वंदना गुप्ता की कविता ‘दोस्ती, प्रेम और सेक्स’


वंदना गुप्ता

दोस्ती अलग है
प्रेम अलग है
सेक्स अलग है
किसी ने कहा मुझे
क्या कर सकती हो व्याख्या ?
बता सकती हो
क्या हैं इनके अस्तित्व?
क्या ये हैं समाये इक दूजे में
या हैं इनके भिन्न अस्तित्व?

दो विपरीत लिंगी
दोस्ती हो या प्रेम
हमेशा कसौटी पर ही
खड़ा पाया जाता है
क्यूँ समझ नहीं आ पाता है
दोस्ती का जज्बा  नेमत खुदा की
जिसको नवाज़ा है होगा कोई बाशिंदा
जहान से अलग खुदा के नज़दीक
यूँ ही तो खुदा को उस पर नहीं प्यार आया है
मगर विपरीत लिंगी दोस्ती
पर ही क्यूँ आक्षेप लगाया है
क्यूँ नहीं किसी को समझ आया है
हर दोस्ती की बुनियाद  सेक्स नहीं होती
इमारत इतनी कमजोर नहीं होती
महज़ शारीरिक आकर्षण
और स्त्री पुरुष का संग ही  क्यूँ ये दर्शाता है
यहाँ तो सिर्फ इनका शारीरिक नाता है
देह से इतर भी  सम्बन्ध होते हैं
जो प्रेम से भी गहरे होते हैं
फिर चाहे हो कृष्ण
सखी तो एक ही बन पाई थी
पांचाली ने भी  तो दोस्ती कृष्ण संग निभाई थी
पर वहाँ प्रेम दिव्यता पा गया था
दोस्ती की रस्में निभा गया था

प्रेम की डोर  बड़ी कच्ची होती है
इसमें ना कोई कड़ी होती है
अदृश्य तरंगों पर  ह्रदय तरंगित होते हैं
बिन देखे , बिन मिले बिन जाने भी
भाव स्खलित होते हैं
प्रेम में स्त्री पुरुष कब चिन्हित होते हैं
वहाँ तो आत्माओं  के ही मिलन होते हैं
फिर कैसे भेद करूँ
स्त्री पुरुष को अलग करूँ
फिर चाहे गोपी भाव  में समाहित हो
जहाँ  कृष्ण गोपी बन जाता हो
या गोपी कृष्ण बन जाती हो
पर प्रेम की थाह ना कोई पाता हो
प्रेम तो ह्रदय की वीथियों
पर लिखा अनवरत नाता है
जिसकी गहराइयों में  जिस्म से परे सिर्फ
आत्मिक मिलन ही हो पाता है
जो हर किसी को ना आता है
और वो प्रेम को भी
शरीरों के मिलन से ही तोल पाता है
मगर अपनी जड़ सोच से
ना मुक्त हो पाता है
सिर्फ स्त्री पुरुष रूप में ही
परिभाषित किया जाता है
मगर कभी उसकी दिव्यता को  ना जान जाता है
तभी प्रेम कभी भी  अपना मुकाम ना पा पाता है
इक बार स्त्री पुरुष भेद से बाहर आओ
खुद को प्रेम के सागर में डुबा जाओ
तो शायद तुम भी प्रेमग्रंथ लिख जाओ

दो विपरीत लिंगी मिलन
महज सम्भोग को ही दर्शाता है
सिर्फ देह से शुरू होकर
देह तक ही सिमट जाता है
कभी देह से इतर  ना इक दूजे का जान पाता है
और बीच राह में ही  बँधन चटकता जाता है
जब तक ना आपसी सौहार्द हो
तब तक कैसे ढाई अक्षर का आधार हो
सम्भोग का कैसे श्रृंगार हो
जब तक ना मित्रमय  वातावरण का विचार हो
जब तक ना प्रेम के बीज का  रोपण हो
कैसे कहो तो सम्भोग हो
सम्भोग मात्र क्रिया नहीं
जीवन दर्शन समाया है
सम्भोग से भी अध्यात्म तक मार्ग बताया है
पर वहाँ देह से इतर ही सम्बन्ध बन पाया है
सिर्फ कुछ पलों का सामीप्य ही  ना दीवार बने
मानस के मन का मजबूत आधार बने
जहाँ एक दूजे में ही
प्रेमी, सखा ,आत्मीय, ईश्वरीयतत्व
सबका दर्शन हो जाए
तन से परे मन का मिलन हो जाये
तो सम्भोग पूर्णता पा जाये
तभी शायद विपरीत लिंगी होना
सिर्फ एक रूप रह जायेगा
सम्भोग में भी दोस्ती और प्रेम का  आधार नज़र आएगा
और संपूर्ण दिव्यता को मानव पा जायेगा

यूँ तो दोस्ती , प्रेम और सेक्स
तीनो अपने मानदंडों पर खरे उतरते हैं
पर इनके अस्तित्व भी
इक दूजे में ही समाहित होते हैं
जहाँ बिना दोस्ती के  प्रेम ना जगह पाता है
और बिना प्रेम और दोस्ती के
सम्भोग का कारण ना उचित नज़र आता है
फिर कैसे इन्हें अलग करूँ
अलग होते हुए भी इनके अस्तित्व
इक दूजे बिन ना पूर्णता पाते हैं
हाँ… अलग अस्तित्व तभी सम्पूर्णता पाते हैं
जब इक दूजे में सिमट जाते हैं
मगर वहाँ वासनात्मक राग ना बहता है
सिर्फ अनुराग ही अनुराग होता है
सर्वस्व  समर्पण जहाँ होता है
वो ही प्रेम हो या दोस्ती या सेक्स
सभी का आधार होता है
शायद वहीँ दिव्यता का भान होता है