बस्तर डायरी : अपने घर को परिंदों का बसेरा बनाने वाले पूर्णेश्वर सिंह देव से मिलिए


स्मिता अखिलेश
‘पक्षी तूफ़ान गुजरने के बाद भी गाना गाते हैं; क्यों नहीं लोग भी जो कुछ बचा है उसी में प्रसन्न रहने के लिए खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं।”
– रोज़ केन्नेडी

जब भी कभी हम खुद को बहुत मुश्किल वक्त की कैद में अपनी साँसों, अपनी ऊर्जा और अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखा हुआ पाएंगे। तब ही हमारी आत्मा और मन के लिये प्रकृति के ठिया का आसरा ही, इकलौती उम्मीद रह जाती है।

हम आज इस वास्तविकता का आभाष ले पा रहे है कि लॉक डाउन के दौरान में कंप्यूटर गेम में घुसे बच्चे लगातार उसके आभाषी कैरेक्टर को सच समझते जा रहे है और सच के पशु पक्षियों को मिथक। तो बहुत देर होने से पहले लौट चलिये जंगल की ओर।

जहाँ आज भी मनुष्य और हर प्रजाति के पशु-पक्षी एक दूसरे के सहजीवन के साथ सुकून भरे पलों को अख्तियार करते है। जिनकी स्मृति में मैना, चिड़ियों के कलरव नहीं बसते, बल्कि यथार्थ में उनके साथ हर सुबह और शाम समेत हर पल को जीवंतता से बहते हुए महसूस किया जा सकता है।

इसकी एक बानगी धमतरी जिले के सिहावा से 6 किमी दूर ‘रतावा गांव’ में आप कभी भी जाकर देख सकते है। सुंदर पहाड़ी के नीचे पूर्णेश्वर सिंह देव का पक्का मकान है और कई एकड़ो में फैला उनका फार्म हाउस। जहाँ उन्होंने स्वयं के व्यय से घर मे ही सैकड़ो की संख्या में कई प्रकार के पक्षियों को आश्रय दे रखा है।

पूर्णेश्वर सिंह देव

बाकायदा विधिक रुप से पंजीकृत समिति बनाकर अपने घर मे छोटा चिड़ियाघर बनाकर रखे है। जहां कई प्रजातियों के चिड़ियों, उनकी ब्रीडिंग, उनकी देखभाल करते है। आपको यहाँ हंस, उल्लू, इमू, मुर्गा, खरगोश, बिल्ली सहित कुत्तों की कई प्रजीति देखने को मिल जाएगी। सरंचना भी ऐसे तैयार की गई है जिसमे तमाम जीव-जंतु उन्मुक्त होकर प्राकृतिक वातावरण में मज़े से रह रहे है।

कहीं गाड़ियों, लाउड स्पीकर का शोर नहीं, सिर्फ चिड़ियों की आवाजें और शुद्ध ऑक्सीजन। अपने हाथों से कई वैरायटी के एकवेरिम तैयार करके मछलियों को भी पाल रखें है। जहाँ मानवीय भावनाओं की कोई कीमत नहीं वहाँ एक छोटी सी पहाड़ी मैना की आवाज के वैरिएशन मात्र से देवजी समझ जाते है कि उसके दाएं पंजो के पास हल्की से खरोंच है । छत्तीसगढ़ में लोकोक्ति भी है-

“मनखे ला कुकुर नहीं पूछते
अउ चिड़िया मन ल बचाय म लगे है “

इससे इतर पूर्णेश्वर जी आदिवासी ग्रामीणों के लिये अपने घर में बकायदा जंगल जिम बनाकर रखा है। जिसमे आसपास के युवा अपने फिटनेस की प्रैक्टिस करते है उन्हें देवजी निःशुल्क प्रशिक्षण देते है। यहां के प्रशिक्षण से लगभग 80 की संख्या में युवा पुलिस मित्र बनकर प्रशासन का सहयोग कर रहे है। आसपास मेलों, बाज़ारो में इनकी समिति के सदस्य पर्यवरण जागरूकता का कैम्प नियमित रूप से चलाते है।

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कई नदियों, नालों और खूबसूरत पहाड़ियों के बीच गुजरकर आप इनके घर तक पहुंच सकते है। आसपास के ग्रामीण अपने बच्चों को लेकर इनके निजी चिड़ियाघर में भ्रमण के लिये आते है। घर मे एक पेड़ के ऊपर ट्री हाउस भी बनाकर रखें है । जिसमें होम स्टे किया जा सकता है । पूरी तरह निःशुल्क है। कोई टिकट नहीं, किसी प्रकार से प्रशासन से वितीय सहयोग के बिना प्रकृति के सहचर के रूप में अपनी भूमिका खुशी से निभाते हुए देवजी चुपचाप अपने हिस्से का काम कर रहे है।

कोई प्रचार प्रसार नहीं, हर साल सैकड़ो की संख्या में ग्रामीण युवाओ के सहयोग से वृक्षारोपण कराते है। अपनी अच्छी खासी नौकरी को छोड़कर के सालों से देवजी यह काम करते है इसकी प्रेरणा इन्हें अपने दादाजी से मिली बचपन से ही ये प्रकृति की गोद मे पलेबढ़े और पशु पक्षियों को घर परिवार के सदस्यों के तौर पर सहजीवन करते देखा है।

पढे-लिखे और आधुनिक तरीके से खेती किसानी करते हुए पूर्णेश्वर देव हल्बा आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधि चेहरा हैं। हल्बा आदिवासियों का मुख्य जीविकोपार्जन प्रकृति के सान्निध्य में कृषि करना है।

जहाँ लोग आज भी लोग जाति, भाषा और धर्म के श्रेष्ठता बोध से ग्रसित रहते हुए अपनी प्रांतीय श्रेष्ठता के दंभ में यह सोच रखते है कि आदिवासी समाज सिर्फ पिछड़ा हुआ होता है। और बस्तर सिर्फ नक्सल प्रभावित क्षेत्र है या समूचा छत्तीसगढ़ ही पिछले राज्य की श्रेणी में आता है। ठीक उसी वक्त आदिवासी समाज प्रकृति, जीव जंतुओं के लिये जितना लेता है उतना ही लौटाने के भाव में अपना पूरा जीवन लगा दे रहा होता है।

उनकी बात ऐसे करते है जैसे कोई अपने घरपरिवार के सदस्यों की बात करते रहते है। नींद से जगाने के लिये तोता कान में जोर जोर से चिल्लायेगा, नहीं उठेंगे तो चोंच से ठुनककर उठाने की कवायद करेगा। आप ऐसी सुबह की सिर्फ कल्पना नहीं सच मे महसूस करना चाहते है, तो रतावा जरूर हो आइए।

यहाँ खुशबू सिर्फ हवाओं में नहीं, लोगो के किरदारों में भी है। ऐसे कई किस्से कहानियां जंगलों में बसते है…

सोशल एक्टीविस्ट स्मिता अखिलेश का जमीन से जुड़कर काम करने का व्यापक अनुभव है। सहकारी बैंक की बैंक मैनेजर की हैसियत से वे पिछले कई सालों से किसानों, ग्रामीणों और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयासरत है। इन दिनों वे बस्तर पर काम कर रही हैं।