पीरियड के मुद्दे पर गांव-गांव में महिलाओं के जागरुक कर रही हैं बनारस की स्वाति सिंह

स्वाति सिंह

शालिनी श्रीनेत

एक महिला कैसे सशक्त और जागरुक हो सकती है इसकी मिसाल पेश की है बनारस की स्वाति सिंह ने। उन्होंने न सिर्फ लिखा या न सिर्फ बातें की… बल्कि करके भी दिखाया। वे जागरुकता के साथ महिलाओं को सक्षम भी बना रही हैं। मैं इनकी किसी से तुलना नहीं कर सकती। शायद किया भी नहीं जा सकता। ‘मुहिम – एक सार्थक प्रयास’ बैनर तले इन्होंने ग्राउंड लेवेल पर बहुत काम किया है।

बनारस और उसके आसपास के गांव के लोगों तक वे अपनी बात पहुँचाती हैं। उनके पहुँचाने का मतलब ये नहीं कि लिख दिया कहीं और छप गया। नहीं… वे गांव-गांव में जाकर हर एक घर की महिलाओं से बातचीत करती हैं, उन्हें बताती हैं कि पीरियड कोई हौवा नहीं एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो हर महिला को होती है। साथ ही पैड और पैड के इस्तेमाल के बारे में भी बताती हैं।

गांव में तो तरह तरह की बातें होती हैं पीरियड को लेकर। कोई कहता है- मर्दों को पता नहीं चलना चाहिए- ये शरम की बात है। कोई कहता है- मर्दों को ऐसे में पानी नहीं देना चाहिए उनकी आयु कम होती है। कोई कहता है- अचार नहीं छूते खराब हो जाता है। कोई कहता है- पूजा नहीं करते, क्योंकि इस समय अपवित्र होते हैं। किचन में नहीं जाते क्योंकि गंदे होते हैं।

ये सारी भ्रांतियां तोड़ रही हैं स्वाति सिंह। वहां आसपास के गांवो की महिलाएँ अब अपने हाथों से पैड बनाती हैं। मेरी निगाह में यह है असली जागरुकता। इतना करना तो आसान नहीं है पर हम अपने आसपास के चार लोगों को भी किसी बात के लिए जागरुक कर दें तो सोचिए तो उनकी संख्या कितनी हो जाएगी। हम उनके बीच क्यों बातें करते हैं, जो लोग पहले से ही उन बातों से अवगत होते हैं।

हमें उन्हें जागरुक करना है जो सामाजिक उथल-पुथल के बारे में नहीं जानते। हम बड़े-बड़े प्रोग्राम में जाते हैं, हाइ-फाइ लोगों के बीच बोलते हैं। उन्हें क्या और क्यों बताना, जिनको सब कुछ पता है। आइए स्वाति की तरह उन्हें बताते और सिखाते हैं जिन्हें नहीं पता या कहीं से पढ़कर ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते। स्वाति के पूरे ग्रुप की जितनी सराहना की जाए कम ही होगी। अगर ऐसे ग्राउंड लेवेल पर काम होने लगे तो सच मानें कुछ ही सालों में जगह जगह बात करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हम सबको खुद पता होगा और बिना किसी पूर्वग्रह के आगे बढ़ते जाएंगे।