‘साइकिलसूत्रा’ के संस्थापक आशीष नागपाल से मिलिए, जिन्हें लोग ‘साइकिल बाबा’ कहते हैं

साइकिल बाबा आशीष नागपाल

सीरज सक्सेना

मेरा रंग ‘किस्से साइकिल के’ में हर इतवार एक अनूठे साइकिलिस्ट से बात होती हैं। इस बार मेरा रंग की इस विशेष श्रृंखला में अतिथि रहे नोएडा साइकिलसुत्रा के संस्थापक आशीष नागपाल। आशीष इन दिनों देश की मशहूर साइकिल कंपनी हीरो के साथ जुड़े हैं। वे एटलस और फ़ायरफ़ॉक्स साइकिल कंपनीयों में भी काम कर चुके हैं। आशीष ने एनिमेशन और बीएफएक्स में मास्टर डिग्री हासिल कर चुके हैं। उनका स्वभाव रचनात्मक है।

जब दिल्ली में मैंने साइकिल शुरू की थी तब साइकिलसूत्रा समूह के साथ साइकिल चलाई। दिल्ली में इस समूह के साथ साइकिल से कई ऐसी सुंदर और महत्त्वपूर्ण जगहें देखीं जो सामान्यतः दिल्ली में रहने वाले नागरिक नहीं देख पाते। आज भी साइकिलसूत्रा समूह सक्रीय हैं। होली, दीवाली तथा अन्य विशेष दिनों इस समूह द्वारा विशेष राइड आयोजित की जाती हैं। फन एंड फ़ूड राइड भी इस समूह के सदस्य मिल कर करते हैं। दिल्ली के मशहूर छोले भठूरे, छोले कुलचे, पकोड़े तथा दक्षिण भारतीय व्यंजन के लिए मशहूर रेस्त्रां ‘मैसूर कैफे’ आदि भी साइकिल से ही खोजे हैं। अपनी रचनात्मक दृष्टि से आशीष हर राइड को विशेष बनाने की भरसक कोशिश करते हैं। तस्वीरें भी वे मन से लेते हैं। उन्हें फोटोग्राफी का भी शौक है। एक समय इस ग्रुप की तस्वीरें देखने के लिए साइकिल प्रेम इस समूह के फेसबुक पेज की हर अपडेट और पोस्ट की प्रतीक्षा करते थे। धीरे-धीरे समूह के कुछ लोग अपनी नौकरी के सिलसिले में विदेश चले गए और आशीष भी अपने काम में व्यस्त हो गए। पर समूह के सक्रीय सदस्य आज भी हफ्ते में दो दिन राईड करते हैं।

आशीष हाल ही में देहरादून से दिल्ली आए हैं। सुबह से उनके इलाके में बिजली नहीं थी आज शाम लाईव होना मुश्किल लग रहा था। आशीष के मोबाइल की बैटरी भी एक घंटे की इस लाईव बातचीत के लिए काफी नहीं थी। गनीमत हैं कि समय से पहले ही बिजली आ गयी उनका इलाका रोशन हुआ और यह लाइव बिना तकनीकी विघ्न के संपन्न हुआ। इस तरह के अनुभव लाइव को और जीवंत बना देते हैं। हालांकि बहुत देर तक लाइव होने न होने के बीच तनाव बना रहा।

बचपन की साइकिल

तो बात आशीष के बचपन और बचपन में साइकिल के अनुभव से शुरू हुई। वे कहते हैं कि वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं उन्हें बचपन में सिर्फ जरुरी और सीमित वस्तुएं ही मिल पाती थीं। वे कहते हैं कि जब मैं स्कूल में था तब पापा से कहा कि मुझे साइकिल चाहिए वे मुझे एक साईकिल की दूकान पर ले गए। मेरा बड़ा मन था कि मैं उस वक्त हर बच्चे की पसंदीदा साइकिल ‘हीरो रेंजर’ लूँ पर पापा में मुझे एक काली साइकिल जो ज्यादातर दूध वाले चलाते हैं दिला दी। उस वक्त उसे इंडिया की रोडस्टर साइकिल कहा जाता था। जब मैं इस साइकिल से स्कूल जाता था तो मुझे शर्म आती थी। मेरे सभी सहपाठी फैंसी साइकिल से स्कूल आते थे और मैं एक सामान्य साइकिल से आता था।

मेरे मन में इस वजह से हीन भावना ने घर कर लिया था। इस साइकिल पर दूध वाले घर घर जा कर दूध वितरण करते थे। मेरे दोस्तों ने भी मुझे दूध वाला कहना शुरू किया। वे कहते थे कि अब दूध वाला आने वाला है। इस हीन भावना के प्रभाव में मैंने साइकिल चलाना छोड़ दिया। फिर जब दस वर्ष बाद मुझे मौका मिला याने जब मैं अपने लिए एक साइकिल लेने में सक्षम हुआ तब मैंने उस वक्त की सबसे बढ़िया साइकिल खरीदी। यह साइकिल थी हरक्यूलिस की एक्ट 110 यह साइकिल मैंने उस वक्त नोएडा की एक मात्र साइकिल दूकान राजेश साईकल्स से खरीदी थी। उस वक्त आज की तरह साइकिल नहीं मिलती थीं। फ़ायरफ़ॉक्स ब्रांड भारत में आया ही था। पर मेरे पास उस वक्त की पहली डिस्क ब्रेक साइकिल थी। धीरे- धीरे मैंने अच्छी साइकिल खरीदी और आज मेरे पास दस साइकिल हैं। मुझे एमटीबी (माउंटेन बाइक) पसंद है शायद इसलिए कि मेरी मेरी शुरुवात इसी साइकिल से हुई है।

‘साइकिलसूत्रा’ की कहानी

साइकिल बाबा आशीष नागपाल
साइकिलसूत्रा के संस्थापक आशीष नागपाल

साइकिलसूत्रा समूह बनाने की कहानी बताते हुए आशीष ने कहा कि नोएडा में उस वक्त सिर्फ एक ही साइकिल समूह था ‘नोएडा साइक्लिस्ट’, अनुज श्रीवास्तव ने यह समूह बनाया था। और नोएडा में उन्होंने ही समूह में साइकिल चलाने की प्रथा शुरू की है। इस समूह के पहले मुख्य सदस्य थे अनुज श्रीवास्तव, अभय देसाई, नीरज, अरुण वर्मा, विकास कनव, संजय, कृष्णा भटनागर। नीरज और मालविका दंपत्ति हैं- जो साइक्लोप नामक एक साइकिल समूह के संथापक हैं। जब मैंने अपनी साइकिल सैर के दौरान एक सुबह नोएडा के ब्रह्मपुत्र बाज़ार की ज्यूस शॉप पर इस समूह के साइकिल चालकों को देखा और उनसे मिल कर उनके इस समूह में शामिल होने की बात कही।

उन्होंने सहर्ष मुझे अपने समूह में शामिल किया पर मेरे जीवन में एक बार फिर कमतरी का एहसास हुआ। अपनी साइकिल को मैं एक अच्छी साईकिल समझता था पर उन सब के पास ट्रेक साइकिल थी जो आज भी एक बहुत ही बेहतर साइकिल मानी जाती हैं। तब मैं फिर राजेश साइकिल्स के पास गया और उनसे कहा कि आप मुझे वैसी ही साइकिल दीजिए जैसी आपने नोएडा साइक्लिस्ट समूह के सदस्यों को दी हैं। तब उन्होंने मुझे ट्रेक 3700 एमटीबी दी। मैंने एक साल तक इन लोगों के साथ खूब साइकिल चलाई। फिर अनुज जी जयपुर चले गए कुछ और सदस्य भी अपने काम में मशगूल हो गए। अमन पुरी ने नोएडा में ‘नॉएडा साइक्लिंग क्लब’ बनाया इस ग्रुप के साथ भी मैंने साइकिल चलाई हैं। उस वक्त इस क्लब में युवाओं की बहुलता थी।

मुझे धूम्रपान करने की बुरी आदत थी पर अब मैं कुछ सालों से धूम्रपान त्याग चुका हूँ। जब समूह में साइकिल चलाते हुए छोटे विराम के लिए हम रुकते तो मैं अपनी सिगरेट जलाता एक बार मुझे किसी से कहा कि आप साइकिल चलाते हुए सिगरेट नहीं पी सकते है। यह टोकना अच्छा नहीं लगा मुझे लगा कि यह मेरी निजी आदत या लत हैं किसी और को इसके लिए रोकना टोकना नहीं चाहिए। फिर चाहे यह एक बुरी आदत ही क्यों न हो। उस दिन मैं दिन भर सोचता रहा कि अब कौन सा समूह बनाए ? क्या नाम रखें ? मैं कुछ ढूंढ रहा था। मुझे एक कलाकार द्वारा बनाया गया कोमासूत्रा दिखा जो उन्होंने अंग्रेजी भाषा में उपयोग में आने वाले ‘कोमा’ से प्रेरित हो कर बनाया था। इसे ही देख मुझे साइकिलसूत्रा नाम का विचार आया और मैंने इसी नाम से अपना साइकिल समूह बनाया। इस नाम की वेबसाइट भी उपलब्ध थी। चूँकि मार्केटिंग भी मेरा क्षेत्र हैं इस लिए मैंने देखा कि यह ब्रांड सोशल मीडिया इंटरनेट आदि सभी जगह अपनी जगह बना सके। यह साइकिल और साइकिल चालक के बीच की कड़ी भी हैं। दोनों को जोड़ने वाला सूत्र हैं- ‘साइकलसूत्रा’।

साइकिल वाले दोस्त

अपने समूह की पहली राइड आज भी याद है जिसमे उषा, अश्विन, प्रशांत गुप्ता तथा दो और लोग थे। इस तरह हमने एक समूह बनाया। हमने यह समूह सिर्फ साइकिल चलाने के लिए ही नहीं बनाया था। इस ग्रुप में किसी भी प्रकार की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी हमारे सभी सदस्य तीस वर्ष के ऊपर ही थे जो अपनी नौकरी या अन्य पेशे में व्यस्त थे और साइकिल जीवन में आ चुकी एकरसता को थोड़ा खंडित करने के लिए चलाते थे। हम सभी की सोच में भी कुछ समानता थी। हम होली की सुबह साइक्लोमिलन राइड भी करते हैं और खान मार्केट जाकर होली मिलन करते हैं और पकोड़ा खाते हैं इसी तरह हमने आमासूत्रा राइड भी की हैं जिसमे हमने खूब आम खाए। इसी तरह बनाना राइड भी हुई।

कभी किसी डरावनी जगह जाते हैं तो कभी पुरानी दिल्ली में आलू पूरी खाने जाते हैं। दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों को भी हमने साइकिल से देखा हैं। दिल्ली की बावलियां भी हमने साइकिल से देखीं हैं। उग्रसेन की बावली तो हम सभी को बार बार जाना पसंद हैं। महरोली भी हम साइकिल से देखने जाते हैं। आशीष कहते हैं कि मैं उस वक्त एक विज्ञापन कंपनी के लिए काम कर रहा था उस दफ्तर में तरह तरह के सहकर्मी थे। कोई दिल्ली के मशहूर खान पान के ठिकाने का जानकार था तो कोई मोटर बाइक सवार। इस तरह हमने दिल्ली के मशहूर सीताराम के छोले कुलचे साइकिल से खोजे और खाए भी। इस लॉकडाउन मैं जब में देहरादून में था तब भी मैंने देहरादून के आस पास साइकिल से कई नए रास्ते और जगहें खोजी हैं।

समूह में सब को साथ ले कर चलना आसान नहीं हैं पर समान सोच के लोग ही एक साथ किसी भी तरह का लंबा सफर तय कर सकते हैं। समूह के लिए अपना समय व जज़्बा भी ईमानदारी से देना होता हैं और यह कोई व्यावसायिक गतिविधि भी नहीं हैं। साइकिल के प्रति प्रेम और दीवानगी की व जहसे ही हम सभी एक साथ एक सूत्र में बंधे हैं। घर आकर राइड के दौरान ली गयी तस्वीरों को मैं चुनता था और फिर उन्हें पोस्ट करता था यह काम कभी कभी तो साढ़े ग्यारह तक भी चलता था। और तब कहीं जाकर मैं अपना व्यावसायिक काम शुरू कर पाता था। समूह को चलाने के लिए उदारता और धैर्य का होना अत्यंत आवश्यक हैं। वरना ग्रुप बनाना आसान हैं पर उसे इतने सालों सक्रियता से विखंडित हुए बगैर चलायमान रखना जोखिम भरा काम हैं।

साइकिल कैसे चलाएँ?

साइकिल बाबा आशीष नागपाल
साइकिल बाबा आशीष नागपाल

इन दिनों जब साइकिल पूरे देश में जोश के साथ चलाई जा रही हैं। साइकिल चलाने का सही तरीका क्या होना चाहिए इस प्रश्न का बड़ा ही रोचक उत्तर आशीष ने दिया वे कहते हैं कि हमारे देश में दो करोड़ साइकिल हर वर्ष बेची जाती हैं जिसमे अस्सी लाख सिर्फ हीरो कंपनी बनाती हैं। इसमें से कितने लोग सही ढंग से साइकिल चलाते होंगे शायद बहुत ही कम होंगे। जब भी आप साइकिल की सीट पर बैठे तब आपकी एड़ी साइकिल के पेडल पर रहनी चाहिए और आपका पैर सीधा रहना चाहिए। यह सही साइकिल चलाने का एक सूत्र हैं। य

दि आप खेल के उद्देश्य से साइकिल चलाना चाहते हैं तब जरूर कुछ व्यावसायिक बातों का गंभीरता से पालन करना जरुरी हैं और अगर आप सिर्फ सैर, आनंद और खुद के लिए ही साइकिल चलाना चाहते हैं कुछ भी ध्यान रखने की जरूरत नहीं हैं। आपकी सीट की ऊँचाई अगर ठीक नहीं है तो निकट भविष्य में कोई न कोई आपको आपके लिए सीट की सही ऊँचाई के बारे में जरूर बता देगा। यह बात सही भी हैं क्योकि जब मैंने भी साइकिल चलाना शुरू की थी तब मेरी सीट भी हर नए साइकिल सवार की सीट की तरह नीचे ही थी और मेरे घुटने भी साइकिल चलाते वक्त मुड़े ही रहते थे तब मुझे भी समूह के किसी मित्र ने ही मेरी सीट की ऊंचाई सही की थी। इसके अलावा कुछ और भी छोटी पर महत्त्वपूर्ण बातें साइकिल चलाने के दौरान सड़क पर होने वाली साइकिल कक्षा में ही सीखी हैं।

इस बात को अच्छे से समझाते हुए उन्होंने फोटोग्राफी का एक सबक साझा किया। आशीष के पिता दिल्ली ललित कला महाविद्यालय में फोटोग्राफी और कला विषय पढ़ाते थे। जब आशीष का फोटोग्राफी सीखने की ओर रुझान बढ़ा तब उन्होंने अपने पिता से प्रश्न किया कि फोटोग्राफी के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात क्या होती हैं जो हमेशा ध्यान रखना चाहिए। इस प्रश्न के जवाब में अपना कैमरा देते हुए आशीष के पिता से आशीष से कहा कि बहार गमले में जो गुलाब का पौधा हैं उस पर एक फूल खिला है तुम हर पंद्रह मिनट में उसकी एक तस्वीर लो और शाम को मुझे दिखाओ।

आशीष ने वही किया उस गुलाब के पौधे की कई तस्वीरें उन्होंने दिन भर में लीं और शाम को अपने पिता को दिखाईं पिता ने उनसे पूछा कि तुमने आज क्या सीखा। आशीष को फोटोग्राफी के लिए प्रकाश के निरंतर बदलाव का महत्त्व समझ आया। उनके पिता ने कहा कि तस्वीर लेने के लिए जिस जगह से आप तस्वीर ले रहे हैं वह बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। ठीक इसी तरह साइकिल चलाते हुए हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है और साइकिल चलाने का सही ढंग भी हमें साइकिल ही सिखाती हैं।

साइकिल और कॅरियर

मैं विज्ञापन क्षेत्र से हूँ इसलिए मैंने साइकिल को अपनाया। मैं अपनी नौकरी के दौरान बड़े पदों पर भी रहा हूँ। और अगर सिर्फ अपनी व्यावसायिक बढ़त पर ध्यान देता तो आज मैं अधिक कमा रहा होता। मैंने साइकिल के प्रति प्रेम के चलते कई बड़े जॉब छोड़े हैं। देश में सिर्फ चार ही कम्पनियां हैं जो साइकिल बनाती हैं पहली हीरो दूसरी टीआई साइकिल (बीएसए) जो दक्षिण भारत में हैं और तीसरी एटलस और एवन जो लुधियाना में हैं।

चूँकि में नोएडा (दिल्ली) में रहता हूँ और यहीं काम करने का मन हैं और इन दिनों हीरो साइकिल के साथ परामर्शदाता की तरह काम कर रहा हूँ। मैंने विज्ञापन की नौकरी छोड़ कर साइकिल कंपनी में काम करना शुरू किया। साइकिल कंपनियों में मैं क्रिएटिव डाइरेक्टर के पद पर रहा। शुरू में मुझे लगा था कि शायद मैंने अच्छी नौकरी छोड़कर गलत निर्णय लिया हैं पर अब ऐसा नहीं लगता। साइकिल से मेरा स्वास्थ्य अच्छा रहता हैं। मैं जो पहले काफी वजनी था अब सामान्य और स्वस्थ हूँ।

मुझे लगता हैं कि अपने देश में अगले पांच साल साइकिल उद्योग के लिए निर्णयात्मक और महत्वपूर्ण रहेंगे। हम देख ही रहे हैं कि जिस तरह की साइकिल हम चलाते हैं वो साइकिल अब बाज़ार में उपलब्ध नहीं हैं। साइकिल उद्द्योग को अब आत्मनिर्भर बनाना होगा। अभी तक हम काफी हद तक चीन पर निर्भर रहे हैं। पर अब साइकिल उद्योग के लिए सकारात्मक समय हैं और हमें अब अच्छीं साइकिल बनाने की बहुत जरूरत हैं।

आशीष को साइकिल प्रेमी बाबा के नाम से जानते हैं और वे भी इस नाम से खुश हैं। आशीष हर बात पर अपना मत रखने के लिए भी जाने जाते हैं वे अपनी बात पर कायम रहते हैं और साइकिल का भी उन्हें अच्छा ज्ञान हैं। जो भी साइकिल मैं लेता था उसे पूरा खोल कर पुनः जोड़ देता था। इसी वजह से उन्हें मित्रगण बाबा कह कर बुलाने लगे। देहरादून में उनके एक मित्र ने हाल ही में ईंट बनाने का कारोबार शुरू किया हैं वे खुद भी साइकिल चलाते हैं और उन्होंने अपनी पहली ईंट भी बाबा के लिए ही बनायी हैं जिस पर हिंदी में बाबा लिखा हैं। इस ईंट से बाबा के लिए मित्रों के प्रेम को समझा जा सकता हैं। गुप्त रोग के विज्ञापन भी मुझे आकर्षित करते रहे हैं और इसी को ध्यान में रख कर मैंने भी एक साइकिल का विज्ञापन बनाया जो काफी चर्चित रहा हैं। साइकिल ने ही देखने की कई खिड़कियाँ खोली हैं। सुबह साइकिल चलाने के दौरान जो भी दृश्य और विचार मन में आते हैं उन्हें मैं सहेजता हूँ और अपने काम में भी उसका समय- समय पर उपयोग करता हूँ।

मैंने एक कॉफी टेबल बुक भी बनाई हैं जो मेरे साइकिल प्रेम का ही परिणाम हैं। इसे मैं व्यावसायिक नहीं बनाना चाहता हूँ। हम चाहें तो हमारे साइकिल चालकों के लिए (जो इस कठिन समय में काम नहीं कर पा रहे हैं) कुछ अनुदान भी इकठ्ठा कर सकते हैं। अंत में महिला चालकों के लिए कुछ कहने पर बाबा कहते हैं कि अगर आप किसी अकेली महिला को देखे जो सड़क पर साइकिल चला रही हो और उसे कुछ लोग परेशान कर रहें हों तो ऐसे मौके पर उस महिला साइकिल चालक के पीछे या उसके साथ आप साइकिल चलाएं। जिससे लोगों को लगे कि उस महिला के साथ कोई हैं और वो अकेली नहीं हैं। सिर्फ इतना करने से ही महिला को भी हिम्मत मिलेगी और उसे परेशान कर रहे लोग भी उससे दूर हो जाएंगे। आपको उस महिला से बात करने की भी जरूरत नहीं हैं। सिर्फ आपकी उपस्थिति ही उसे सुरक्षा देने के लिए काफी हैं। अकेली साइकिल चलाने वाली महिला दुर्भाग्य से हमारी सड़कों पर सुरक्षित नहीं हैं और न ही हमारी सडकों पर साइकिल चालकों के लिए साइकिल पथ बने हैं।

आशीष बताते हैं कि एक बार वे एक्सप्रेस-वे पर साइकिल से अपने दफ्तर जा रहे थे। वे उस वक्त हीरो कंपनी में काम कर रहे थे। रास्ते में एक महिला अपनी कार के पन्चर हो चुके पहिए को बदलने के लिये संघर्ष कर रही थी और मुझे भी दफ्तर पहुंचने में देर हो रही थी और उस दिन हमारे दफ्तर में एक महत्त्वपूर्ण मीटिंग थी। मैंने थोड़ा सोचा और फिर अपनी साइकिल को कार के पास खड़ा किया और उस महिला की कार का पहिया बदला। दफ्तर पंहुचा तो अधिकारीगण मुझसे देरी का कारण पूछने लगे मैंने उन्हें सारी बात बतायी और तस्वीरें भी दिखाई। सभी ने मीटिंग के लिए हुई देरी के लिए मुझे क्षमा किया और मीटिंग का समय बढ़ाया गया। बाबा कहते हैं कि साइकिल आपको एक अच्छा मनुष्य भी बनाती हैं। आपको उदार बनाती हैं।

इस लाइव के अंत में बाबा ने अपनी सारी साईकलें दिखाईं जिसे उन्होंने बहुत ही सजा कर रखा है और उनके घर के आतंरिक साज-सज्जा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं साइकिलें। वैसे भी अपना घर हमारे अस्तित्व को दिखाता ही है। मेरा रंग साइकिल समूह (जो जल्द ही अपनी पहली राइड करने वाला हैं) के लिए भी आशीष अपना मार्गदर्शन देंगे।

Siraj Saxena
फोटोः त्रिभुवन देव

सीरज सक्सेना समकालीन चित्र कला तथा सिरेमिक आर्ट का जाना-पहचाना नाम है। एक जाने-माने आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे साइकिल और पर्यावरण प्रेमी हैं। वे उन गिने चुने कलाकारों में हैं जो नियमित रूप से लेखन भी करते हैं। मेरा रंग के लिए वे देश के चुनिंदा साइक्लिस्ट के साथ संवाद की एक सिरीज़ कर रहे हैं। 

 

 

English summery

  • Ashish Nagpal, founder of Noida CycleSutra. Ashish is currently associated with the country’s famous bicycle company Hero. He has also worked at Atlas and Firefox Cycle Companies. Ashish holds a master’s degree in animation and BFX. His nature is creative.