एक स्त्री के मन में आज भी बहुत से सवाल उठते हैं जैनेंद्र कुमार की ‘त्यागपत्र’ पढ़कर

एक स्त्री के मन में आज भी बहुत से सवाल उठते हैं जैनेंद्र कुमार की 'त्यागपत्र' पढ़कर

कात्यायनी दीप

त्यागपत्र जैनेन्द्र द्वारा रचित उपन्यास है। इसमें मृणाल नामक स्त्री की यातनापूर्ण स्थिति को मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास में प्रमोद नामक व्यक्ति अपने बचपन से कहानी का आरम्भ करता है। प्रमोद सामाजिक रूढ़ियों के आलोचक एवं विरोधी के रूप में चित्रित हुआ है।

मृणाल प्रमोद की बुआ हैं जो अपने अनुसार अपनी भावनाओं के अनुसार जीवन जीना चाहती हैं। परन्तु समाज उसे नियमों, बंधनों में जकड़ा रहना चाहता है। मृणाल के माता-पिता बचपन में ही गुजर जाते हैं। भाई भाभी के कठोर अनुशासन में रहकर वो अपनी पढ़ाई करती हैं।

मृणाल को अपनी सखी शीला के भाई से प्रेम हो जाता है और जैसे ही उनकी भाभी को पता चलता है, मृणाल को बेंत से मार मारकर कर बेहोश कर देती हैं। कुछ ही दिनों बाद मृणाल आत्मसमर्पण कर देती हैं और उनकी शादी अधेड़ और दोहाजू से कर दिया जाता है। जहाँ उसे प्रताडना के सिवाय कुछ नहीं मिलता।

इतनी ज्यादतियों के बावजूद मृणाल अपने पति के साथ निश्छल भाव से रहती है। पति के प्रति समर्पित मृणाल एक दिन अपने पति को अपना पहला प्यार बता देती हैं। पति को ये बात नागवार गुजरता है। उसकी पुरूषसत्तात्मक मानसिकता बर्दाश्त नहीं कर पाती है कि उसकी पत्नी का पहले से ही किसी से सम्बन्ध हो। मृणाल को दुश्चरित्रा, कलंकिनी, कुलबोरनी कहकर उसको घर से निकाल देता है।

एक कोयला वाला उसकी सुन्दरता पर मुग्ध होकर, अपने परिवार को छोड़, मृणाल के साथ रहने लगता है। जव वासना से मन भर जाता है तब मृणाल को छोडकर अपने परिवार के पास चला जाता है। मृणाल निराश और हताश नहीं होती हैं। बच्चों को पढ़ाकर अपना भरण-पोषण करती हैं। यहाँ भी समाज की मर्यादाएं उसका पीछा नहीं छोड़ती। अंततः वो चोर उचक्कों की बस्ती में रहने लगती हैं और मृत्युपर्यंत वहीं रहती हैं।

मृणाल का भतीजा चाहकर भी बुआ की सहायता नहीं कर पाता है क्योंकि वो भी समाज के बंधन में बंधा हुआ है। अंत में बुआ की मौत हो जाती है तब आत्मपश्चाताप इतना भर जाता है कि अपने न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे देता है।

इस उपन्यास में, चालीस के दशक में नारी की स्थिति को उद्घाटित किया गया है। पर अब भी स्थिति लगभग वैसी ही है।
प्रेम समाज के लिए तब भी गुनाह था और अब भी है।

इस उपन्यास को पढ़ते हुए किसी भी संवेदनशील पाठक और खास तौर पर एक स्त्री के मन में तो बहुत सारे सवाल उठते हैं। इन सवालों का आज भी हमारे पास कोई जवाब नहीं है।

  • एक नारी जब प्रेम में पड़ती है,तब वो अकेली प्रेम नहीं करती, उसके लिए एक पुरूष की आवश्यकता होती है तो प्रेम स्त्री को कलंकिनी और चरित्रहीन क्यों बना देता है? पुरूष को यही समाज माफीनामा कैसे दे देता है?
  • क्या मन की पवित्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण है शरीर की पवित्रता? अगर है, तो पुरूष का शरीर पवित्र क्यों नहीं माना जाता है?
  • समाज की मान्यताएं एवं परम्पराएं केवल स्त्री की स्वतंत्रता में बाधक क्यों है? एक नारी आजीवन स्वयं को साबित करने के लिए सबकुछ झेलती है। इन मान्यताओं के कारण मृणाल जैसी स्त्रियाँ कठिन परिस्थितियों में भी मायके क्यों नहीं आकर रह सकती हैं?
  • समाज पुरूष के लिए उदार और स्त्रियों के लिए अनुदार क्यों होता है?

मृणाल आत्मनिर्भर होकर जीना चाहती है, परन्तु परिवार और समाज पग पगपर प्रताड़ित करता है।उसे चरित्रहीन कहकर ठुकराता है। जबकि एक पुरूष व्याभिचार में संलिप्त हो, तब भी समाज उसे स्वीकार करता है।

त्यागपत्र में समाज से जुड़े कई प्रश्नों को यथार्थ अभिव्यक्ति प्रदान की गई है। एक युवती की चारित्रिक क्रियाओं, अनगिनत विवश इच्छाएं, सुनहरे बिखरते ख्वाब की यह मनोवैज्ञानिक कहानी बहुत मार्मिक है।

युवा रचनाकार कात्यायनी दीप सासाराम बिहार से हैं। उनकी अब तक दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। पहली कहानी संग्रह ‘अक्स’ और दूसरी कविता संग्रह जिसका शीर्षक है ‘मैं अपनी कविताओं में जीना चाहती हूँ’।