पूजा का हौसला, हाथ-पैर गंवाने के बावजूद निशानेबाजी में कीर्तिमान

Story of Pooja

सही कहा गया है कि मन के हारे हार हैं मन के जीते जीत। वो प्रतिभाशील है। वो मिसाल है दृढ़संकल्प की। अपने माता-पिता की नन्ही सी बेटी पूजा का जन्म सन् 1985 में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। किसी भी सामान्य लड़की की तरह पूजा की ख्वाहिशों के आसमान में तमन्नाओं के पंछी खूब उड़ान भरा करते थे।

वो एक हंसती-खेलती लड़की

पूजा

पूजा कहती हैं, “सपने खूब देखती थी मैं… क्योंकि लगता था कि उन्हें पूरे करने का दमख़म मुझ में है।” लेकिन मासूम पूजा अपने भविष्य से अनजान थी। लोग तो कहा करते हैं कि जो भाग्य में लिखा है उसे कोई नही टाल सकता।

पूजा एक होनहार विद्यार्थी थी। उसका जीवन अन्य बच्चों की तरह स्कूल और फिर विश्वविद्यालय में व्यतीत हुआ। उन्होंने बताया, “मैं मेरठ विश्वविद्यालय में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत थी। ज़िन्दगी में जोश था और मेहनत करके आगे बढ़ने की ललक थी। हमेशा यह लगता था कि इस दुनिया में सब कुछ संभव है अगर चाहो तो…”परन्तु समय ने करवट बदली और वक़्त के सामने घुटने टेकने पड़े।

पूजा की ज़िन्दगी में विराम कैसे लगा?

सन् 2012 में हुए एक हादसे ने पूजा की जिंदगी बदल दी। रेलगाड़ी से हुए दर्दनाक हादसे में उनकी दोनों टांगें और एक हाथ चला गया। पूजा की तो रातों-रात दुनिया ही उजड़ गई। इस शारीरिक और मानसिक सदमें से बाहर आना पूजा के लिए आसान नहीं था।

वो आसपास घूमते लोगों की सामान्य शारीरिक क्षमता को देखती फिर अपने-आप को देखती तो दिल के टुकड़े-टुकड़े हो जाते थे। पूजा कहती हैं, “अक्सर मैं भगवान से अकेले में यही शिकवे-गिले करती थी कि आखिर मैं ही क्यों?”

हालात के आगे घुटने नहीं टेके

लेकिन पूजा ने हालात से समझौता नहीं किया। अस्पताल की तनहाइयों और ऊब भरे माहौल ने पूजा को कुछ करने की प्रेरणा दी और उसने तय किया कि वह हालात के आगे घुटने नहीं टेकेगी।
एक से दो महीनों के कड़े संकल्प और योग–व्यायाम के बाद पूजा कुछ शक्ति महसूस कर सकी। “मेरे अंदर के अध्यापक ने मुझे कहा नहीं अभी भी एक हाथ तो तेरे पास है। उठ खड़ी हो चल और इस युद्ध को जीत…” फिर पूजा रुकी नहीं बढ़ती गई अपनी मंजिल की ओर।

अस्पताल में विशेष प्रतियोगी परीक्षा के लिए दिन-रात एक करने के बाद पूजा ने इलाहाबाद के सरकारी बैंक में उच्च पद का कार्यभार संभाला। 2014 तक पूजा बिना रक्तस्राव के खुद से चलने लगी और इसकी वजह से उनके भीतर आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का संचार हुआ।

निशानेबाजी में बनाया कीर्तिमान

वैज्ञानिक शोध से ये साबित हुआ है कि खेल किसी भी व्यक्ति को पुनःस्थापित कर सकता है पूजा ने खेल को ढाल बना कर सफ़र तय करने की ठान ली और अपनी शारीरिक अक्षमता को देखते हुए निशानेबाजी में अपनी किस्मत आजमाने की ठान ली।

हैरानी की बात है न? कहां तो इस तरह के हादसों के बाद लोग निराशा में डूब जाते हैं। हिम्मत हार बैठते हैं मगर पूजा ने लगातार अभ्यास के जरिये निशानेबाजी की प्रैक्टिस जारी रखी। बस, फिर क्या था… दृढ़संकल्प और हौसले के दम पर पूजा ने निशानेबाज़ी में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना लोहा मनवाया।

शारीरिक विकलांगता को चुनौती स्वीकारते हुए पूजा ने निशानेबाजी कई पदक और ट्राफियां हासिल कीं और यह साबित कर दिया कि जीवन का अर्थ रुकना नहीं बस चलते जाना है।

अदम्य साहस और संकल्प की मिसाल पूजा को मेरा रंग का सलाम!

  • रचना खान

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