कहानी : गुलदस्ते के फूल


संजना अग्रवाल

आहट आई तो इंतजार कर रही अर्पिता ने सिर उठाकर देखा।  करीब आधे घंटे इंतजार के बाद सुजाता कमरे में आई। क्लीनिक के बगल वाले कमरे में उसने एक साफ-सुथरा वेटिंग रूम बना रखा था। वेटिंग रूम क्या वह किसी घर के ड्राइंग रूम जैसा था। सुंदर सोफे, इनडोर प्लांट्स, दीवारों पर पेटिंग। सामने सेंटर टेबल पर एक बड़े ही खूबसूरत से गुलदस्ते में हल्के सफेद, बैगनीं और सुर्ख फूल सजे थे। सुजाता अर्पिता की स्कूल टाइम की दोस्त थी। उनकी मुलाकातें बहुत कम होती थीं मगर जीवन के तमाम पहलुओं पर दोनों ही एक-दूसरे से बहुत खुले हुए थे। पहला प्रेम, दोस्ती, शादी, सेक्स जैसे जाने कितने पहलुओं पर उन्होंने एक-दूसरे से बहुत कुछ शेयर किया था। हालांकि दोनों के प्रोफेशन बिल्कुल अलग थे। सुजाता बतौर साइकियाट्रिस्ट प्रैक्टिस कर रही थी और अपने प्रोफेशन में सफल थी। वहीं अर्पिता एक एडवर्टाइजिंग कंपनी में कंटेंट राइटर थी।

अटेंडेंट कॉफी रखकर चली गई। “अब बताओ…?” सुजाता ने सोफे पर टेक लगाते हुए कहा।
“कुछ नहीं… बस बातें करनी थीं तुमसे आमने-सामने बैठकर…” अर्पिता बोली। थोड़ा ठहरकर कहा, “कुछ कन्फेस भी करना है किसी से… किसी के साथ अपनी बात शेयर करनी है।”
“वाह, इसके लिए मेरे पास आई। ऐसा करके तुम मुझे संकट में डाल देती हो। मैं अपने क्लाइंट से कुछ भी बोल सकती हूँ, इस बात का डर नहीं कि वह बुरा मान जाएगा… पर तुम्हारे साथ कई बार डर लगता है, तुम दोस्त हो बुरा मान गई तो?”

अर्पिता हंस दी। सुजाता का डर स्वाभाविक था मगर उन दोनों के बीच बुरा मानने जैसी कोई सीमा नहीं रह गई थी शायद। उसे याद आया जब उसके जीवन में रैना आई थी। उसका वैवाहिक जीवन बहुत अच्छा चल रहा था। अमीश अच्छे व्यक्तित्व वाला और विनम्र इनसान था। उसका और अपनी बेटी का बहुत ख्याल भी रखता था। मगर जाने क्या हुआ कि रैना से मिलने के बाद अर्पिता उसके आकर्षण में बंधने से खुद को रोक नहीं पाई। रैना उससे उम्र में लगभग सात-आठ साल छोटी थी। सांवली सी आकर्षक युवती। दोनों के बीच दोस्ती, मिलना-जुलना बढ़ता गया। दोनों की कद-काठी एक सी थी तो कपड़े भी शेयर होने लगे और धीरे-धीरे अर्पिता को यह समझ में आने लगा कि रैना उसके प्रति शारीरिक तौर पर भी आकर्षित है। एक छोटी सी ट्रिप में दोनों इंटीमेट भी हो गए। यह सिलसिला करीब दो साल तक चला।

उसने जब सुजाता को यह बात बताई तो सुजाता ने कहा कि बाइसेक्सुअल होना बहुत ही नैचुरल है। तीन से पांच प्रतिशत लड़कियां बाइसेक्सुअल होती हैं। पुरुष इसकी तुलना में थोड़ा कम होते हैं… सुजाता ने कहा।
“अब अगर आप बाइसेक्सुअल हैं तो एक ही व्यक्ति तो स्त्री और पुरुष दोनों की भूमिका नहीं निभा सकता” सुजाता ने हंसते हुए कहा, “तो पुरुष की जगह पुरुष ने ले रखी है और स्त्री की जगह कोई तो लेगा। इसमें गलत क्या है? अगर वो लड़की तुम्हारे जीवन में नहीं आती तो तुम अपने भीतर प्रेम के इस पक्ष से अनजान ही रह जाती।”

हां, यह सच है। रैना जाने कैसे अर्पिता के जीवन के कुछ खाली हिस्सों में रंग भर देती थी। हालांकि अर्पिता ने कभी इस बात का जिक्र अपने पति अमीश से नहीं किया। जबकि वह रैना का जिक्र आते ही थोड़ी रहस्यमय हंसी हंसता और कहता- “लो आ गई तुम्हारी सबसे क्लोज़ फ्रैंड।” हालांकि ऐसी ही हंसी वो आहान के लिए हंसता था। आहान दरअसल अर्पिता के ऑफिस में काम करने वाला 26-27 साल का लड़का था। कमाल का ग्राफिक डिजाइनर। लड़कियों की तरह कोमल और पतले हाथ। गोरा और सुकुमार। ऑफिस में दबी जुबान में उसे गे मान लिया गया था। पर आहान की अर्पिता से बहुत पटती थी। खाली समय में वह उसके साथ कॉफी पीता और दोनों लंच भी साथ करते थे। आहान को अमीश मजाक में उसकी गर्लफ्रैंड कहता था। ठीक वैसे ही जैसे कभी-कभी रैना को वह उसका ब्वायफ्रैंड बोल देता था।

“तो तुम क्या कन्फेस करना चाहती हो?” सुजाता ने सवालिया निगाहें उस पर टिका दीं।
दरअसल मैं अपने कलीग आहान के बारे में बात करना चाहती थी। सारा ऑफिस उसे गे मानता है। लड़कियां भी उसके चलने और बोलने के तरीके पर पीठ पीछे दबी हंसी हंसती थीं। पर मैंने पाया कि वह बहुत ही संवेदनशील लड़का है। धीरे-धीरे वह खुलने लगा। उसने बताया कि उसके पिता बचपन में अलग हो गए थे और वह अपनी मां के बहुत करीब था।
एक दिन मैंने उससे पूछा कि लोग तुम्हारा मजाक बनाते हैं तुमको बुरा नहीं लगता?
उसने कहा, “बहुत लगता है, कई बार मैं रात को चुपके से रोता भी हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ खुद को…”
मैंने उसे सांत्वना दी और कहा कि तुम इन बातों पर ध्यान न दो।
इस बातचीत का असर यह जरूर हुआ कि आहान के भीतर पहले के मुकाबले आत्मविश्वास आया और वह मुझसे और ज्यादा नजदीक हो गया।

कुछ जरूरी काम निपटाने के लिए मैंने हफ्ते भर के लिए वर्क फ्रॉम होम का ऑप्शन चुना। एक दिन आहान दोपहर में मेरे घर आया। घर पर उस वक्त न तो मेरे पति थे और न ही बेटी श्रेया। मैंने उसके लिए चाय बनाई और उसके पास सोफे पर बैठकर बातें करने लगी।
आखिर मैंने उससे सीधे पूछ ही लिया, “क्या तुम किसी लड़के से प्यार करते हो?”
“नहीं….” उसने आँखें झुकाकर कहा।
“तो कभी कोई लड़की तुम्हारे जीवन में आई?”
“आई तो मगर पता नहीं क्या होता है मैं किसी लड़की को देखते ही नर्वस हो जाता हूँ। बहुत घबराहट सी होती है।”
मुझे उस पर बहुत तरस और थोड़ा सा प्यार भी आ गया। मैंने कहा,
“अरे, ऐसा क्या? मुझे देखो… क्या मुझे देखकर घबराहट होती है?”
“नहीं ऐसे नहीं…..” उसने आँखें उठाकर मुझे देखा… “पर पास आने पर होगी…”
“पास आने से क्या होगा…” मैं थोड़ा उसके पास खिसक आई। “कुछ भी नहीं। मैं भी तो तुम्हारी तरह इनसान हूँ।”
“हां, वो तो है…” उसने मुझे आँख उठाकर देखा… पर साफ लग रहा था कि वह मेरे पास आने से नर्वस हो रहा है।
“मुझे छुओ…” मैं थोड़ी जिद में आ गई। “मैं छूने से टूट नहीं जाऊंगी।”
उसने झिझकते हुए अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। मैं उसका दूसरा हाथ अपनी कमर पर ले गई।
“कुछ हुआ? कोई लड़की डरने की चीज नहीं आहान… जैसे मैं हूँ वैसे ही कोई दूसरी लड़की भी होगी… उसके या मेरे पास आने से डरो नहीं…”
उसकी सांसें तेज चलने लगी थीं। उसका हाथ फिसलकर मेरे सीने पर टिक गया। उसकी हथेली का दबाव सुखद लग रहा था। मैंने उसे अपने पास खींच लिया।
“कुछ हुआ…” मैं उसके कानों में फुसफुसाई।
“हां…”
“क्या?”
“अच्छा लग रहा है”
“तो और पास आ जाओ…” मैंने कहा।

मैं सोफे पर लेट गई। उसके सामने मेरा शरीर था। जिसे मैंने धीरे-धीरे उसके सामने खुलने दिया।
मेरे हाथ उसकी पीठ से होते हुए कमर के नीचे पहुँचे। वह गे नहीं था। मेरा शरीर उसके भीतर उत्तेजना भर रहा था। मैंने उसका चेहरा अपने सीने पर खींच लिया और वह एक बच्चे की तरह उन्हें दुलराता रहा।

करीब आधे घंटे बाद हम दोनों अलग हुए।

“अपने कपड़े पहन लो।” मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया। पर मेरे भीतर कोई गिल्ट नहीं था। मैं खुद को बहुत हल्का सा महसूस कर रही थी।
“तुम सामान्य लड़के हो आहान। कोई गर्लफ्रैंड बनाओ। शायद तुम मेरी तरह बाइसेक्सुअल हो सकते हो… इसी दुविधा की वजह से तुम किसी लड़की के पास नहीं जाते होगे… तु्म्हें डर होगा कि तुम्हारे भीतर पुरुषत्व नहीं है। मुझे मालूम नहीं तुम मेरे बारे में क्या सोच रहे हो मगर तुम मुझसे कंफर्टेबल थे और मैं ही शायद तुम्हारे भीतर जमी यह बर्फ तोड़ पाई हूँ वर्ना तुम शायद सारी जिंदगी इसी पसोपेश में पड़े रहते… और लड़कियों से घबराते रहते।”

“तो ये है मामला।”  सुजाता ने मेरी पूरी कहानी सुनने के बाद कहा, “ठीक है, अगर तुम मेरी क्लाइंट होती तो मैं कहती जो हो गया वो हो गया। मैं ऐसी बातों नैतिकता के तराजू में नहीं तोलती हूँ। किसी लड़के से सेक्स करके तुम गलत नहीं हो गई। न ही तुम अमीश को धोखा दे रही हो… या उसके प्रति तुम्हारा प्यार कम हो गया है।””पर मुझे क्या अमीश को ये बताना चाहिए?”
“क्या तुमने रैना के बारे में कभी अमीश को बताया था?”
“नहीं, मुझे लगता था दो लड़कियों के बीच यह हुआ तो यह उन दोनों के बीच का प्राइवेट मैटर है। अमीश को क्यों रैना और मेरी पर्सनल चीज में शामिल करना। इससे हमारे रिश्ते में कोई फर्क नहीं पड़ता।
तो फिर आहान के साथ इंटीमेट होना भी उतना ही पर्सनल है। उससे भी तुम दोनों के रिश्ते में कोई फर्क नहीं पड़ता…” सुजाता ने कहा।

“एक बात समझो अर्पिता… आहान तुम्हारा दोस्त है और अमीश पति। मगर इस रिश्ते से अलग हर रिश्ता वहां पहुँचता है जहां आप सिर्फ औरत और मर्द होते हैं। सेक्स आपको वहां खींचकर ले जाता है। तुमने एक औरत बनकर उसके पुरुष की मदद की। बस।”
“अगर वो कभी दोबारा मेरे पास आना चाहे तो?”
“यह तुम्हें सोचना है। रैना के दूसरे शहर जाने के बाद तुम्हारे रिश्ते कैसे हैं।”
“अच्छे हैं, हम कभी कभी बातें करते हैं।”
“इस रिश्ते को भी उसी तरह से देखो। यहां भी तुमको ही तय करना है। शायद एक दिन ऐसा भी आएगा कि तुम यह बात अमीश से कहो और वह इस बात को उसी तरह से देखे जैसे कि मैं देख रही हूँ, पर इससे अहम यह समझना है कि हम सभी के भीतर सिर्फ एक स्त्री या सिर्फ एक पुरुष है, जो तमाम रिश्तों से परे है। प्रेम और रिश्ते सामने रखे गुलदस्ते के फूल की तरह है। कोई किसी को रीप्लेस नहीं करता। कौन सा फूल हटाऊं इनमें से?  ”

अर्पिता के फोन की घंटी बजी। “मैं चलती हूँ…” अर्पिता ने कहा।
“किसका फोन है?”
“अमीश का। मैं, अमीश और आहान आज रात साथ में डिनर पर जा रहे हैं।” अर्पिता ने राज भरी मुस्कान के साथ कहा।

सुजाता उसे हैरानी के साथ देखती रह गई।

संजना अग्रवाल इंदौर में रहती हैं और पेशे से प्राध्यापिका हैं। कुछ कहानियां तथा कविताएं। ज्यादातर अभी अप्रकाशित और निजी डायरी में ही सिमटी हैं। 
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