फ़िरोज़ा सुरेश : मुलुंड की साइकिलवाली से मुंबई की साइकिल मेयर बनने का सफर

Firoza Suresh

सीरज सक्सेना

मेरा रंग ने फेसबुक पर एक नयी श्रृंखला शुरु की है ‘किस्से साइकिल के’। इस श्रृंखला के तहत देश में विभिन्न शहरों के कुछ खास लोगों के जीवन में साइकिल के प्रति उनके प्रेम और महत्त्व पर चर्चा होगी। इस कार्यक्रम की पहली अतिथि हैं मुंबई की फ़िरोज़ा सुरेश।

साइकिल की दीवानी

फ़िरोज़ा का जन्म मुंबई के मुलुंड क्षेत्र में हुआ वहीं उनका बचपन बीता। बचपन से ही उन्हें साइकिल के प्रति आकर्षण रहा हैं। उन दिनों छोटी साइकिल तीस पैसे में एक घंटे के हिसाब से किराए पर मिलती थी। फ़िरोज़ा ने मुलुंड पार्क में सायकल सीखी। बाज़ार से सब्ज़ी और पढ़ने लिखने की सामग्री के लिए भी वे साइकिल से ही जाती थीं।

जब वे बारह वर्ष की हुईं तब उनके चाचा ने साइकिल के प्रति उनकी दीवानगी देख उन्हें एक पुरानी सायकल भेंट की। फ़िरोज़ा अब ट्यूशन पढ़ा कर कुछ पैसा कमाने लगीं थीं। साइकिल से अब उन्होंने कुछ लम्बी दूरी तय करना शुरू किया। मुलुंड कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स से बी.कॉम करने के दौरान वे ही एक मात्र छात्रा थीं जो साइकिल से कॉलेज आती थीं। धीरे-धीरे पैसे एकत्र कर उन्होंने अपनी पहली साइकिल बीएसए स्ट्रीट केट खरीदी।

साइकिल से दफ्तर

माँ को उनका अधिक साइकिल चलाना चिंतित करने लगा था। उन्होंने अब फ़िरोज़ा पर सलवार कमीज़ पहनने के लिए दबाव डालना शुरू किया। पर फ़िरोज़ा जींस टी शर्ट पहने अपनी धुन में मस्त साइकिल से अपनी दुनिया का सृजन करने में मग्न रहीं। पढ़ाई पूरी हुई और अब फ़िरोज़ा नौकरी करने लगी। मुंबई की जीवन रेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेन में धक्का मुक्की उन्हें रास नहीं आयी और टेक्सी या ऑटो उनके लिए खर्चीला सौदा था। अतः फिरोज़ा ने दफ्तर भी साइकिल से जाना शुरू किया।

पढ़िए ‘किस्से साइकिल के’ : एक मित्रता जिसकी शुरुआत साइकिल से हुई

अब यह मुलुंड की साइकिल वाली लड़की मुलुंड के बाहर भी पहचाने जाने लगी। उनका मुंबई के अखबारों में भी जिक्र होने लगा। 1996 में सुरेश से विवाह के पश्चात वे जुहू में रहने लगीं। कुछ वर्षों घर संभालने के दौरान वे साइकिल नहीं चला पायीं और 2010 में उन्होंने पूरे जोश के साथ मुंबई साइक्लाथोन में भाग लेने के लिए तैयारी की और उस प्रतियोगिता में भाग लिया। अब उनके पास एक बेहतर साइकिल थी जो उन्होंने अपने ही पैसों से खरीदी।

मुंबई की साइकिल मेयर

जब शादीशुदा औरतें अपनी बचत और कमाई के पैसों से स्वर्ण खरीदतीं हैं, फ़िरोज़ा ने पच्चीस हजार मूल्य की साइकिल खरीदी। उस वक्त यह एक बड़ी रकम हुआ करती थी। उन्हें इस निवेश से कभी खेद नहीं हुआ और साइकिल ने उन्हें अपने शहर ही में नहीं बल्कि विदेशों में भी एक अनोखी पहचान दिलाई। एम्स्टरडम की एक संस्था (जो विश्व भर के नगरों में सायकल को बढ़ावा देने के लिए महत्त्वपूर्ण काम करती हैं) ने उन्हें मुंबई का साइकिल मेयर चुना। यह पदवी मिलने के बाद फ़िरोज़ा के साथ मुंबई महानगर पालिका ने भी साइकिल को शहर में बढ़ावा देने के लिए कई महत्त्वपूर्ण काम किए हैं।

स्मार्ट कम्यूट फाउंडेशन की स्थापना कर फ़िरोज़ा ने मुंबई शहर के साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित व सुलभ पार्किंग स्थल बनाए, मुंबई की सडकों को दुरुस्त करने और छोटी दूरी के लिए लोगो को साइकिल अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। हाल ही में फ़िरोज़ा और उनकी संस्था ने मुंबई में “साइकिल चला सिटी बचा” मुहीम शुरू की हैं इसके तहत मुंबई के 24 वार्डों में 24 बाईसिकल कॉन्सुलर नियुक्त किए जाएंगे और वर्ष 2030 तक पुरे मुंबई को देश की साइकिल राजधानी बनाने का लक्ष्य हैं। इस मुहीम के अंतर्गत लोगो को अधिक से अधिक अपने दैनिक जीवन में सायकल चलाने और शहर को साइकिल चालकों के लिए सुरक्षा और सुविधाएं प्रदान करने की अपील की जा रही हैं।

स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ साइकिल अपनाने के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यशालाएं भी आयोजित की जा रहीं हैं। आज फ़िरोज़ा को सिर्फ मुंबई के ही नहीं बल्कि पुरे देश के साइकिल प्रेमी जानते हैं और उनके काम को दुनिया भर में सराहा जा रहा हैं।

Siraj Saxena
फोटोः त्रिभुवन देव

सीरज सक्सेना समकालीन चित्र कला तथा सिरेमिक आर्ट का जाना-पहचाना नाम है। एक जाने-माने आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे साइकिल और पर्यावरण प्रेमी हैं। वे उन गिने चुने कलाकारों में हैं जो नियमित रूप से लेखन भी करते हैं।  मेरा रंग के लिए वे देश के चुनिंदा साइक्लिस्ट के साथ संवाद की एक सिरीज़ कर रहे हैं।