अंकित : एक योगी, एक युवा साइकिल यात्री

Ankit

सीरज सक्सेना

अंकित राजस्थान के अजमेर के रहने वाले हैं। पिछले तीन सालों से वे अपनी साइकिल से अपना देश देख रहें हैं। अब तक वे पंद्रह राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों की यात्रा कर चुके हैं। अंकित इस तरह यात्रा करने वाले, अपने देश को करीब से देखने और महसूस करने वाले एक अनूठे और बिरले साइकिल यात्री हैं। इस उम्र में हमारे देश के युवा जब व्यावसायिक जीवन में सफल होने की होड़ में रमे रहते हैं वहीं अंकित ने अपनी नौकरी छोड़ कर भारत भ्रमण करना चुना। अपनी युवा ऊर्जा पर यकीन करते हुए, आत्मविश्वास से लबरेज़ अंकित अपने देश, उसकी खुशबू, देश के विभिन्न राज्यों में फैली पारंपरिक विभिन्नता को समग्रता में एक वैभवपूर्ण और प्राचीन संस्कृति में देख समझ रहे हैं।

इस यात्रा में उनका मकसद महज़ देश की विभिन्नता को अपनी डायरी में दर्ज करना ही नहीं हैं बल्कि जहां भी वे जाते हैं वहीँ उसी परिवेश में, उसी भाषा में खुद को ढाल कर उसका महत्वपूर्ण स्वाद चखते हैं। वे लोगों के साथ मिल कर उनकी कला और कौशल को देखते हैं ,सीखते हैं उनके साथ उन्हीं के जैसा बनने की कोशिश करते हैं वे अपने और औरों में किसी भी प्रकार के भेज दो मिटा देना चाहते हैं। भारतीय प्रज्ञा में गहरे से आस्था रखने वाले अंकित मानते हैं कि हमारा देश विभिन्नताओं के सौंदर्य का देश हैं और इतनी भाषाएं ,जीवन शैली ,खानपान पहनावा ,रीती-रिवाज़ एक साथ एक ही सूत्र में हम सब को बांधे रखते हैं यह हमारे देश की बहुत बड़ी विशेषता हैं और मेरी इस यात्रा में देश की इसी विशेषता का खुद को हिस्सा बनाने पर ज़ोर हैं।

अंकित कहते हैं कि उन्हें खुद नहीं पता कि उनका ये देश भ्रमण कब संपन्न होगा। वे इस अनिश्चितता के लिए तैयार हैं। हर दिन वे अपनी डायरी में लोगों के दैनिक जीवन के बारे में उनकी जीवन शैली के बारे में विस्तार से लिखते हैं। जब उन्होंने यह यात्रा शुरू की थी तब उन्हें यह अंदाजा था की देश में उन्हें रोचक और प्रेरणादायी अनुभव मिलेंगे। उनकी डायरी India on My Cycle फेसबुक पर देखी व पढ़ी जा सकती हैं।

इस यात्रा में वे देश के चेहरे को नज़दीक से देख रहे हैं। अपनी इस अनोखी और लम्बी यात्रा में वे एक भी पैसा लेकर नहीं चल रहे हैं। वे लोगों के साथ उनके घरों में रहते हैं। वे जहां भी रहते हैं एक स्वयंसेवी की तरह रहते हैं और लोगों को उनके काम में मदद करते हैं जोकि कुछ नया सीखने का एक सही तरीका हैं। वे खेतों में काम करते हैं, लोगों से कुछ कारीगरी सीखते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं। अब तक उन्हें जो भी अनुभव हुए हैं उससे वे अभिभूत हैं। इन तीन सालों में तीस साल के अंकित के भीतर एक गजब की परिपक्वता आयी हैं जो सभी को प्रभावित करती हैं। सुनते हैं उनके किस्से उन्हीं की जुबानी।

इस जीवंत बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ मेरा रंग की फाउंडर शालिनी श्रीनेत की ओर से दिए गए अंकित के एक संक्षिप्त परिचय से ।

अंकित बताते हैं कि वे राजस्थान के अजमेर शहर के रहने वाले हैं। इसी शहर में उनका जन्म हुआ हैं। पढ़ाई भी मेरी इसी शहर में हुई हैं। अंकित ने सीए (चार्टेड अकाउंटेड) किया है। उन्होंने बताया – मैं पच्चीस साल तक इसी शहर में रहा हूँ। 2015 में मैंने कारपोरेट नौकरी करना शुरू की। दो साल बाद वे एक अंग्रेजी अखबार के लिए पत्रकारिता करने लगे फिर कंटेंट लेखक बने। नौकरी के दौरान ही उन्होंने सेहत को ठीक करने के लिए साइकिल को अपनाया साइकिल से ही वे दफ्तर जाते। उस वक्त उनका वज़न 90 किलो से भी अधिक था। वे कहते हैं की जब भी मेरा वजन बढ़ता हैं तो में व्यायाम या नियमित दौड़ कर अपना वजन संतुलित कर लेता था।

वे अब जयपुर आ चुके थे और यहीं उन्हें पता चला कि अच्छी साइकिलें भी मिलती हैं और कुछ विदेशी पर्यटक हैं जिन्होंने साइकिल से विश्व भ्रमण किया हैं। इन कहानियों के बारे में मैंने विस्तार से जानना शुरू किया और अपने लिए भी एक अच्छी साइकल खरीदी जिससे लम्बी यात्रा की जा सके। मैंने जयपुर के आसपास घूमना शुरू किया। चित्तौड़गढ़, जैसलमेर, उदयपुर, दिल्ली के आसपास, पंजाब आदि जगहों पर मैंने साइकिल से देखे फिर मुझे फ्रांस के एक क्लब ओडेक्स के बारे में पता चला जो कि साइकिल स्पर्धा सुपर रेंडॉनेयर आयोजित करता हैं जिसमे 200, 300, 400, 500 किलोमीटर साइकिल एक निश्चित अवधि में चलानी होती हैं और इसे पूर्ण करने के बाद एक प्रमाण पत्र और मेडल मिलता हैं। मैंने भी यह स्पर्धा भी पूरी की। जयपुर से जैसलमेर भी मैं साइकिल से गया हूँ। जयपुर से नैनीताल, रानीखेत आदि भी साइकिल से देखा है।

इसी तरह की एक स्पर्धा जिसमे दिल्ली इंडिया गेट से वाघा सीमा तक साइकिल चलानी थी। हम हरियाणा की सड़क पर साइकल चलाए रहे थे दोनों ओर सुन्दर खेत थे। मेरे मन में विचार आया कि मैं यह क्यों कर रहा हूँ ? मैं सिर्फ किलोमीटर ही तय कर रहा हूँ और सीमित अवधि में साइकिल चलाते हुए खुद को भी सीमित कर रहा हूँ। मैं किसी गाँव में रुकना चाह रहा हूँ। उस गाँव को कुछ ठहर कर देखना चाहता हूँ वहां के जीवन और लोगों से मिलना चाहता हूँ।नए लोगों से मिलकर उनसे नए हुनर सीखने की मेरी उत्कंठा भी थी। इस तरह मुझे एक लम्बी साइकिल यात्रा का विचार आया जिसमे न समय सीमा हो नहीं कोई गंतव्य ही तय हो।

साइकिल से एक तरह की अत्मनिर्भरता का भी अहसास हुआ और मैंने यह पाया कि मेरा झुकाव यात्रा और यात्रा के दौरान लोगों से मिलने उनके जीवन को क़रीब से देखने के प्रति ही नहीं हैं बल्कि उनके जीवन में उन्हीं की तरह शामिल होने की और अधिक हैं। चूँकि साइकल से लम्बी दुरी तय करने का मेरा अभ्यास बढ़ रहा था और साइकिल मेरे घूमने के लिए उपयुक्त वाहन बनी। मेरे पास एक अच्छी नौकरी थी और जैसा कि हमारे समाज में एक अच्छे जीवन जीने की निर्धारित परिभाषा या तरीका हैं वह सब मुझे बेचैन करता था। मुझे लगता था इस तरह जीवन जीने में कोई रोमांच नहीं हैं और न ही कोई सार्थकता हैं। जो भी कुछ हैं वह सिर्फ अपने ही लिए हैं। अपने लिए कमाना,अपने लिए खाना ,अपने लिए ही जीना जिसमे समाज का कोई जुड़ाव या दखल नहीं हैं। पर मेरी इस यात्रा में मैं अब कह सकता हूँ कि पूरा भारत मेरे साथ हैं और जो भी जीवन में हो रहा हैं सब मिल कर ही कर रहे हैं। यह जीवन मेरे लिए पहले के जीवन से श्रेष्ठ हैं और महत्त्वपूर्ण भी।

जब मैंने अपनी यात्रा शुरू की तब मेरा उद्देश्य था कि मैं साइकिल से भारत भ्रमण पांच महीने में पूर्ण करुंगा और गिनिस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराऊंगा और फिर वापस लौट कर अपनी नौकरी करुंगा और एक सामान्य जीवन जियूँगा। इस तरह एक प्लान बना कर मैंने अपनी यात्रा शुरू की थी। जिसमे साइकिल से सबसे लम्बी यात्रा करना मेरा उदेश्य था। राजस्थान से शुरू कर मैं लेह, श्रीनगर, पंजाब पकिस्तान सीमा, गुजरात होते हुए दक्षिण भारत आया। आज मुझे तीन साल हो गए हैं। यहाँ (दक्षिण भारत) आकर मेरी यात्रा में बदलाव हुआ जब मैंने गाँव को जाना यहाँ लोगों के बीच रहा उनके साथ उनके जैसा बन कर रहा। मेरे भीतर एक ठहराव आया विश्व रिकॉर्ड बनाने का विचार रफूचक्कर हो गया। मेरी यात्रा में एक स्थिरता आयी हैं। लोगो की कहानी में मैं खुद को शामिल कर यह यात्रा कर रहा हूँ। शुरुवाती तीन महीनों में मैंने तीन प्रदेशों का भ्रमण किया और आज तीन सालों में मैंने पंद्रह प्रदेश ही देखे हैं।

मैं जहां शाम होती हैं वहाँ रुक जाता हूँ कभी किसी के घर ,कभी किसी ढाबे में तो कभी पट्रोल पम्प पर तो कभी किसी छोटी चाय की दूकान पर। जब लोग मुझे मिलते हैं वे मेरी कहानी और यात्रा का उद्देश्य सुनते हैं तो मेरे मित्र बन जाते हैं। अंकित कहते हैं कि जिस तरह आप मुझसे बात कर रहे हैं,सवाल पूछ रहे हैं उसी तरह वे भी जिज्ञासा वश सवाल करते हैं और कुछ ही पलों में वे मित्र बन जाते हैं और मुझे उस रात ठहरे के लिए जगह देते हैं खाना खिलाते हैं। अपने देश की जनसंख्या बड़ी हैं और लोग अच्छे हैं मेरा अनुभव रहा हैं कि जो लोग जिन्हें सब गरीब कहते हैं वे ही सबसे अधिक उदार होते हैं ,उन्हें अपना घर, अपना खाना या कोई अन्य वस्तु साझा करने में कोई परेशानी नहीं होती बल्कि ऐसा करने में उन्हें दिली ख़ुशी का एहसास होता हैं जो उनके चेहरे पर मैं देखता हूँ। अगर मैं कार या कोई अन्य मोटर वाहन से देश देखने भ्रमण पर निकलता तो शायद लोग मुझे इतनी सहजता और अपनत्व से नहीं मिलते।

साइकिल लोगों से जोड़ने में भी एक अहम भूमिका निभाती रही हैं। जब भी मैं रास्ते में किसी से मिलता हूँ तो वे मुझे अपने घर ले जाना चाहते हैं और अपने बच्चों और अन्य गाँव वालों से बड़ी उत्सुकता से मिलवाते हैं। किसी विशिष्ठ और सम्माननीय व्यक्ति की तरह और उन्हीं के छोटे से घर में ठहरने के लिए आग्रह भी करते हैं। और जब मैं वहां से विदा लेता हूँ तो वे लोग ही मुझे मेरी अगली रात के ठहरने का बंदोबस्त भी अपने ही किसी रिश्तेदार या मित्र के घर कर देते हैं इस तरह कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती हैं और मुझे लोगों के जीवन को करीब से देखने और उसमे शामिल होने का मौका मिलता हैं मेरे लिए यह अनुभव एक बहुत महत्त्वपूर्ण शिक्षा की तरह हैं। इस वजह से मेरी यात्रा आसान और रोचक हो रही हैं। अंकित कहते हैं कि इस तरह की यात्रा करने वाला मैं कोई पहला नहीं हूँ।

सदियों से हमारे लेखक,इतिहासकार पैदल ही इस तरह देश -विदेश घूमें हैं जिन्होंने मानचित्र बनाए और एक दूसरे की संस्कृति के बारे में लोगो को उन्हीं की भाषा में बताया हैं। हमारे लोग अतिथि को सम्मान और प्रेम के साथ देखते हैं। मैं इस यात्रा में बहुत कुछ सीख रहा हूँ। मैंने देखा कि दक्षिण भारत के लोग प्रकृति के अधिक निकट हैं। उन्होंने ऑर्गेनिक खेती के महत्त्व को समझते हुए उसे बढ़ाया हैं। वे अपनी रसायन रहित सब्जी ,फल इत्यादि खुद ही अपने खेतों में उगाते हैं। उसका सेवन भी करते हैं। इसके व्यापार पर वे अधिक निर्भर नहीं हैं। मैंने तरह- तरह कौशल के धनी कलाकारों के साथ रह कर लकड़ी और मिट्टी का काम भी सीखा हैं। अभी इन दिनों मैं बैंगलोर में श्रीमती श्रीदेवी जी के घर रह रहा हूँ वे एक लोक चित्रकार हैं जिनसे मैं प्राकृतिक रंग बनाना सीख रहा हूँ। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के साथ भी मैं रहा हूँ जिनकी जीवन शैली बिलकुल भिन्न हैं। वे हर तरह से आत्मनिर्भर हैं और प्रकृति से उनका सामंजस्य प्रगाढ़ हैं।

वे अपने लिए मिट्टी के घर बनाते हैं जो कई सालों तक टीके रहते हैं। बिना सीमेंट के घर बनाने की यह प्राचीन तकनीक भी मैंने सीखी हैं। महाराष्ट के मंदिरों का स्थापत्य भी अचंभित करने वाला हैं वहां पुरातत्व के अधिकारियों के साथ मैंने मंदिरों के बनने की विधि को जाना। एक मंदिर का स्थापत्य मानवाकृति से प्रेरित होता हैं। मैंने अपने लिए खादी की शर्ट भी महाराष्ट्र में खुद ही बनायी हैं। मैंने हथकरघा भी सीखा हैं। कर्नाटक और तमिलनाडु में मैं कुम्हारों के साथ रहा जिनसे मिट्टी के पात्र बनाना सीखा। आंध्रप्रदेश में मैं संगीत वाद्य वीणा बनाने वाले लोगों के साथ भी रहा हूँ। गांव के सात मुस्लिम परिवार वीणा बनाने का काम पीढ़ियों से कर रहे हैं। इस गाँव के बारे में लोग अधिक नहीं जानते हैं। वहां मैंने वीणा बनाना सीखा।

जहां अगर अपने प्रवास में कुछ कौशल नहीं भी सीख पाता हूँ वहां उनके दैनिक जीवन में बहुत कुछ सीखने लायक मिल जाता हैं। हमारी प्रज्ञा जो किसी डिग्री से हासिल नहीं होती वह हमारे मानस में गुंथी हुई हैं। इस प्रज्ञा का साक्षात्कार अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण अनुभव हैं और सीख भी। किस मौसम में क्या खाना चाहिए यह ज्ञान हमारे समाज को विरासत में मिला हैं और इसका अनुभव इस तरह की यात्रा में ही करीब से लिया जा सकता हैं। जब कभी कोई गांव मेरे रास्ते में नहीं आता तब किसी ढाबे में जाकर जब बात करता हूँ तो वे बहुत ही आत्मीयता से मुझे खाने और ठहरे का आग्रह करते हैं।

अब तक मैं 600 परिवारों के साथ रह चुका हूँ और यह सम्बन्ध दोनों ही तरफ से बनते हैं जिस तरह कोई परिवार मेरे लिए अनजान हैं ठीक उसी तरह मैं भी उनके लिए अजनबी हूँ। पर भरोसे की बयार हमारे समाज में, हमारे मन में निरंतर बहती रहती हैं और हमारी आदत में शामिल हैं हमारी अतिथि सत्कार की संस्कृति। तमिलनाडु में पचास साल पहले कुछ घरों में यह रिवाज़ रहा हैं कि जब तक कोई अतिथि,फ़कीर या संत आदि भोजन न कर ले घर का कोई भी सदस्य भोजन नहीं करता था।ट्रक ड्राइवर भी बहुत मददगार होते हैं।उन्होंने ने भी मेरी इस यात्रा में सहयोग किया हैं।

सामान्य जीवन की एकरसता को मैं अब अच्छे से समझ पा रहा हूँ। जीवन ( प्रकृति) का नियम मैं अपने आसपस देखता हूँ और उसे ही अपने लिए अपनाता हूँ। किसानी में मेरी रूचि जगी हैं शायद ये मेरे अंदर ही कही दबा था और इस यात्रा में सहज ही मेरे भीतर से उपजा हैं वहीँ जब मैं सामान्य जीवन में था तो वहां मुझे पढ़ने,नौकरी करने आदि के लिए एक कोशिश करनी पड रही थी जिससे जीवन में कोई अधिक बदलाव भी महसूस नहीं हो रहा था बल्कि जीवन के सामान्य होने की तरफ में रफ़्तार से बढ़ रहा था।अब जब मैं खेतों में काम करता हूँ तब दिन दिन भर काम करते हुए भी न थकान का और न ही किसी और दबाव का अनुभव होता हैं। शायद किसानी ही एक काम हैं जिसे में भविष्य में जारी रखूं
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बेंगलोर के पहले मैं नागपुर के पास गढ़चिरौली में अधिक समय तक रुका हूँ। जहां डॉ प्रकाश आमटे जी रहते हैं। वहां लकड़ी शिल्प एक गाँव में बनते हैं वहां भी मैं उन शिल्पकारों के साथ रहा हूँ। जहाँ में अभी हूँ वे श्रीमती श्रीदेवी एक पारम्परिक चित्रकार हैं उन्होंने मेरी यात्रा पर आधारित एक चित्र मेरे लिए बनाया हैं। जो मेरे लिए एक बहुमूल्य भेंट हैं।

मुझसे प्रेरणा लेकर कई लोगों ने छोटी दूरी की यात्राएं की हैं। महाराष्ट्र में कुछ लोगों ने अपने प्रदेश को देखने समझने के लिए महाराष्ट्र में साइकिल यात्रा की हैं। कर्नाटक और गुजरात में भी कुछ लोगों ने छोटी यात्राएं की हैं। हर आदमी के लिए लम्बी यात्रा करना संभव भी नहीं हैं। सबके पास कोई न कोई जिम्मेदारी होती हैं जिसकी वजह से अधिक लोग लम्बी साइकिल यात्रा नहीं कर पाते हैं।

दक्षिण भारत में कुछ स्कूलों में मेरे व्याख्यान भी हुए हैं। तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के बच्चों के सन्देश तो आज भी मेरे पास आते हैं जिनसे में दो वर्ष पहले मिला था।वे मुझे अन्ना (बड़ा भाई) बुलाते हैं मैंने उन्हें कह दिया था कि वे मुझे कभी “सर” नहीं कहेंगें। वे पूछते हैं कि मैं कहाँ हूँ ? किस राज्य में हूँ ? मैंने क्या नया देखा ? मैं क्या नया सीख रहा हूँ ? वे कहते हैं कि वे जब बड़े हो जाएंगे तब वे भी इस तरह भारत देखना चाहेंगे।

हर दिन मैं अपनी यात्रा के बारे में अपने फोन पर ही लिखता हूँ। यात्रा की शुरुवात में मेरे पास अधिक सामान था पर अब सिर्फ तीन या चार किलो ही समान लेकर चलता हूँ। अपने परिवार के बारे में अंकित कहते हैं कि उनके माता- पिता सेवा निवृत हो गए हैं। दो बड़े भाई हैं जो बैंकिंग में हैं। वे अपने परिवार के साथ रहते हैं जो मुझसे ग्यारह साल बड़े हैं मैं सबसे छोटा हूँ परिवार में। परिवार से मैं 150 दिन में लौट कर आ जाऊंगा यह कह कर अपनी यात्रा पर निकला था। माता पिता को किसी अलग काम करने के लिए समझाने में वक्त लगता हैं इसके पहले स्वयं में आत्मविश्वास का होना जरूरी हैं। अगर हमें अपनी नौकरी के लिए विदेश भी जाना होता हैं तो भी माता -पिता आसानी से अपनी सहमति नहीं देते हैं। क्योकिं मैं पहले साइकिल चला चुका था और मैने उनसे अपनी इस यात्रा के लिए अनुमति नहीं मांगी थी बस उन्हें बताया था कि मैं डेढ़ सौ दिन में वापस लौट आऊंगा। पर अब वे जान चुके हैं कि मेरा जीवन बदल चुका है। वे मेरी कहानी मेरे फेसबुक पेज पर लगातार देखते- पढ़ते हैं।

इस यात्रा में युवाओं से मिल कर उन्हें लगा कि सभी जगह हम किताबी ज्ञान पर ही निर्भर रहते हैं। मैंने अपने जीवन में एक कठोर कदम लिया और ये अनुभव मैं प्राप्त कर रहा हूँ। पर सभी ऐसा नहीं कर सकते। युवा पहले घर पर तो फिर सरकार पर निर्भर रहते हैं। पढ़ाई के बाद कोई नौकरी करना ही उनका लक्ष्य होता हैं। जीवन को वे बहुत ही सीमित और प्रचलित ढंग से ही देखते समझते और बरतते हैं। हमारी सामाजिक संरचना हमें किसी न किसी तरह निर्भर ही बनाती हैं चाहे घर हो,निजी या सरकारी नौकरी हों या कुछ और अन्य काम या व्यवसाय। हमें जीवन को बहुत ही सीमित करके देखने की आदत हैं। हमारी शिक्षा यह सिखाती हैं कि जब तक हमारे पास कोई नौकरी नहीं हैं तब तक हमारा जीवन महत्त्वपूर्ण और अर्थपूर्ण नहीं हैं।

बिना नौकरी के जीवन जीने की कोई संभावना भी युवाओं के विचारों में नहीं हैं। हमें लोगों से मिलने के लिए मना किया जाता हैं कहा जाता हैं कि जो कुछ भी सीखना हैं समझना हैं गूगल से सीखो . शहर का युवा गाँव जाने से डरता हैं ऐसे बहुत कम लोग हैं जो प्रकृति से सीख रहे हैं या कुछ नया कर रहे हैं। हमारी सोच और पर एक अनचाहा प्रतिबंध हैं। नौकरी करते हुए भी हम प्रयोगधर्मी नहीं रहते नौकरी में सिर्फ ध्येय (टारगेट) पूर्ण करने पर ही कंपनी का ध्यान होता हैं।औरइस एकरसता से हमारे युवा आलसी हो जाते हैं और नीरस भी। अकेले रह कर जीवन भी जिया जा सकता हैं इस और ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं। मैं कुम्हारों, शिल्पकारों के साथ रहा हूँ जो दो हजार सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी वह काम कर रहे हैं। युवा तेज़ी से शहरों या महानगरों में बसने के लिए बेताब हैं उन्हें शहर की माया लुभाती हैं। वे वहाँ किसी आईटी कंपनी आदि में काम करने को तैयार हैं।और उसे एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि भी मानते हैं।

उनके पास मोटर साइकिल हो या कार हो, खाना भी बाजार का हो यही उनके सपने हैं। उनके पास महगें फोन हो जबकि शहरों का जीवन जहरीला हैं। हमारी आयुर्वेद संस्कृति मनुष्य को न सिर्फ स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित करती हैं बल्कि उसे संतोषी भी बनाती हैं और संतोष ही सुख का मूल हैं। भूमंडलीकरण जब हो रहा था तब हमें बताया गया था कि यह संपूर्ण मानवजाति के लिए लाभकारी होगा। पर ऐसा हुआ नहीं हमारी युवा पीढ़ी शहर के जीवन के प्रति आकर्षित हो रही हैं और अपनी स्थानीय कौशल,संस्कृति,गुण और मानवीय मूल्य भूल रही हैं। सब कुछ उन्हें जल्दी और अभी ही हासिल करना हैं। जैसे एक क्लिक से मोबाइल अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर देता हैं वैसी ही अपेक्षा उन्हें शहर के जीवन से हैं।

मेरी साइकिल यात्रा पूर्ण हो जाए पर मैं देश के गांव में भ्रमण करता रहूंगा . जिस भी गाँव में मैं रहूंगा उसे एक आदर्श गांव बनाने की ओर अग्रसर रहूंगा .कुछ लोग इस ओर बरसों से काम कर रहे हैं जैसे लद्दाख में सोनम जी हैं और महाराष्ट्र में डॉ प्रकाश आमटे हैं जो आदिवासियों के बीच जंगल में रहते हुए उनकी चिकित्सा कर रहे हैं और आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल भी चला रहे हैं यही नहीं घायल जानवरों के लिए भी उनके पास क्लिनिकल सुवधाएं हैं। उन्होंने भी लीग से हट कर अपना जीवन जिया लोगों के लिए सेवा भाव से काम किया और मिसाल बने हैं। मैं भी इस यात्रा के बाद गाँव में रह कर उस गाँव की कारीगरी,कौशल खेती और शिक्षा पर काम करना चाहता हूँ। एक वर्ष वहां रुकूंगा फिर दूसरे गाँव पहुँचूँगा। वहां भी लोगों के साथ काम करूंगा इस तरह गावँ दर गावँ रह कर वहां युवाओं के साथ काम करते हुए अपना जीवन मैं जीना चाहता हूँ।

जीवन में प्रेम के बारे में पूछने पर अंकित ने कहा कि प्रेम और परिवार दो अलग बातें हैं हम मनुष्य हैं। प्रेम मनुष्य के जीवन में होता ही हैं और एक बार नहीं अनेकों बार होता हैं। मेरे साथ भी ऐसे अनुभव हुए हैं जब कोई मुझसे आकर्षित हुआ और कभी किसी ने मुझे आकर्षित किया। पर मुझे यह समझ आ गया कि यह सब मेरी यात्रा और उसकी रोचक कहानी के प्रति आकर्षण हैं। कई लोग मुझे अपनाना भी चाहते हैं कभी एक पुत्र की तरह तो कभी परिवार के किसी सदस्य की तरह। जैसे अभी श्रीदेवी जी के साथ उनके परिवार में भी परिवार के एक सदस्य की ही तरह हूँ। इनके पति सेना में हैं वे भी मेरी यात्रा से प्रभावित हुई हैं।

लड़कियों के लिए मैं कहना चाहता हूँ कि जब मुझसे पूछा जाता हैं कि क्या कोई लड़की इस तरह लम्बी यात्रा कर सकती हैं तो मेरा जवाब होता हैं हां जरूर कर सकती हैं मैं ऐसी कुछ लड़कियों को जानता हूँ जिन्होंने इस तरह लम्बी यात्रा साइकिल से की है पर विदेश में। मेरा यह मानना है कि अगर कोई लड़की देश को समझने और देखने के लिए इस तरह की साइकिल यात्रा करती हैं तो उसे देश के लोगों द्वारा गर्मजोशी से सहयोग और प्रेम मिलेगा। मुझे तो फिर भी कभी लड़के होने की वजह से कुछेक बार लोगों ने ठहराने से मना किया हैं पर अगर लड़की होगी तो लोग उसका अधिक स्वागत करेंगे। लोग यह भी मानते हैं कि लड़कियों के लिए इस तरह की यात्रा खतरनाक भी हो सकती हैं। पर इस बारे में मेरा यह मानना हैं कि खतरा लिंग देख कर नहीं आता।

युवाओं में इन दिनों मोबाईल फ़ोन के प्रति लत बढ़ी हैं जो ठीक नहीं हैं इससे बेहतर हैं कि वे समाज के बीच रह कर कुछ हुनर सीखे। अकेले भ्रमण करे। इंटरनेट हमारे जीवन में अभी बीस साल पहले दाखिल हुआ हैं पर सामाजिक जीवन सदियों पुराना हैं। सारे हुनर और कौशल हम मनुष्य ने समाज में रह कर ही सीखे हैं और उन्हें पानी नयी पीढ़ी को सिखाया हैं। हमे हमारी परम्परा पर कायम रहना चाहिए। टीवी और पाठ्य पुस्तकों के बाहर भी असीम ज्ञान की एक धारा बह रही हैं उसे पहचानना चाहिए जिससे हमारा जीवन अर्थपूर्ण हो सके। अपनी हाईब्रीड साइकिल का नाम अंकित ने “हवा महल” रखा हैं।

सधे हुए सामान्य जीवन को अंकित कुछ हिकारत से देखते हैं वे मानते हैं कि मनुष्य साधारण जीवन शैली जीने के लिए नहीं बना हैं हर मनुष्य प्रकृति से सीखने के लिए हमेशा उत्सुक रहता हैं पर हम अपने सामान्य जीवन में अपनी ही बातें सुन नहीं पाते हैं। बाबा आमटे के बारे में भी अंकित बताते हैं कि वे उनके आश्रम में रहे हैं तो वहीँ उन्हें जब यह मालूम हुआ कि बाबा आमटे ने भी साइकिल से पूरा भारत भ्रमण करने के बाद ही अपना आश्रम बनाया था।

अंकित के बाल और दाढ़ी बढ़ी हैं वे एक साइकिल यात्री कम और युवा साइकिल योगी अधिक नज़र आए रहे हैं। इस संवाद के दौरान बातचीत में अंकित की विलक्षण परिपक्वता देख भी हर्ष हुआ।और जिस तरह, जिस शालीनता से उन्होंने हम में से अधिकतर लोगों के सामान्य जीवन को सतही जीवन बताने की कोशिश की हैं वह भी युवाओं के लिए सोचने का विषय हैं। उम्मीद हैं कि इस संवाद से अंकित की साइकिल कहानी जो कि उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं को सुन कर हमारे युवा व अन्य दर्शक कुछ प्रेरणा लेंगें और अपने अपने क्षेत्र में अपने-अपने स्थान पर कुछ सकारात्मक काम करेंगे।

अंकित को मेरा रंग परिवार की और से शुभकामनाएं देते हुए हम उनसे विदा लेते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनकी साइकिल यात्रा ख़त्म होने के पहले भी हम उनसे एकाधिक बार मिलेंगे और उनके अनुभव सुनेंगे जानेंगे कि बैंगलोर से आगे उनकी यात्रा का क्या रंग रहा क्या अनुभव रहा।

Siraj Saxena
फोटोः त्रिभुवन देव

सीरज सक्सेना समकालीन चित्र कला तथा सिरेमिक आर्ट का जाना-पहचाना नाम है। एक जाने-माने आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे साइकिल और पर्यावरण प्रेमी हैं। वे उन गिने चुने कलाकारों में हैं जो नियमित रूप से लेखन भी करते हैं। मेरा रंग के लिए वे देश के चुनिंदा साइक्लिस्ट के साथ संवाद की एक सिरीज़ कर रहे हैं।