साइकिल चलाने से शुरू हुई उषा और अश्विन की प्रेम कहानी

उषा और अश्विन

सीरज सक्सेना
अक्सर हम अपने आसपास के लोगों से यह कहते सुनते है कि दाम्पत्य जीवन एक साइकिल की तरह होता है जिसमे दोनों पहियों के बीच सन्तुल होना अनिवार्य हैं। और यही संतुलन प्रेम की डगर में मधुरता के साथ जीवन सफर के उतार चढ़ाव को एक लय बद्ध कर अनुकूल बनाता है। पर अगर आपको यह पता चले कि साइकिल दो लोगों को इस प्रेमबंधन में बांधती भी है तो आप सभी को आश्चर्य तो होगा ही। मेरा रंग ‘किस्से साइकिल के’ श्रृंखला की तीसरी कड़ी में मेरे मेहमान थे नोएडा के सायकल प्रेमी दंपती उषा और अश्विन।

बनारस की उषा

उषा काशी (बनारस) की रहने वाली हैं उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविधालय से स्नातक करने के बाद इलाहबाद से अपनी उच्च शिक्षा पूर्ण की है। फिर वे अपनी नौकरी के सिलसिले में दिल्ली आती हैं। अपने जन्मदिन पर उन्हें एक मित्र साइकिल भेंट करता हैं और वह हर शनिवार, इतवार सुबह साइकिल सैर पर जाती हैं। बचपन में भी उषा बनारस की गलियों में साइकिल चलाती थीं। शुरू से ही उनका झुकाव खेल की तरफ रहा है।इसी खेल भावना के प्रति झुकाव के कारण दिल्ली में हुए डुएथलॉन स्पर्धा में उन्होंने हिस्सा लिया। नेहरू पार्क दिल्ली के पास आयोजित इस खेल आयोजन में उन्हें दौड़ना भी था और साइकिल भी चलानी थी। उषा ने पूरे जोश के साथ यह स्पर्धा सफलतापूर्वक पूर्ण की। और इसके बाद साइकिल उनके जीवन का स्थाई रूप से एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई।

कलकत्ते के अश्विन

अश्विन भी कलकत्ते में अपने स्कूली जीवन के दौर से ही साइकिल चला रहे हैं। पिता की दी हुई बड़ी साइकिल पहले उन्होंने उस पीढ़ी के लोगो की तरह चलाई। बड़ी साइकिल को साइकिल की फ्रेम के बीच से पैर निकाल कर चलाना होता है इसे कैंची साइकिल चलाना कहते हैं। आज के बच्चे जिनके पास छोटी साइकिल है ( जिसमे सपोर्टिंग चक्के लगे होते हैं) साइकिल की कैंची पद्धति के बारे में अधिक नहीं जानते हैं। अब भी गांव में बच्चो को कैची साइकिल चलाते देखा जा सकता हैं। यह विलुप्त होती पद्धति बहुत रोचक और रोमांचित करने वाली होती हैं। इसमें साइकल के हेंडल को एक ही हाथ से पकड़ा जा सकता है क्योंकि दूसरे हाथ से साइकिल के फ्रेम का डण्डा पकड़ना होता हैं।

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पिता की साइकिल को इस तरह चलाने का अपना सुख और उसकी स्मृति भी महत्त्वपूर्ण होती हैं। तो अश्विन भी बचपन से साइकिल के दीवाने रहे हैं। अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने आईआईटी रुड़की में भी अपने सहपाठियों के साथ खूब साइकिल  चलाई हैं। वे कहते हैं कि भले ही किसी मित्र के पास प्रेमिका हो या न हो पर साइकिल अवश्य होती थी और जिससे हम झुण्ड बनाकर हरिद्वार जाते थे। वहां हर की पौड़ी पर गंगा स्नान करते थे ,चोटी वाले भोजनालय में मजे से भोजनानन्द करते थे। कभी देहरादून भी साइकिल से चले जाते थे। जब वे अपनी नौकरी के लिए जमशेदपुर गए वहां भी उन्होंने जमशेदपुर के पहाड़, तालाब व्  अन्य स्थानीय जगहों को अपनी साइकिल से ही देखा। नोएडा आने के बाद भी उनकी साइकिल जारी रहीं। और वे यहां भिन्न भिन्न साइकिल समूहों के साथ सुबह की लम्बी साइकिल सैर पर जाने लगे।

साइकिल ने अवसाद से बचाया

अश्विन के लिए साइकिल सिर्फ सेहत और मनोरंजन का साधन नहीं है वे बताते हैं कि साइकिल उन्हें अवसादहीन व खुश रखती हैं। इसी बात को विस्तार से समझाते हुए अश्विन कहते हैं कि सन २०१२ में जब उन्होंने कैंसर पीढ़ित अपनी पत्नी को खोया तब वे गहरे अवसाद का शिकार हुए और उनकी बहन उन्हें मनोचिकित्स्क के पास उपचार के लिए ले गईं। अनेक दवाईयाँ देख उन्हें लगा कि क्या वे बीमार हैं ? पत्नी की मृत्यु के बाद तेरहवीं रस्म के लिए कई रिश्तेदारों का घर में आना हुआ।

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ठीक उसी वक्त पत्नी की मृत्यु के दुःख से आहत अश्विन अपनी साइकिल और हेलमेट उठा कर घर से बाहर निकल गए। घर वाले उनके इस बर्ताव से कुछ चकित हुए। अश्विन ने उन्हें समझाते हुए कहा कि उनका दिमागी संतुलन ठीक नहीं हैं और साइकिल ही उन्हें संतुलित कर सकती हैं। नोएडा साइक्लिंग समूह के साथ अश्विन (जो कि सौ किलोमीटर बड़ी आसानी से तय कर लेते हैं) ने वह सौ किलोमीटर की साइकिल रेस पूर्ण की। धीरे -धीरे साइकिल ने उन्हें पूर्णतः अवसाद मुक्त कर दिया। अश्विन के चेहरे पर अब मुस्कान हमेशा रहती हैं और उन्हें देख हर कोई खुश होता है।

साइकिल वाली लड़की

दोस्तों ने ही उन्हें एक साइकिल चलाने वाली लड़की के बारे में बताया कि एक लड़की है जो साधारण साइकिल से भी सौ किलोमीटर को लम्बी दूरी तय कर लेती हैं। वो लड़की कोई और नहीं नोएडा में ही साइकिल चलाने वाली उषा हैं। अश्विन जिज्ञासावश उषा से मिले ओर उन्होंने उषा को साइकिल के प्रति उनके प्रेम को देख  बधाई और शुभकामनाएं दी। उषा भी अब साइकिल समूह की सक्रीय सदस्य बन गईं और अश्विन और उषा साथ- साथ साइकिल चलाने लगे।

देश में सालाना होने वाली “टूर ऑफ नीलगिरि” साइकिल स्पर्धा में भाग लेने के लिए उषा तैयारी में जुटी थीं। अश्विन ने उषा का साथ दिया उनके अभ्यास के लिए एक विशेष चार्ट बनाया। लम्बी दूरी साइकिल से तय करते हुए कब- कब अल्प विराम लेना चाहिए। क्या और कितना खाना चाहिए, शरीर में पानी की कमी न हो इसके लिए कितना पीना चाहिए आदि पर उन्होंने गहरे शोध के बाद इसे बनाया। टूर ऑफ़ नीलगिरी स्पर्धा दक्षिण भारत में होने वाली साइकिल की एक कठिन स्पर्धा हैं जिसमे सात दिनों में एक हजार किलोमीटर साइकिल चलानी होती हैं।

पहाड़ी रास्तों के उतार चढ़ाव के लिए कुछ विशेष अभ्यास की जरूरत को ध्यान में रखते हुए अश्विन उषा को लेकर देहरादून पहुंचे। दिल्ली से सुबह जल्दी निकलने के कारण वे देहरादून भी शुक्रवार शाम ही पहुंच गए। प्लान के मुताबिक़ अश्विन और उषा देहरादून से मसूरी साइकिल से शनिवार को जाने वाले थे। पर उषा के उत्साहवश शुक्रवार शाम को ही दोनों देहरादून से मसूरी (जो कि तीस किलोमीटर का एक कठिन पहाड़ी चढ़ाई वाला सफर हैं) और फिर मसूरी से देहरादून साइकिल से निकल पड़े।

साइकिल सफर से हमसफर तक

उषा और अश्विन अच्छे -अच्छे साइक्लिस्ट भी यह सफर एक ही दिन में पूरा करने के लिए कई दिनों तक सिर्फ मन ही बनाते रहते हैं। पर उषा की लगन और जिद की वजह से दिल्ली से कार के सफर की थकान के बावजूद भी देहरादून पहुंचते ही दोनों ने मिल कर यह सफर तय किया। उषा के जूनून की हद यहीं नहीं थमी अगले दिन शनिवार को भी वे गयीं और इतवार को भी दिल्ली रवाना होने के पहले उन्होंने मसूरी का साइकिल सफर और अपना अभ्यासपूर्ण किया। अश्विन उषा की साइकिल के प्रति दीवानगी और उनकी ऊर्जा देख हतप्रभ थे। उषा ने लगातार तीन दिन देहरादून से मसूरी का कठिन सफर साइकिल से तय किया यह निश्चित ही कोई सामान्य बात नहीं हैं।

‘टूर ऑफ़ नीलगिरि’  स्पर्धा में अश्विन ने उषा का साथ दिया और उषा ने सफलता के साथ इस स्पर्धा को पूर्ण किया। इस स्पर्धा में देश विदेश के सौ साइकिल सवारों ने भाग लिया था बेंगलुरु से शुरू हुई इस साइकिल रेस ने केरल,तमिलनाडु और कर्नाटक तीन राज्यों को कवर किया। यहीं एक शाम जब सभी साकिलिस्ट शाम की चाय पर एकत्र थे, सभी के सामने अश्विन ने उषा को प्रणय प्रस्ताव देते हुए अपने प्रेम का इज़हार किया। उषा ने इस प्रस्ताव को मानने के लिए कुछ शर्तें रखीं। पहली -अष्विन को एक सप्ताह में एक हजार किलोमीटर साइकिल चलानी हैं दूसरी अगर साइकिल पंचर हो जाए तो उन्हें पंचर बनाना भी खुद ही सीखना होगा। अश्विन ने दोनों शर्तें मानीं और पूर्ण की।

दिल्ली के बिरला मंदिर में दोनों की शादी हुई जिसमे मैं भी बाराती बन कर अपनी साइकिल से  गया था।सारे बाराती साइकिल पर ही पहुंचे थे। दूल्हा शेरवानी मेऔर दुल्हन भी शादी के जोड़े में एक, दो सीट वाली लम्बी ाइकिल चला कर स्टेज तक पहुंचे और फिर दोनों में एक दूसरे को वर माला पहनाईं। यह एक अनूठी शादी थी जो सादगी और बिना शोर शराबे के सम्पन्न हुई।

साइकिल जीवन है

इस लॉक डाऊन के पूर्व उषा ने तय किया था कि वे तीन सौ पैंसठ दिन रोज़ सुबह रनिंग करेंगीं पर करोना नामक अदृश्य वाइरस ने उन्हें घर पर ही रहने को मजबूर कर दिया। इस बीच उन्होंने कुछ दिन सुबह साइकिल जरूर चलाई पर वे कहतीं हैं कि मास्क पहन कर साईकिल चलाना उन्हें असहज करता हैं। बाहर की ताज़ी हवा वे ठीक से महसूस नहीं कर पाती हैं। जब वे एक अंतर्राष्ट्रीय बैंक में कार्यरत थीं तब कॉपोरेट जगत में काम करने से उत्पन्न दवाब को दरकिनार कर वे शनिवार और रविवार का बेसब्री से इंतज़ार करती थीं। शनिवार इतवार वे सुबह अपने दोस्तों के साथ लम्बी साइकिल यात्राएं करती थीं।

साइकिल चलाना उषा के लिए ध्यान (मेडिटेशन) हैं। वे साइकिल चलाते हुए अपनी साइकिल से बातें भी करती हैं और साइकिल भी उनकी सुनती हैं और उनसे भी बात करती हैं। वे बेहिचक कहतीं हैं कि साइकिल ने उनकी जिंदगी बदली हैं। उन्होंने अपनी साइकलों के नाम भी रखें हैं। उनकी एम टी बी ( माउंटेन बाइक) साइकिल का नाम हैं “जॉनेथन लिविन्स्टन सीगल” ( जो कि रिचर्ड बाख का प्रसिद्ध उपन्यास हैं) और उनकी रोड बाइक (साइकल) का नाम हैं “पिंक पेंथर” यह नाम उषा ने ब्रेस्ट कैंसर फोरम के लोगो के गुलाबी रंग से प्रभावित हो कर रखा हैं। उषा इस फोरम के तहत स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए भी साइकिल चला चुकी हैं।

शहर को साइकिल से देखो

अश्विन कहते हैं कि लोग जोश- जोश में साइकिल खरीद तो लेते हैं पर कुछ दिनों में उनका जोश ठंडा हो जाता हैं। मै सबसे आग्रह करना चाहता हूँ कि वे अपनी साइकिल में जंग न लगने दें। हम सब का जीवन व्यस्त हैं पर यकीन मानिए अगर आप पांच किलोमीटर भी प्रतिदिन साइकिल चलाते हैं तो आपके जीवन में उत्साह ख़ुशी और सकारात्मकता का विस्तार होगा। साइकिल से सेहत और मनोरंजन तो होता ही हैं पर साइकिल चलाने से आप हर तरह के तनाव और अवसाद से भी दूर रह सकते हैं।

अश्विन यह जोर देकर कहते हैं कि साइकिल एक जरुरी बीमा है और साइकिल चलाना उस बीमे की किश्त है। जो हमें अवसाद और तनाव से मुक्त करती है। साइकिल आप अपने काम इ जहां भी जिस भी शहर में जाएं चला सकते हैं अपने काम के खत्म होने के बाद आप जहां भी ठहरें हैं वहीं आपस पास कोई न कोई साइकिल आपको मिल ही जाएगी आप साइकिल वाले से प्रेम से बात करें और चूँकि साइकिल चलाने वाले उदार भी होते हैं सो आपको उनसे साइकिल लेकर उस शहर को अच्छे से देख सकते हैं साथ ही कुछ नए मित्र भी बना सकते हैं।

यह बात मैं भी मानता हूँ कि साइकिल चलने वाले अच्छे और उदार मनुष्य होते हैं हम तीनों भी सड़क पर ही किसी सुबह साइकिल चलाते हुए ही मिले थे और हमारी मित्रता अब एक गहरी दोस्ती में बदल गई हैं। साइकिल चालाना एक ईमानदारी का कर्म हैं जो हमें भी ईमानदार बनाता हैं। टूर ऑफ़ नीलगिरि के दौरान हमें आरोही जो हुमाऊं क्षेत्र में एक एन जी ओ है और वहां पहाड़ पर बच्चों के लिए एक स्कूल चलता है। हम वहां गए और बच्चो के साइकिल के प्रति उत्साह को देख कर उषा ने लड़कियों की एक टीम बनाई और रेस कराई तथा वहां साइकिल की छोटी दुकानों पर जाकर साइकिल के महत्त्व के बारे में गोष्ठियां की।

हमने जाना कि साइकिलिस्ट असल अर्थ में वे हैं जो अपने काम के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं न कि हम जो आधुनिक गियर वाली साइकिल अपने शौक और जोश के लिए चलाते हैं।  नोएडा लौट कर हमने अपने क्षेत्र के कुछ इलाकों में जहां भी साइकिल देखी उन पर रेडियम का स्टीकर लगाया ताकि जब वे अपनी साइकल से सड़क पर चलें तो अन्य मोटर वाहन चालक उन्हें दूर से ही चिन्हित कर लें और उचित दूरी बनाते हुए आगे बढ़ जाएं।

मेरा रंग जुड़ेगा साइकिलस्ट से

आज जब हमारे सभी छोटे बड़े शहर गति से बढ़ रहें हैं और सड़कें भी वाहनों से भरी रहने लगी है यही समय है कि अब हम सभी को अपनी सड़कों कारों के जाम में समय गवाने कि बजाय साइकिल अपना लेना चाहिए। साइकिल से हम अपने शहर का एक नया ही चेहरा देख पाते हैं। साइकिल हमें अपने ही शहर के हिस्सों से परिचय कराती हैं।जैसे हमने खान मार्केट में सुबह चाय और पकोड़े की छोटी दुकान ,राष्ट्रपति भवन के निकट मैसूर कैफे की कॉफी और उपमा, गुजरात भवन के ढोकले और जलेबी, चाँदनी चौक में आलू पूरी आदि ठिकाने खोजे हैं।

बातचीत में में ही शालिनी जी ने यह वादा ले लिया है कि मेरा रंग दिल्ली और गाज़ियाबाद में सार्वजनिक स्थल पर साइकिल ठीक से और सुरक्षित खड़ी करने के लिए साइकिल स्टेण्ड बनाने के लिए प्रयास करेगा। हमारे इस लाईव प्रोग्राम में काठमांडू से भी चित्रकार इरिना ताम्रकार जुडी और उन्होंने इस कार्यक्रम को पसंद किया। अश्विन के साइक्लिस्ट मित्र राजेंद्र दास भी नोएडा में साइकिल चलाते हैं। अश्विन काठमांडू में भी साइकिल चला चुके हैं।अश्विन और उषा की यह प्रेम डोर साइकिल के दोनों छक्कों के बीच चेन की तरह हमेशा उन्हें इस प्रेम सफर में गतिमान रखे हम यही कामना करते हैं।

 

Siraj Saxenaसीरज सक्सेना समकालीन चित्र कला तथा सिरेमिक आर्ट का जाना-पहचाना नाम है। एक जाने-माने आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे साइकिल और पर्यावरण प्रेमी हैं। वे उन गिने चुने कलाकारों में हैं जो नियमित रूप से लेखन भी करते हैं।  मेरा रंग के लिए वे देश के चुनिंदा साइक्लिस्ट के साथ संवाद की एक सिरीज़ कर रहे हैं।