और हमारी मित्रता साइकिल की गति की तरह धीरे धीरे प्रगाढ़ होती जा रही हैं।

इस बार वे मेरा रंग ‘किस्से साइकिल के’ श्रृंखला की हमारी अतिथि वक्ता थीं। देश की प्रसिद्ध स्टेंडअप कॉमेडियन वासु प्रिमलानी। जो उस सुबह दौड़ने के बाद साइक्लिंग भी कर चुकी हैं उनके चेहरे पर थकान की वहज से आलोक थोड़ा शिथिल हैं। उन्हें हमेशा हंसते, चुटकुले गढ़ते, सुनाते ही देखा है। पर आज वे कुछ खामोश हैं।

अमरीका में साइकिल

हमारी बात उनके बचपन से शुरू हुई वे बताती हैं कि उनकी पहली साइकिल उन्हें नौ वर्ष की उम्र में मिली थी। जिससे वे अपनी कालोनी में घूमती थीं। पढ़ाई के बाद वे अमरीका चली गईं जहां न्यूयॉर्क शहर में अपने काम के लिए वे साइकिल से जाती थीं। इस वक्त वे 21 वर्ष की थीं। अपनी माउण्टेन साइकिल से उन्होंने खूब शहर देखा। यह साइकिल आज भी वासु के पास हैं। वे कहती हैं कि उनकी साइकिल में उन्होंने आज तक कभी जंग नहीं लगने दी हैं। आज भी वह साइकिल नई जैसी है।

अमरीका में अपने साइकिल के अनुभव के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि वहां की सड़कों पर पैदल चलने वालों और साइकिल चालकों के लिए काफी नियम भी हैं और सम्मान भी अगर कोई साइकिल किसी सड़क से गुजर रही हैं तो वहां अन्य सभी बड़े छोटे वाहन रुक जाएंगे और सड़क पर पहली प्राथमिकता साइकिल के निकलने की होती हैं।

साइकिल चालकों को भी साइकिल चलाते वक्त हेलमेट लगाना अनिवार्य हैं वरना अगर किसी यातायात पुलिसकर्मी ने उन्हें बिना हेलमेट के देख लिया तब उन्हें जुर्माने के रूप में एक बड़ी रकम चुकानी होती हैं। वहां सुरक्षित और अच्छे साइकिल ट्रेक हैं। और इन पर पैदल चलने वाले भी सचेत हो कर चलते हैं। साइकिल सवार के लिए शहर में बहुत सम्मान और आदर हैं उस वक्त किसी अखबार में एक लेख शहर के साइकिल सवारों पर प्रकाशित हुआ था जिसमे शहर के उन लोगों के बारे में लिखा था जिनकी साइकिल उनकी कार से महँगी थी।यह लेख काफी चर्चित हुआ था।

माउण्टेन साइकिल कैसी हो?

माउण्टेन साइकिल के बारे में बात करते हुए वासु कहती हैं कि ये साइकिल खास तौर पर पहाड़ों की ऊंचाई और ढलान को ध्यान में रख कर डिज़ाइन की जाती हैं। यह साइकिल हलकी होनी चाहिए ताकि अगर हमें छोटी नदी या कच्चा या पत्थरों से भरा रास्ता तय करना हो तो हम साइकिल अपने कंधे पर उठा कर रास्ते का वह टुकड़ा पार कर सकें। स्कॉटलैंड में माउंटेन साइकिलिंग बहुत चर्चित हैं इसी देश के एक साइकिलिस्ट हैं जो विश्व के अनेकों पर्वतों पर अपनी साइकिल चला चुके हैं।

भारत में माउण्टेन साइकिल के नाम पर जो बन रहा है वह बच्चों के लिए एक आकर्षक खिलोने की तरह हैं। बच्चे शौक से साइकिल खरीद लेते हैं और न वे खुद उसे जरूरत पड़ने पर उठा पाते हैं और न ही उनके माता पिता। फिर कुछ समय थोड़ा शोक पूरा होने के बाद साइकिल घर के नीचे खड़ी खड़ी कबाड़ हो जाती हैं। ऐसी साइकलों की संख्या भी भारत में बहुत हैं। साइकिल हमेशा हल्की होनी चाहिए और उसमे अतिरिक्त कुछ लगाना भी नहीं चाहिए।

दिल्ली दिल वालों की

दिल्ली शहर बड़ा अजीब शहर हैं यहां सड़क पर हर तरह का चरित्र देखने को मिल जाता हैं। अगर कोई महिला साइकिल चालाक सड़क पर आती हैं तो लोग अपने वाहनों के साथ उसके करीब आने लगते हैं। उसे ऐसे देखते हैं जैसे वो कोई इंसान ही न हो। किसी अन्य वाहन का करीब आना साइकिल चालकों के लिए बहुत जोखिम भरा हो सकता हैं। एक बार जब मैं सुबह साइकिल चला रही थी तब नीली वर्दी में एक आदमी (जो शायद कहीं गार्ड की नौकरी करता होगा) ने मुझे आगे जाते देख “गुड़ मॉर्निंग मेडम” कहा। ऐसे लोग भी हैं हमें इज़्ज़त देते हैं।

यहाँ मदर टेरेरा क्रिसेंट के पास जब मैं दौड़ रही थीं तब वहां झाड़ू लगा रहे एक आदमी ने जब जब भी मैं उसके सामने से गुजरी अपनी झाड़ू एक हाथ में पकड़ मुझे सेल्यूट किया। ऐसे नेक इंसान भी हैं जो महिला को छोटे कपडे में घूरने के बजाय उसकी इज़्ज़त करते हैं। एक बार एक लड़की मेरे पास आयी उसने कहा कि मेडम आप साइकिल चलाती हैं, दौड़ती हैं आपको देख मुझे बहुत ख़ुशी होती हैं मैं मसाज करती हूँ और आपके लिए निशुल्क मसाज करुँगी. इतने प्रेम करने वाले भी हैं इस शहर में।

हर साइकिलिस्ट सिर्फ सम्मान चाहता हैं। और हमें अपनी साइकिल से बहुत प्यार होता हैं। हमें अपनी कार से इतना लगाव नहीं होता जितना कि साइकिल से होता हैं। साइकिल हमेशा घर में अपने साथ ही होती हैं साइक्लिस्ट अपनी साइकिल घर में अपने ही साथ रखते हैं। और जब किसी दूसरे साइक्लिस्ट को सड़क पर देखते हैं तो उनकी नज़र सिर्फ साइकल पर होती हैं। उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता की साइकिल सवार स्त्री है या पुरुष। और हमारी दोस्ती साइकिल से साथ तय की गई दूरी पर निर्भर होती हैं।

ट्राइलेथॉन के अनुभव

साइकिल के प्रकार के बारे में बताते हुए वासु कहती हैं कि साइकिल चार प्रकार की होती हैं। 1- माउण्टेन साइकिल, 2-हाईब्रीड साइकिल, 3-फोल्डिंग साइकिल, 4-रेसिंग साइकिल। वासु ने “हाफ आयरन मैन” प्रतियोगिता भी पूर्ण की हैं इस कठिन प्रतियोगिता में एक दशमलव नौ किलोमीटर तैरना, नब्बे किलोमीटर साइकिल चलाना और ईक्कीस किलोमीटर दौड़ना होता हैं। और यह सब एक निर्धारित समय में बिना अवकाश लिए पूर्ण करना होता हैं।

वासु अब ‘आयरन मेन’ की तैयारी कर रहीं हैं। ट्राइलेथान के बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए वासु ने बताया की इस स्पर्धा की तैयारी के लिए उन्हें प्रति दिन दो घंटे का अभ्यास करना होता हैं और शनिवार इतवार आधा दिन अभ्यास करना होता हैं। यह भी एक कठिन स्पर्धा हैं। इस स्पर्धा में भाग लेने के लिए सभी प्रतिभागियों को साइकिल का तकनीकी ज्ञान होना अतिआवश्यक हैं। जब हम अपनी साइकिल खोल कर ले जाते हैं तो हमे स्वयं ही साइकिल को जोड़ना होता हैं, अगर कहीं रास्ते में हवा निकला जाए तो पंचर भी खुद ही ठीक करना होता हैं। रात और दिन में साइकिल चलाते वक्त हमें अलग अलग चश्मे रखने होते हैं।

एक रोचक किस्से को सुनाते हुए वासु ने साइक्लिस्ट के अनुशासन के बारे कहा कि लन्दन में अस्सी साल के एक बुजुर्ग हैं फौजा सिंह जिन्होंने अस्सी साल की उम्र में दौड़ना शुरू किया और जब वे सौ साल के हुए तो अपनी दौड़ से उन्होंने एक साथ पांच रिकॉर्ड तोड़ दिए। जबकि वे कहते हैं की मैं एक आलसी इंसान हूँ कई बार जब मैं सुबह जल्दी उठा तो सोचा कि अब जूते कौन पहनेगा और इस आलस्य के कारण वे कई दिन नहीं दौड़ पाए फिर उन्होंने इससे उबरने के लिए एक तरकीब सोची कि वे रात में ही जूते पहन कर सोएंगे। ताकि सुबह उठते ही सीधे घर से बाहर दौड़ने के लिए निकल सकें। सुबह उठने में सभी को कष्ट होता हैं पर हमें अनुशासन तो बनाना ही चाहिए और एक बार जब सुबह उठने के बाद के फल का स्वाद हम चख लेते हैं तो अपने आलस्य पर जीत हासिल कर ही लेते हैं। हमें अपने दिल और दिमाग को काबू में करना आना चाहिए।

फिल्मों में अभिनय

वासु को सन 2019 में राष्ट्रपति द्वारा नारी शक्ति सम्मान से भी नवाज़ा जा चुका हैं उन्हें यह पुरस्कार महिलाओं के लिए किए गए उनके काम की वजह से मिला था। जो स्वयं शक्ति रूपा हो उसे यह सम्मान तो मिलना ही था। वासु ने ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियाँ’ और ‘ब्रह्मास्त्र’ दो बम्बईया फिल्मों में भी अभिनय किया हैं। अपने फिल्मों में काम करने के अनुभव के बारे में वासु बताती हैं कि दो मिनट का मेरा रोल छह घंटे में पूर्ण हुआ था।

साईकिल चलाने और आहार के बारे में वासु ने बताया कि सुबह साइकिल चलाने के पहले सिर्फ थोड़ा पानी पीना चाहिए और साथ में पानी की एक बोतल अवश्य रखनी चाहिए। अगर लम्बी दुरी साइकिल से तय करनी हो तो अपने पानी में थोड़ा सा एलेक्ट्रोल मिला लेना चाहिए ताकि पसीने से शरीर में कम होने वाले नमक की कमी को पूरा किया जा सके तथा अगर भूख लगे तो एक केला और नीम्बू पानी भी पिया जा सकता हैं।

साइकिल से दुर्घटना

साइकिल के बारे में अपनी यादगार स्मृति के बारे में बताते हुए वासु ने कहा कि जब वे अमरीका के अकास्का में अपने मित्र से साइकिल ले कर चला रहीं थीं तब साइकिलिंग उनके लिए नई थी उन्हें पहाड़ों पर साइकिल से ढ़लान पर उतरते वक्त थोड़ा ब्रेक लगाते हुए उतरने के बारे में नहीं मालूम था। वे ढ़लान पर साइकिल की तेज़ रफ़्तार से उतर रहीं थीं यह सोचते हुए उन्होंने अपनी गति धीमी नहीं की कि सामने जो फिर चढ़ाई आने वाली हैं उस पर चढने के लिए यह गति मदद करेगी। तेज़ गति से उतरते वक़्त वे एक पाइप से टकरा गईं और बेहोश हो गयीं पर उन्होंने अपनी साइकल नहीं छोड़ी थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया तो उनकी छाती पर खरोंच के निशाँ और दर्द था। उन दिनों मोबाइल फोन भी नहीं थे अतः पच्चीस किलोमीटर साइकल से ही उन्हें अपने घर, दर्द के साथ लौटना पड़ा। वे कहती हैं कि अगर किसी साइक्लिस्ट की कोलर बोन नहीं टूटी हैं तो उसे गंभीर साइक्लिस्ट नहीं माना जाता हैं।

आज हमारा काम बिना यात्रा किए नहीं होता। कोई भी नौकरी हो,व्यवसाय हो हमें कुछ यात्रा बस,ट्रेन,मेट्रो,मोटर साइकिल आदि से करनी ही होती हैं हमारी सड़कें कारों से भर चुकी हैं हमारा बहुमूल्य समय यातायात में फस कर नष्ट होता हैं एक कार जितनी जगह घेरती हैं उतनी जगह में पांच साईकल चल सकतीं हैं।

साइकिल के फायदे

साइकिल चलाने के फायदे भी बहुत हैं। सेहत अच्छी रहती ही हैं। और मानसिक तनाव भी कम होता हैं। अगर हर शहर में पचास प्रतिशत साइकिल सवार हो जाएं तो वाहन से होने वाले प्रदुषण से भी मुक्ति मिल जाएगी। इस कोविड संक्रमण ने दिल्ली को भी बदला हैं अब यहां सुबह और शाम झुण्ड में साइकिल सवारों को देख जा सकता हैं। लोग अपने परिवार के साथ भी साइकिल से निकल रहें हैं। सेहत के साथ साथ यह वाहन किफायती भी हैं।

जहां एक लीटर पेट्रोल में पंद्रह किलोमीटर का सफर तय होता हैं वहीँ साइकल से एक केले में पचास किलोमीटर की दूरी तय की जा सकती हैं। दिल्ली की हवा और आकाश को इतना साफ़ पहले नहीं देखा। जहां हम पश्चिम की नकल करने पर अपने आप को सभ्य और आधुनिक समझते हैं वहीँ हम पश्चिम से उनके व्यवहार में बसी साइकिल को अपनाने में क्यों झिझकते हैं? लन्दन शहर के महापौर भी तो साइकिल से अपने दफ्तर आते जाते हैं। हमारे गरीब लोग साइकिल चलाते हैं, साइकिल चलाने की जरूरत अब तथाकथित बड़े और सुविधासंम्पन्न लोगों को हैं।

Siraj Saxena
फोटोः त्रिभुवन देव

सीरज सक्सेना समकालीन चित्र कला तथा सिरेमिक आर्ट का जाना-पहचाना नाम है। एक जाने-माने आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे साइकिल और पर्यावरण प्रेमी हैं। वे उन गिने चुने कलाकारों में हैं जो नियमित रूप से लेखन भी करते हैं।  मेरा रंग के लिए वे देश के चुनिंदा साइक्लिस्ट के साथ संवाद की एक सिरीज़ कर रहे हैं।