साइकिल हमें एक जिम्मेदार नागरिक बनाती है : रश्मि बक्शी नय्यर

Rashmi Bakshi

सीरज सक्सेना

‘किस्से साइकिल के’ श्रृंखला की तीसरी कड़ी की अतिथि हैं साइकिलिस्ट सुश्री रश्मि बक्शी नय्यर। इस दिनों रश्मि नोएडा के साइकिल समूह (Zeal for Wheel Noida) की सह-संस्थापक हैं। यह साइकिल प्रेमियों का समूह इन्ही के प्रयासों से बना है। सप्ताह में तीन बार इस समूह के सदस्य सुबह साइकिलिंग करते हैं। रश्मि हमेशा महिलाओं को साइकिल अपनाने के लिए प्रेरित करती रहतीं हैं।

आस -पास के सारे काम जैसे दवाई, सब्जी, फल आदि लाने के लिए रश्मि साइकिल का की प्रयोग करतीं हैं। इसी तरह उन्हें साइकिल पर देख कुछ और लोग भी प्रेरित हुए और इस ग्रुप की स्थापना हुई। 2013 में हुई ‘डेज़र्ट 500’ साइकिल प्रतिस्पर्धा में रश्मि रेस मार्शल भी रह चुकी हैं तथा 2015 में शिमला ट्राइथोलोन में भी हिस्सा ले चुकीं हैं। इस वर्ष इस स्पर्धा में कुल पचास लोगो ने हिस्सा लिया था। सिर्फ दो महिलाएं थी और रश्मि उनमें एक थीं। इस स्पर्धा में पहाड़ों की ऊंचाई और ढलान पर साइकिल चलाने के आलावा पहाड़ पर चढना और नदीं में राफ्टिंग करना भी शामिल था।

पहली साइकिल

रश्मि का जन्म जम्मू में हुआ। उस वक्त उनके पिता भारतीय सेना में थे। भारतीय सेना के स्वच्छ और अनुशासन पूर्ण वातावरण में उन्हें बाहर ही अधिक खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। वे कैंटोनमेंट क्षेत्र में साइकिल से ही घूमती थीं। अपने बचपन की पहली साइकिल के बारे में उन्हें आज भी अच्छी तरह याद हैं। वे कहती हैं कि उनके पिता ही उनके लिए एक छोटी साइकिल भेंट स्वरूप लेकर लाए। वे हवाईअड्डे के बाहर खड़ी दूर से उन्हें और उनकी पास उस छोटी साइकिल को देख रहीं थी। वे बहुत उत्साहित व खुश थीं। उन्हें यह समझने में कतई देर नहीं लगी कि उनके पिता उन्ही के लिए साइकिल ले कर आए हैं। जब वे अपने पिता के पास पहुंचीं तब पिता से मिले बगैर उन्होंने सीधे साइकिल को गले लगाया। रश्मि उस वक्त मात्र तीन या चार बरस की रहीं होंगी पर उन्हें अपनी पहली साइकिल के मिलने की कहानी अब भी याद हैं।

पहली ग्रुप एडमिन

रश्मि के शौहर भी भारतीय सेना में अधिकारी हैं। वे कुछ वर्ष पहले ही बबीना से लौटीं हैं और नोएडा आते ही उन्होंने यह ग्रुप बनाया हैं। जब वे नोएडा में थीं तब नोएडा साइक्लिस्ट के संस्थापक और प्रबंधक अनुज श्रीवास्तव (जो कि उस वक्त भारतीय सेना में अधिकारी थे) उनका तबादला जयपुर हो गया और उन्होंने रश्मि को नोएडा साइक्लिस्ट समूह का ग्रुप एडमिन बना दिया। इस तरह रश्मि किसी साइकिल समूह की पहली ग्रुप एडमिन बनीं। रश्मि ने इस ग्रुप में रहते हुए कई साइकिल सैर आयोजित की जिनमे महिलाओं के लिए विशेष रूप से कुछ कार्यक्रम बनाए गए थे। रश्मि का साइकिल के प्रति उत्साह देख समूह में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ।

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इस समूह को अपने 20-25 सदस्यों के साथ इंडिया गेट पर अक्सर देखा जा सकता था। एक सुबह जब मैंने अपनी साइकिल से इस समूह को देखा यह समूह इंडिया गेट की ओर जा रहा था मेरे साथ मेरी मित्र वासु भी थी हम अपनी अपनी साइकिल से आते और अक्षरधाम पर मिलते और वहां से साथ-साथ इंडिया गेट, चाणक्यपुरी, खान मार्किट, राष्ट्रपति भवन होते हुए दिल्ली को उसकी सुबह में देखते हुए घर लौटते। वासु के पास ‘फेल्ट’ रोड साइकिल हैं उनकी साइकिल वे जिस गति से दौड़ाती हैं कि उनके साथ -साथ चल पाना उनके पीछे दौड़ने जैसे होता हैं। वे भी जल्द ही हमारे इस मेरा रंग ‘किस्से साइकिल के’ लाईव कार्यक्रम की एक अतिथि रहेंगीं।

पक्षियों में बढ़ी दिलचस्पी

रश्मि और उनके समूह से वासु ने ही मिलवाया था। उस दिन हम उस समूह के साथ नोएडा की ओर गए थे। उस समूह के अन्य सदस्य भी मित्र बन गए और इस तरह दिल्ली की सड़क पर हमारे साइकिल समाज का विस्तार हुआ। जब रश्मि बबीना गई तो वहां अपनी साइकिल भी ले गईं। उन्होंने वहां भी स्थानीय महिलाओं के साथ मिल ‘बबीना साइक्लिस्ट’ समूह की स्थापना की। बबीना एक छोटी खुली जगह हैं। अपनी साइकल से वे जब शहर से कुछ दूर जाती तो तरह -तरह के पक्षी देखतीं। यहीं से उनकी पक्षियों के प्रति दिलचस्पी बढ़ी। जिस्का श्रेय भी साइकिल को ही जाता है। साइकिल हमें अपने ही आसपास के बारे में कितना कुछ बताती और दिखाती है यह कोई साइकिल चलने वाला ही समझ सकता है।

रश्मि कहती हैं कि साइकिल सेहत ही नहीं हैं बल्कि साइकिल उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक भी बनाती हैं। साइकिल चलाते हुए हम न तो प्रदूषण फ़ैलाने में योगदान देते हैं न ही किसी तरह का शोर और न ही साइकिल की उपस्थित से किसी अन्य मोटर वाहन की तरह गति का आतंक होता हैं। रश्मि मानतीं हैं कि साइकिल चलाने वाले विश्व के अच्छे और सभ्य नागरिक होते हैं। मेरा यह मानना हैं कि साइकिल चलाने वालों को शासन द्वारा चिन्हित कर सम्मानित करना चाहिए और सायकल पथ पर शासन द्वारा संचालित साइकिल वर्कशॉप भी होनी चाहिए।

साइकिल पथ की दुर्दशा

साइकिल पथ के बारे में रश्मि कहती हैं कि उन्होंने अपने ग्रुप के साथ मिल कर दिल्ली के साइकिल पथ पर होने वाले अतिक्रमण के बारे में प्रशासन को कई बार कहा हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स के समय बने सुन्दर साइकिल पथ की हालत अब दयनीय हैं। देख-रेख की कमी की वजह से वहां कही कूड़ा, फूटी बोतलें बिखरी रहतीं हैं तो कहीं बड़े वाहन खड़े रहते हैं। इसकी वजह से साइकिल पथ पर साइकिल चलाना खतरनाक हैं। आज जब लोक डाउन के वक्त लोग घरों में हैं। उनकी ऊर्जा का स्तर भी कम हुआ है और जब भी उन्हें बाहर जाने का मौका मिलता ही वे साइकिल से जाना पसंद कर रहे हैं।

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ऐसे सही समय में शासन को भी आगे आकर साइकिल प्रेमियों का उत्साहवर्धन करना चाहिए। सभी साइकिल पथ दुरुस्त करना चाहिए तथा और भी साइकिल पथ का निर्माण करना चाहिए। अन्य वाहनों की संख्या सड़कों पर कम होती हैं इसलिए हम सुबह साइकिल चलाते हैं। अगर हमारी सड़कों के साथ पर्याप्त साइकिल पथ हों तो हम दिन के किसी भी वक्त साईकिल बिना यातायात के भी के साइकिल चला सकते हैं। अतः साइकल चालक मुख्य सड़क पर तमाम जोखिम के साथ साइकिल चलाने पर मजबूर हैं। सुबह यातायात पुलिस को भी साइकिल सवारों की हिफाजत के लिए तत्पर रहना चाहिए। सुबह महिला साइक्लिस्ट की सुरक्षा के लिए भी गार्ड तैनात किए जाने चाहिए।

रश्मि भी साइकिल चलाते हुए हेलमेट और दस्ताने पहनने को बहुत ही अनिवार्य मानतीं हैं।

फोटोः त्रिभुवन देव

सीरज सक्सेना समकालीन चित्र कला तथा सिरेमिक आर्ट का जाना-पहचाना नाम है। एक जाने-माने आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे साइकिल और पर्यावरण प्रेमी हैं। वे उन गिने चुने कलाकारों में हैं जो नियमित रूप से लेखन भी करते हैं।  मेरा रंग के लिए वे देश के चुनिंदा साइक्लिस्ट के साथ संवाद की एक सिरीज़ कर रहे हैं।