एसआर हरनोट की कहानी ‘भागादेवी का चायघर’ : व्यवसाय के केंद्र में स्त्री देह

एसआर हरनोट की कहानी 'भागादेवी का चायघर'

डॉ. चैताली सिन्हा

एस.आर.हरनोट वर्तमान में हिन्दी कथा-साहित्य में एक महत्वपूर्ण कथाकार के रूप में स्थापित हो चुके हैं। पहाड़ी जीवन के चितेरे एस.आर.हरनोट का जन्म सन् 1955 ई. में हिमाचल प्रदेश के जिला शिमला (गाँव- चनावग) में हुआ था। अपने जीवन में अनेक समस्याओं एवं चुनौतियों को झलते हुए आगे बढ़ने का साहस बहुत कम लोग ही कर पाते हैं। क्योंकि कई बार जीवन की ये विकट समस्याएं मनुष्य की ऊर्जा को नष्ट कर देती है। उसके मनोबल को तोड़ देती है। लेकिन एस.आर.हरनोट ने उन सभी झंझावातों को झेलते हुए आगे बढ़ने का निश्चय किया और अपने लिए एक अलग ज़मीन तैयार करने की सोची। वह ज़मीन थी कथा कहने और बुनने की। ताकि उनके माध्यम से अपने समाज, परिवेश और आसपास के वातावरण में घटनेवाली घटनाओं को उकेर सकें। कथा कहने की एक नयी शैली को इजाद कर सके।

जिनमें केवल पहाड़ों की सौम्यता की ही झलक न दीखे वरन् उसके भीतर का वो अभाव भी पाठकों तक पहुंचे जिससे अबतक सभी अनभिज्ञ थे। जिनकी कहानियों में अब केवल पहाड़ों की सुंदरता, वहां के नदी-नालों की स्वच्छता एवं लोक-जीवन में मौजूद सादगी का ही परिचय भर नहीं मिलता वरन् पहाड़ी अंचल के भीतर घुसपैठ हुए उन सत्तालोलुप और साम्राज्यवादी ताकतों की चालाकियों को भी उजागर करते हैं, जो पहाड़ी संस्कृति और जीवन-शैली को प्रभावित कर एक प्रकार की प्राकृतिक ही नहीं वरन् सांस्कृतिक प्रदूषण को बढ़ाने में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार है। इससे पूर्व की कहानियों में हमें कई रंग मिलते हैं, जैसे कि – हिमाचल की कला-संस्कृति, किसान जीवन की समस्या, कामगारों की समस्या, अपनी ज़मीन से उखड़े हुए खेतिहर मज़दूरों की समस्या, पर्यावरण की समस्या एवं स्त्रियों की समस्या इत्यादि। परंतु ‘कीलें’ कहानी-संग्रह में संकलित सातों कहानियाँ अपने-आपमें बहुत नूतन और प्रासंगिक कहानियां हैं जो वर्तमान परिदृश्य को उभारने में सहायक है। इन कहानियों में लेखक के कथा कहने का लहज़ा नितांत भिन्न धरातल पर आधारित है। जिसमें लेखक न केवल पहाड़ी लोक-जीवन में घुसते अनचाहे पर्यटकों की भीड़ को दर्शाते हैं बल्कि उन पर्यटकों के आने का असली मकसद भी उजागर करते हैं। इस दृष्टि से ‘भागादेवी का चायघर’ कहानी महत्वपूर्ण है। जिसपर आगे विस्तार से चर्चा किया जाना अपेक्षित है।

उक्त कहानी के अतिरिक्त ‘कीलें’ संग्रह की अन्य कहानियां हैं – ‘फूलों वाली लड़की’, ‘लोहे का बैल’, ‘पत्थर का खेल’, ‘आग’, ‘कीलें’ एवं ‘फ्लाई किल्लर’। इन सभी कहानियों में शासन, सत्ता, ग़रीबी, शिक्षा, रजनीति, टूटते पारिवारिक संबंध, वैश्विक परिदृश्य पर घटित होनेवाली ऐतिहासिक घटनाएं एवं स्त्री देह के प्रति समाज का यौन आकर्षण इत्यादि सभी यथार्थपरक विषय सम्मिलित हैं। कोई भी रचनाकार अपने युग, परिवेश और समाज से परे जाकर रचना नहीं कर सकता। उनके लेखन में समकालीन जीवन की छाप पड़ ही जाती है। अब रचना का उद्देश्य भी केवल कोरा मनोरंजन प्रदान करना नहीं रहा गया है। जैसे कि प्रेमचंद ने कहा था कि अब साहित्य का उद्देश्य केवल मनबहलाव की वस्तु नहीं रह गया है वरन् उनमें यथार्थ की अभिव्यक्ति भी अनिवार्य है। साहित्य और साहित्यकार दोनों के उद्देश्य क्या होने चाहिए, इसपर टिप्पणी करते हुए प्रेमचंद ने लिखा है कि “साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, – उसका दरजा इतना न गिराइये। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सचाई है।”

उपर्युक्त कथन एस.आर.हरनोट की कहानियों की रचना-प्रक्रिया के संबंध में बिलकुल सटीक ठहरती है। एक कहानीकार का उद्देश्य समाज को दिशा दिखाना भी होना चाहिए। समाज की अगड़ी-पिछड़ी नीतियों, रुढ़ियों, कुप्रवृत्तियों एवं उसके अभावों, इत्यादि सभी विषयों पर चिंता व्यक्त कर उसके लिए उचित सुझाव का संकेत देना भी एक कहानीकार का उद्देश्य होना चाहिए। इस दृष्टिकोण से हरनोट की प्रसिद्ध कहानी ‘फ्लाई किल्लर’ को देख सकते हैं। जिसमें लेखक की सामाजिक-राजनीतिक एवं देश-व्यापी चिंता व्यक्त हुई है। इस कहानी में लेखक भविष्य के प्रति आशंकित भी दीखते हैं।

नौकरी-पेशा करते-करते अचानक से साहित्य की ओर रुझान होना लेखक के भीतर की कलात्मक प्रवृत्ति को उजागर करता है। प्रेमचंद के शब्दों में कहें तो “साहित्यकार पैदा होता है, बनाया नहीं जाता; पर यदि हम शिक्षा और जिज्ञासा से प्रकृति की इस देन को बढ़ा सकें, तो निश्चय ही हम साहित्य की अधिक सेवा कर सकेंगे।” प्रेमचंद का उक्त कथन प्रत्येक लेखक के लिए है। यह लेखक की जिज्ञासा-वृत्ति ही है जो उन्हें कथा-सृजन करने की प्रेरणा देते हैं। एस.आर.हरनोट भी जब अपने जीवन-संघर्ष की चर्चा करते हैं तो वे बताते हैं कि किस प्रकार उनका रुझान कहानियों की ओर हुआ। कहाँ से उन्होंने कथा-भूमि को उठाना शुरू किया ! हिमाचल की कल-कल करती नदियाँ, वहां की प्रकृति, वहां के पहाड़, आड़ी-टेढ़ी पगडंडियाँ, उबड़-खाबड़ पथरीली सड़कें, वन-फूल, पौधे और उन सभी के बीच से झांकती वहां की कठिन जीवन-शैलियाँ; लेखक को कहीं-न-कहीं भीतर से पुलकित करने के साथ-साथ आंदोलित भी करता रहा था।

वास्तव में देखा जाए तो एक रचनाकार को कई बार खुद को भी इस बात का इल्म नहीं होता कि वह कब जीवन के मनोरम पक्षों पर लिखते हुए उसके कटू यथार्थ को अपने पन्नों पर उकेरने लग जाते हैं। पर्वत और पर्यावरण की चिंता करते-करते एस.आर.हरनोट कब देश और विश्व में घट चुकी अनैतिक एवं क्रूर रक्तरंजित ऐतिहासिक घटनाओं की चिंता में संलग्न हो जाते हैं इसका आभास उन्हें स्वयं भी बहुत बाद में जाकर होता है। लेखक सामाजिक विषमताओं से आहत ही नहीं होते वरन् उससे विचलित और परेशान भी होते हैं और यही विचलन उन्हें मनुष्यता से जोड़ता है। यथार्थ से जोड़ता है और यही होना भी चाहिए। जबतक किसी रचनाकार के भीतर समाज की विसंगतियों को देखकर छटपटाहट न हो तबतक वह खुद को यथार्थ भावभूमि से जोड़ने में असमर्थ होते हैं। यद्यपि इसीलिए प्रेमचंद ने कहा है कि “हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, – जो हममें गति और संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं ; क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।”

प्रेमचंद का उक्त कथन कथाकार को सजग रहने की प्रेरणा देते हैं। एक दूरदर्शी रचनाकार का महत्त्व इसी बात में होती है कि वे भविष्य को भांप लेते हैं। आनेवाला समय कैसा रूप ले सकता है इस बात का उन्हें आभास हो जाता है। जैसे कवियों के लिए यह उक्ति है कि ‘जहाँ न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि’ ठीक यही स्थिति लेखक के लिए भी उपयुक्त है। इस रवि तक पहुँचने के लिए लेखक प्रायः अपनी कहानियों में ऐसे चरित्रों का निर्माण करते हैं जो उन्हें वस्तुस्थिति से परिचय कराते हैं। संसार की वास्तविकताओं से रू-ब-रू कराते हैं। तभी तो प्रेमचंद कहते हैं कि “वह कहानी सबसे नाक़िस समझी जाती है, जिसमें उपदेश की छाया भी पड़ जाए।” अर्थात् कोरा उपदेश देना ही कहानी का उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि कहानी वह है जिसमें जीवन की जटिलताएं हों, मानव जीवन का संघर्ष हो, उसका सुख-दुःख, उसकी पीड़ाएँ और उसकी समस्याओं का सजीव चित्रण किया गया हो और ये सभी स्थितियाँ हमें हरनोट की कहानियों में मिलती हैं। जिसके लिए वे अपनी कहानियों में प्रायः ऐसे चरित्रों को उठाते हैं जो हिमाचल के लोक जीवन से संबंध रखता है। इनमें वे सभी मानवीय गुण-दोष मौजूद हैं जो मनुष्य का नैसर्गिक स्वभाव है। इन पात्रों के चरित्रों में सादगी भी है, छल-कपट भी है, संवेदनाएं भी हैं और क्रूरता भी है। उदाहरण के लिए ‘भागादेवी का चायघर’ शीर्षक कहानी को देख सकते हैं जिसकी मुख्य पात्र भागादेवी है और भागादेवी एक चाय बेचने वाली पहाड़ी कामगार स्त्री है। उसके पति ने उसे यह दुकान बनाकर दिया है जहाँ प्रतिदिन बाहर से आनेवाले पर्यटक भागादेवी की दुकान पर चाय पीने आते हैं। कहानीकार यहाँ यह बताना नहीं भूलते कि भागादेवी केवल चाय ही नहीं बेच रही होती है बल्कि चाय की ग्लास के साथ वह हर बार स्वयं भी बिक रही होती है। जहाँ पर्यटकों की लार टपकाती आँखें कभी भागादेवी की छाती पर और कभी उसके पूरे शारीरिक गठन पर टिकी होती है।

दरअसल यह कहानी स्त्री-अस्मिता पर आधारित कहानी है जिसका कथानक भागादेवी के इर्द-गिर्द घूमता है। भागादेवी जिस पहाड़ी पर अपनी दूकान चलाती है वहां हर किस्म के लोग आते हैं जो सभ्य होने की आड़ में स्त्रियों को देह व्यापार भी कराने से नहीं चूकते। इस समय उनकी आँखों की पुतलियों में भागादेवी की वह कसी हुई देह नाच रही है, जिसे हासिल करने के लिए वे तरह-तरह के पैंतरे अपना रहे हैं। कभी भागादेवी को लुभाने की कोशिश में और कभी उसके पति को प्रलोभन देने की कोशिश में ऐसे पर्यटक भागादेवी के चायघर में बैठने आते हैं। यह कहानी अकेली स्त्री-संघर्ष की कहानी है, जो दुनिया की तीखी नज़रों को सहने के लिए विवश है। भारतीय समाज में एक अकेले पुरुष का काम करना जितना आसान है अकेली स्त्री का उतना ही कठिन।

भागादेवी के दुकान पर बैठनेवाले लोगों में – कवि, लेखक, पत्रकार, फ़िल्मकार एवं नाटककार इत्यादि सभी शामिल हैं परंतु इन सबसे भागादेवी को उतना ख़तरा नहीं है जितना कि देश-विदेश की कंपनियों एवं अधिकारियों से है। उनका यहाँ आकर चाय पीना भागादेवी के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसका कारण उन सैलानियों के भीतर छुपा हुआ वह षड्यंत्र है जिसके माध्यम से वह सांस्कृतिक प्रदूषण को फ़ैलाने की कोशिश करते हैं। इसमें पहला सॉफ्ट टारगेट है – भागादेवी। इसे स्त्री देह के प्रति पुरुष समाज का आकर्षण नहीं विकर्षण कहना चाहिए। स्त्री देह के प्रति इस कामुकता के अनेक प्रमाण हमें इतिहास के पन्नों पर दर्ज मिलते हैं। जिसे मनुष्य कम और भोग्या अधिक समझा गया। इस संदर्भ में सीमोन द बउआर लिखती हैं – “स्त्री की भूमिका हमेशा पोषक की रही, सर्जक की नहीं। उसका अस्तित्व हमेशा मांसल रहा। वह कैद रही अपनी अंतर्वर्तिता में। वह अवतरित हुई केवल समाज के स्थाई आयामों में। पुरुष नित्य नये दरवाज़े अपने लिए खोलता गया।”

उपर्युक्त उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि वास्तव में स्त्री की स्थिति क्या है हमारे समाज और संस्कार में। स्त्री को नागरिक समझे जाने की भी चेष्टा बहुत बाद में की जाने लगी लेकिन उसका देह अब भी शोषण का ‘प्राइम साईट’ था। जिसे भागादेवी के रूप में चरितार्थ होते हुए देखा जा सकता है। भागादेवी के चायघर में आनेवाले लोग किस मंशा से आते हैं इसपर प्रकाश डालते हुए हरनोट जी लिखते हैं – “वे लोग चाय पीते हुए सहज नहीं दिखते। बैठने की मुद्राएँ, शारीरिक भंगिमाएं, हावभाव और मनःस्थितियाँ वहाँ के अनुकूल नहीं हैं। उनकी आँखों से अजीब-सी विकिरणें भीतर आ रही हैं। उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, देखा नहीं जा सकता।” स्वाभाविक है कि लोगों की कुत्सित भावनाओं को केवल महसूस ही किया जा सकता है क्योंकि ये भावनाएं, ये ग्रंथियां अदृश्य होती हैं। स्त्री का सुंदर देह ही कई बार उसके स्वयं का शत्रु बन जाता है।

यह सच है कि “लैंगिक पसंद में भी एक तरह का वर्गभेद दीखता है, कामगार वर्ग की दिलरुबा अब भी गद्दर गोलाइयों से भरी होती है लेकिन फैशनेबल मध्यवर्ग की श्रद्धा छरहरे, बल्कि पतलेपन में है। दोनों ही स्थितियां स्त्रियों से अपने शरीरों की रूपरेखाओं को दूसरों के नयनसुख के लिए ढालने की माँग करती हैं।” बात सच है। भागादेवी को दुकान पर बिठाने के पीछे उसके पति की मंशा क्या थी इसपर भी रोशनी डालते हुए हरनोट जी लिखते हैं- “तुम तो वैसे भी इतनी सुंदर हो। लोगों की निगाहें तुम पर लगी रहती हैं। वे तुम्हारी चाय कम तुम्हारे जिस्म को ज़्यादा देखते हैं। बड़ी-बड़ी छातियों के कारण ही ‘जी’ और ‘ए’ कंपनियों ने तुम्हारी इस उम्दा जगह को ख़रीदा है। उनका शेयर इसीलिए ज़्यादा है।” इसी संदर्भ में जर्मेन ग्रीयर लिखती हैं कि – “भरी-पूरी छातियाँ असल में स्त्री के गले में लटका फाँसी का फंदा हैं : ये उसे उन पुरुषों की निगाह में चढ़ा देती हैं जो उसे अपनी रबड़ की गुड़िया बनाना चाहते हैं, लेकिन उसे यह सोचने की छूट हर्गिज़ नहीं दी जाती कि उनकी फटी पड़ती आँखें सचमुच उसे ही देखती हैं। छातियों की तारीफ़ तभी तक है जब तक कि उनके असली काम की निशानियाँ नहीं दिखाई देतीं : रंग गहरा हो जाने, खिंचने या सूख जाने पर वे वितृष्णा उपजाती हैं।” एक स्त्री के लिए इससे अधिक अपमान की बात क्या होगी !

विवाह के बाद एक स्त्री सबसे अधिक शायद अपने पति पर ही भरोसा करती होगी/ है। परंतु यहाँ भागादेवी उन भाग्यशाली स्त्रियों की श्रेणी में नहीं आती। यहाँ तो स्वयं उसका रक्षक ही भक्षक बनकर उसका सौदा करने लगा है। कुल ले-देकर भागादेवी के पास एक उसकी देह ही तो बची है और वह भी अब नीलाम होने के क़गार पर है। एक स्त्री यदि सर्वाधिक किसी से प्रेम करती है, तो अपनी सुंदरता से, अपने आपसे परंतु वह दूसरों से भी प्रेम करना जानती है। जब प्रेम करने का यह अंतिम आधार भी उससे छिन जाता है तो वह ठीक उसी तरह असहाय हो जाती है जैसे पंख विहीन पक्षी…! यानी औरत के पास खोने के लिए कुछ नहीं।

शायद इसीलिए अरस्तु ने ‘औरत को केवल पदार्थ और पुरुष को गति’ कहा है। तभी तो भारतीय समाज में “बच्चों के जन्म का श्रेय माता से अधिक पुरुष के शुक्राणुओं को दिये जाने के साथ ही परिवार और कबीले पर स्त्री का सहज अधिकार समाप्त हो गया। स्त्री को जीवन में उसकी साझेदारी के कारण मिलनेवाली समानता पुरुष ने व्यवहारतः समाप्त कर दी और उसके साथ अब एक अधीनस्थ प्राणी जैसा व्यवहार करने लगा। स्त्री अब पुरुष की वस्तु हो गयी।” भागादेवी के पति बालेराम ने उसे एक वस्तु ही तो समझा था जिसकी वह मनचाहा बोली लगा सके। परंतु स्त्री के विकराल रूप से शायद बालेराम अपरिचित था तभी तो उसे भागादेवी के झन्नाटेदार चांटे का सामना करना पड़ा। उसकी आक्रामक रूप का सामना करना पड़ेगा। भागादेवी का अपनी अस्मिता की रक्षा हेतु यह क़दम उठाना हर उस दलित समाज की स्त्रियों (हर समाज की स्त्रियों) के लिए एक प्रेरणा है, जो हर रोज़ कहीं न कहीं पुरुष वर्चस्ववादी समाज में शोषण का शिकार हो रही होती है।

स्त्री देह के प्रति पुरुष समाज का आकर्षण प्रेम स्वरुप कम वासनामय अधिक है इस बात की पुष्टि करते हुए जर्मेन ग्रीयर ने लिखा है कि – “पुरुष उसे एक बर्तन, एक तरह के मानवीय पीकदान की तरह देखता है जिसमें उसने अपने शुक्राणु उंडेल दिए हैं, और वितृष्णा से भरकर मुंह फेर लेता है। जब तक पुरुष खुद की लैंगिकता से तालमेल नहीं बिठा पाता और जबतक वह स्त्री को मात्र लैंगिक प्राणी की तरह देखता रहेगा, वह उससे नफ़रत करेगा।” उक्त उदाहरण में भागादेवी के प्रति भी कंपनी वालों का यही नज़रिया है, यही मंशा है और भागादेवी इस मंशा को बहुत करीने से समझती है।

भागादेवी को मालूम है कि वह सुंदर है, उसका देह आकर्षक है, जिस कारण ही पहाड़ी पर आनेवाले हर पर्यटक की नज़र उस पर गिद्ध जैसी टिकी हुई होती है, वह उन भूखी आँखों को खूब पहचानती है। परंतु वह सतर्क है, बहुत सतर्क ! इसी परिप्रेक्ष्य में सीमोन द बउआर का यह कथन उल्लेखनीय लगता है कि “यदि कोई सुंदर आकृति और आकर्षक चेहरेवाली लड़की किसी महत्वाकांक्षी योजना में डूबी है या स्वाभाविक स्वतंत्रता चाहती है तो वह दूसरे मनुष्य की इच्छा के सम्मुख कभी नहीं झुकेगी। वह अपने कार्य-कलापों में अपने को देखती है। पुरुष की इच्छा, जो उसे उसके शरीर तक ही सीमित रखना चाहती है, उसे एक गहरा धक्का पहुंचाती है।”

उक्त कहानी की शुरुआत वैसे तो व्यंग्य से हुई है, जिसमें लेखक ने चाय को माध्यम बनाकर वर्तमान सरकार की जीवनी से प्रेरणा ग्रहण करने का संकेत किया है। वर्तमान में जो सरकार है उनकी संघर्ष गाथा के रूप में प्रायः यह उदाहरण दिया जाता है कि यदि मनुष्य के भीतर इच्छाशक्ति हो तो वह कितनी ही ग़रीबी में क्यों न जिये वह भी विदेशों की यात्रा कर सकता है, बड़े-बड़े पदों पर आसीन हो सकता है। लेखक यही सुझाव भागादेवी के लिए भी देते हैं।

वस्तुतः यह कहानी अपने कलेवर में एक साथ कई गंभीर समस्याओं को समेटे हुए है। इसमें केवल स्त्री अस्मिता के प्रश्न ही नहीं हैं वरन् बाज़ारवाद का वह प्रभाव भी है जहाँ हर चीज़ बिकाऊ है- भागादेवी की चाय से लेकर स्वयं भागादेवी भी ! जंगल के पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति की हर खूबसूरत उत्पाद तक बिकाऊ है, यहाँ तक कि उसका पति बालेराम भी बिकाऊ है। जिसे शराब और भांग पिला-खिलाकर कुछ भी करवाया जा सकता है। यहाँ तक कि अपनी बीवी तक को भी बेचा जा सकता है।

बालेराम बाहर से आये पर्यटकों एवं सैलानियों की चालाकियों और जंगलों की तस्करी से होनेवाले नुकसान से भी अंजान है। मानवीय गुणों-अवगुणों से लबरेज़ बालेराम धीरे-धीरे प्रकृति के विनाश में शामिल होता जाता है। पति के सुख-दुःख में हाथ बंटानेवाली भागादेवी ने मजबूरी में चाय की दुकान में बैठने का निर्णय लिया था परंतु उसे क्या मालूम था कि एक दिन वह खुद भी किसी शेयर की तरह ख़रीदी और बेची जा सकती है। भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ हर चीज़ बिकाऊ है वहाँ स्त्री को अगर एक वस्तु एवं भोग्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। बाज़ारवाद के कारण स्त्री देह को मनोरंजन के साधनों के रूप में सर्वाधिक सुलभ और उपयोग की वस्तु समझा जाने लगा है।

वर्तमान में स्त्री शोषण के अनेक ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिससे उसको सॉफ्ट टार्गेट किया जा सके। फिर चाहे वह पोर्नोग्राफी हो, सिनेमा जगत् हो, कॉर्पोरेट जगत् हो, कला-जगत् हो अथवा विज्ञापन जगत् ; हर क्षेत्र में स्त्री शोषण के अलग-अलग विकल्प मौजूद हैं। कभी काम के बहाने और कभी मनोरंजन के बहाने, दोनों ही सूरतों में स्त्री का देह एक ‘ऑब्जेक्ट’ ही है। इस बात को भागादेवी समझती है। वह बालेराम की बातों से, उसके लालच से हतप्रभ है जिसने अपनी पत्नी को भी दांव पर लगा दिया। यहाँ भागादेवी की प्रतिक्रिया भी देखने योग्य है “वह देख रही है कि उसके सामने उसका पति नहीं बाज़ार का कोई कुख्यात बनिया बैठा है जो उसका मोल-भाव कर रहा है। वह थोड़ा सहज होती है तो आँखें डबडबा जाती हैं। छलछला जाती हैं पर उसे आंसुओं पर नियंत्रण करना आता है।” इस कहानी की एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि लेखक ने भागादेवी को कहीं भी दीन-हीन अबला नारी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है बल्कि एक सशक्त और भीतर से मज़बूत स्त्री के रूप में चित्रित किया है जो नारी सशक्तिकरण की द्योतक है। कामगार स्त्री के लिए प्रेरणास्रोत है।

पहाड़ी अंचल में काम करनेवाली स्त्रियों के ऊपर वहां कार्यरत बाहर के लोग कैसी ललचायी नज़र रखते हैं इसे हम फ़िल्म ‘बम बम बोले’ से भी समझ सकते हैं। इस फ़िल्म में दो छोटे बाल कलाकार अपने माता-पिता के साथ पहाड़ी इलाके (उटी, असम) में रहते हैं, जहाँ बेरोजगारी है, भूख है, ग़रीबी है, शोषण है, पहाड़ी मार्गों से आवाजाही की समस्या है, संसाधनों का अभाव है और स्त्री देह को सस्ती कीमतों पर हासिल करने की जद्दोजहद भी। इस फ़िल्म के केंद्र में वैसे तो दोनों बालकलाकारों की (दोनों भाई-बहन) की छोटी-छोटी इच्छाएं हैं – दो जोड़ी जूतों की ! परंतु फिल्म के निर्माता ने इस छोटे से कथानक के माध्यम से पहाड़ी जीवन-शैली की समस्त समस्याओं को बहुत बारीकी से उकेरा है। चाय बागान के मैनेजर द्वारा पिनाकी (लड़के की मां) की माँ की अस्मिता को लूटने की कोशिश करना इस बात का द्योतक है कि किस प्रकार वहां की गरीब, मज़दूर और श्रमिक स्त्रियाँ शोषण का शिकार होती हैं। पूंजीपतियों की उपभोग की वस्तु बनती है। इस फ़िल्म को देखने के बाद एस.आर.हरनोट की कहानियां और अधिक गहरे अर्थों में समझ आती हैं।

लेखक ने इस कहानी के माध्यम से दलित समाज में व्याप्त अभावों को भी बहुत मार्मिक तरीके से उकेरने का प्रयास किया है। बालेराम के माध्यम से लेखक ने दलित समाज की कमियों को उजागर करने की चेष्टा की है। देखा जाए तो बालेराम यहाँ एक निम्न मध्यवर्गीय चरित्र के रूप में हमारे सामने आता है जिसकी महत्वकांक्षाएं उस ऊँचाई को छूने की है जहाँ उसे सिवाय धोखे, असफलता और अपमान के कुछ नहीं मिलता। दरअसल मध्यवर्गीय समाज की भी यही दिक्कतें हैं। उसकी प्रतिस्पर्धा हमेशा उस बुर्जुआ समाज से है जिसने सदैव गरीबों का शोषण करके समाज में अपना वर्चस्व कायम किया हुआ है। पूंजीपति वर्ग ने हमेशा सर्वहारा वर्ग को हाशिये पर रखने का षड्यंत्र किया है। तभी तो निराला लिखते हैं – ‘अब, सुन बे, गुलाब, भूल मत जो पायी खुशबु, रंग-ओ-आब, खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतरा रहा है कैपीटलिस्ट ! कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रखा, सहाया जाड़ा-घाम।’ कितनी प्रासंगिक हैं आज भी ये पंक्तियाँ सर्वहारा वर्ग को चित्रित करने के लिए, उनके शोषण को अभिव्यक्त करने के लिए।

इस कहानी के माध्यम से लेखक ने कई संदेश भी दिये हैं, जैसे कि विदेशी सैलानियों द्वारा स्वच्छता के प्रति अति सजगता और भारतीयों की असभ्य तरीके से जीने की आदतें- भागादेवी को बहुत कचोटता है। वह इस बात को बड़े गौर से महसूस करती है कि अपनी जाति, धर्म और समाज के लोगों में अभी भी कितनी कमियां हैं। इनका कोई व्यवस्थित जीवन शैली नहीं है जिसे देखकर लोगों को प्रेरणा मिल सके। परंतु बाहर से आनेवाले सभी पर्यटक इस बात का खास ख़याल रखते हैं कि उनकी वजह से किसी को कोई असुविधा न हो। जहाँ रहें स्वच्छ रहें, विनम्र रहें। भागादेवी के चायघर में आनेवाले पर्यटक न केवल अपना कूड़ा-करकट उठाकर वहां रखे कूड़ेदान में फेंकते हैं वरन् अन्य लोगों के द्वारा फैलायी हुई गंदगी को भी साफ़ करते हैं। इस संदर्भ में लेखक कहते हैं- “वह कई बार हैरान होती है कि विदेशी पर्यटक जो केवल घूमने की गर्ज से यहाँ आते हैं वे कभी ऐसा नहीं करते। ख़ाली लिफ़ाफ़ों और बोतलों को कूड़ादान में डालते हैं। सिगरेट को खूब बुझाकर राखदानी में फेंकते हैं। चाय के पैसों का भुगतान करते हुए उनके चेहरों पर विनम्रता होती है। भागा को आश्चर्य होता है कि उसके अपने घर-गाँव और देश के संस्कार बाहर कैसे चले गये हैं।”

वैसे उक्त चिंता को हम गांधी जी के स्वच्छता अभियान से भी जोड़कर देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त उपर्युक्त उदाहरण से इतिहास के कुछ कैनवास भी उभर आते हैं जहाँ औपनिवेशिक भारत में अंग्रेज़ी सभ्यता और संस्कृति में विद्यमान उनका व्यवस्थित जीवन-शैली ख़ास आकर्षण का केंद्र रहा था भारतीयों के लिए। उनका रहन-सहन, खान-पान, तौर-तरीके सब सलीकेदार और लुभावने होते थे। अंग्रेज़ों की तुलना में भारतीयों के जीवन जीने की कला बिलकुल जुदा थी। भारतीयों की तुलना में अंग्रेज़ अधिक पढ़े-लिखे और बुद्धिमान होते थे। भारत में शिक्षा का प्रचार-प्रसार ईसाई मिशनरियों के आने (मुद्रण यंत्र 6 दिसंबर 1556, गोवा, परंतु विस्तार बंगाल में अधिक मिला। सन् 1778 में हुगली में पहली बार बांगला भाषा का व्याकरण छपा) एवं नवजागरण के समय से बढ़ने लगा था जबकि इंग्लैंड जैसे यूरोपीय देशों में शिक्षा का विस्तार बहुत पहले से ही हो चुका था, क्योंकि वहां मुद्रण कला का स्वतंत्र रूप से विकास 14वीं एवं 15 वीं सदी में ही हो गया था। एक जो सिखा रहा था और एक सीख रहा था; दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। ऐसे में दोनों सभ्यताओं की तुलना करना उचित नहीं।

सभ्यता और संस्कृति की इस बुनावट के विषय में स्पेंगलर का मानना है कि संस्कृति की अंतिम अवस्था है ‘सभ्यता’ जहाँ एक के विध्वंस के साथ अगले की निर्माण प्रक्रिया जुड़ी हुई होती है। स्पेंगलेर के अनुसार – “सुसंस्कृत होने के पूर्व मनुष्य नंगा था, मांसाहारी था, घूमंतू था और जंगली पशुओं का शिकारी था। उससे अगली अवस्था कृषि की थी। संस्कृति का प्रारंभ होता है आदिम समाज के जंगलीपन से। स्पेंगलर इसे उन किसानों में से उद्भव होता हुआ देखता है जिनमें इतिहास की समझ नहीं है और जो अपनी अंतर्भावना के अधीन चलते हैं।” कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय संस्कृति का जन्म किसानी भावभूमि से होता हुआ शिक्षा के क्षेत्र तक पहुंचा परंतु पश्चिम के लोगों में शिक्षा का प्रसार बहुत पहले ही हो चुका था। ऐसे में पश्चिमी सभ्यता के साथ भारतीयों की तुलना करना उचित नहीं जान पड़ता! उक्त प्रसंग वैसे तो विश्लेषण की मांग करता है परंतु उक्त कहानी के संदर्भ में यह संक्षिप्त चर्चा समीचीन होगा।

दूसरी ओर इस कहानी में लेखक ने भागादेवी के माध्यम से पहाड़ी अंचल में बसे उन हाशिये पर रह रहे लोगों का जीवन उकेरने की चेष्टा की है, जो रोज़ी-रोटी कमाने के लिए हाड़तोड़ परिश्रम करते हैं। हरनोट जी ने भागादेवी के गंभीर व्यक्तित्व का चित्रण कर नारी-शक्ति को महत्त्व प्रदान किया है। उनके अनुसार “भागादेवी के अपने कई चेहरे हैं, जिन्हें बाहर से देखना नामुमकिन है। वह कभी देवदारुओं की तरह आसमान की ऊँचाईयों पर होती है। तो कभी हिमालय की चोटियों की तरह अडिग और बर्फ़ की तरह कठोर और कोमल। कभी बुरांश के फूलों की तरह रम्य, खुबसूरत और सुगंधित तो कभी बाघ की तरह खूंखार और बलिष्ठ। कौओं की तरह चालाक और तीव्र। आभी की तरह निश्छल, फुर्तीली और समर्पित।”

उपर्युक्त उदाहरण से स्त्री चरित्र की कई परतें खुलती हैं। कभी वह अपने स्त्रियोचित गुण के कारण बहुत कोमल और सुकुमारी है तो कभी वह चट्टान की तरह कठोर और दृढ़ निश्चयी। कभी स्वाभिमान की अट्टालिकाओं पर उसका तेवर रहता है तो कभी सुंदर, निश्छल, ममतामयी माँ की तरह सबकुछ समर्पित करनेवाली। कभी पहाड़ों सी ऊँची उनकी अभिलाषाएं होती हैं तो कभी वसुंधरा-सी असारता, जिसमें सबकुछ समा लेने की शक्ति निहित होती है- प्रेम, ममता, स्नेह, विश्वास, त्याग, समर्पण और कई बार विश्वासघात भी…!

हालांकि भागादेवी के माध्यम से लेखक ने यहाँ भी अपनी पर्यावरण और प्रकृति की चिंता को अभिव्यक किया है। लेखक की यह विशेषता है कि वह कहानी की पृष्ठभूमि चाहे कहीं से भी उठाये परंतु प्रकृति और पर्यावरण की चिंता करना वे नहीं भूलते। ‘भागादेवी का चायघर’ कहानी में भी लेखक ने भागादेवी को पर्यावरण और प्रकृति की चितेरी के रूप में प्रस्तुत किया है। हरनोट जी अपनी कहानियों में प्रायः आंचलिक पात्रों को ही विशेष दर्जा देते हैं। पर्वतीय अंचल की नरमी और कठोरता दोनों के प्रति लेखक सचेत है। नगरीय जीवन शैली से भिन्न पहाड़ी जीवन में रचे-बसे चरित्रों की मनोसामाजिकी कैसी होती हैं,विशेषकर स्त्री पात्रों की इसके लिए ही कहानीकार ने भागादेवी जैसी स्त्री पात्रों की सर्जना की है। भागादेवी नाम से ही मिलता-जुलता एक और आंचलिक पात्र है- ‘हक्वाई’ ! ‘हक्वाई’ कहानी का भागीराम (भाग्यराम), ये आंचलिक पात्र हैं जो एक अंचल विशेष के कारण ऐसे नामों से अभिहित किये गये हैं। क्या कारण है कि लेखक एक ही प्रकार के पात्रों को (एक ही प्रकार के नाम भी) अपनी कहानियों में उठाते हैं !

दरअसल कोई भी कथाकार जब किसी कथाभूमि (Plot) का निर्माण करते हैं तो उनके सामने तत्कालीन समाज का यथार्थ, वहाँ का परिवेश, वहाँ की भाषा-शैली, वेश-भूषा, रहन-सहन एवं वातावरण को ध्यान में रखकर करते हैं ताकि कहानी के माध्यम से उस समय के समस्त युगबोध को प्रस्तुत किया जा सके। एस.आर.हरनोट ने भी अपनी कहानियों में हिमाचली सभ्यता और संस्कृति, वेश-भूषा एवं रहन-सहन का सजीव चित्रण किया है, जिससे पहाड़ी जीवन-यापन के विविध पहलू पाठकों के समक्ष उभर आते हैं। एक ही प्रकार के पात्रों को अपनी कहानियों में उठाकर लेखक ने दलित समाज में निहित ग़रीबी, अभाव, आर्थिक तंगी, दलित स्त्री-पुरुषों का शोषण एवं रोज़गार की समस्याओं पर प्रकाश डालने की चेष्टा की है। हरनोट ने इन पात्रों के माध्यम से पहाड़ी जीवन की सूक्ष्म-से-सूक्ष्म जटिलताओं को, शोषण के कुचक्रों को, राजनेताओं की तानाशाही नीतियों को एवं शोषित समाज में निहित असंतोष तथा कुंठाओं को उकेरने की चेष्टा की है, फिर चाहे वह भागादेवी हो, बालेराम हो अथवा भागीराम !

दरअसल कहानीकार का उद्देश्य ही यही होता है कि वह एक ही प्रकार के चरित्रों को बार-बार समाज की मुख्यधारा में लाकर खड़ा करे ताकि पाठकों एवं साहित्य-समाज का ध्यान इन पात्रों की गतिविधियों, उनकी चुनौतियों एवं उनकी दुरुह जीवन की तरफ़ आकर्षित हो सके। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि इन पात्रों में अन्य सभी मनुष्यों की तरह सुखी जीवन जीने की जो अदम्य जिजीविषा होती है, सभ्य समाज और बुर्जुआ समाज; दोनों इनकी बुनियादी ज़रूरतों से अवगत हो सके। नाम बदलने और कार्यक्षेत्र बदल जाने से ही इनका जीवन भी बदल नहीं गया है, लेखक का एक मंतव्य यह दिखाना भी प्रतीत होता है। इक्कीसवीं सदी में भी इन सर्वहाराओं का जीवन कुछ खास नहीं बदला। समाज में आज भी वे शोषित, अपमानित और असमानता को झेलने पर विवश हैं।

हाशिये के लोगों और बुर्जुआ समाज के बीच यह जो असमानता है वह हमारे उस पक्षपातपूर्ण एवं भेदभावपूर्ण नीतियों के वर्गीकरण का ही परिणाम है कि एक शोषक बन बैठा और एक शोषित ! जबकि “डॉ. अम्बेडकर इस मत का समर्थन करते हैं कि व्यक्ति समाज का निर्माण नहीं करता, बल्कि वर्गों के मिलने से समाज का निर्माण होता है। पहले वर्ग ही थे, जिनसे बाद में जातियों का विकास हुआ।” वैसे देखा जाए तो एक मनुष्य के भीतर चारों वर्गों की प्रवृत्तियां मौजूद होती हैं – ब्राह्मण (जब वह धार्मिक पूजा-पाठ का कार्य करे), क्षत्रिय (जब वह किसी युद्ध में सम्मिलित हो), वैश्य (जब वह व्यापार करे) एवं शूद्र (जब वह स्वयं के घर में भी साफ़-सफाई इत्यादि का कार्य करे )। ऐसे में समाज में निहित यह असामनता और अपमान की खाई केवल दलित समाज के हिस्से में ही अधिक क्यों हो ! यह विचारणीय प्रश्न है और इस प्रश्न को, इस विचार को हरनोट ने अपनी ‘कीलें’ कहानी-संग्रह की समस्त कहानियों में उजागर किया है।

प्रायः कहानीकार अपनी कहानियों में कुछ ऐसे पात्रों का सृजन करते हैं, जो लेखक की सोच को सही दिशा तक पहुँचाने में सहायक हों। कहानी का शिल्प एक ऐसे वातावरण को ध्यान में रखकर बुना जाता है, जो उन चरित्रों की समस्त गतिविधियों, उनके भावों की अभिव्यक्तियों को यथार्थ रूप में चित्रित कर सके। हरनोट जी अपनी कहानियों में अमूमन ऐसे ही पात्रों को उठाते हैं, जो कहानी के परिवेश एवं वातावरण के अनुरूप कथा की पृष्ठभूमि का निर्माण कर सके। इसीलिए प्रेमचंद कहानी की विशेषता को रेखांकित करते हुए लिखते हैं – “कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफ़िल शुरु होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूरित कर देता है, जितना रातभर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।”

उक्त कथन कहानी-कला की विशेषता को इंगित करता है। कहानी में छोटी मुंह बड़ी बात कहने की अद्भुत शक्ति होती है। वह इतिहास नहीं है फिर भी उसमें सत्यता होती है जबकि इतिहास सदैव रक्तरंजित घटनाओं का पुंज रहा है। जैसाकि प्रेमचंद लिखते हैं – “इतिहास आदि से अंत तक हत्या, संग्राम और धोखे का ही प्रदर्शन है, जो असुंदर है, इसलिए असत्य है। लोभ की क्रूर से क्रूर, अहंकार की नीच से नीच, ईर्ष्या की अधम घटनाएं आपको वहाँ मिलेंगी और आप सोचने लगेंगे ‘मनुष्य इतना अमानुष है !’ साहित्य काल्पनिक वस्तु है; पर उसका प्रधान गुण है आनंद प्रदान करना, और इसीलिए वह सत्य है।”

साहित्य की यही सत्यता एस.आर.हरनोट की कहानियों में भी व्यक्त होती है। जहाँ रचनाकार अपनी कहानियों के माध्यम से राष्ट्र और समाज की उन तमाम चुनौतियों, अमानवीय घटनाओं, राजनीतिक विचारों में विष का वृक्षारोपण, मानव का मानव के प्रति अमानुषिक व्यवहार, जातीय और वर्गीय भेदभाव एवं नैतिक पतन सभी कुछ को प्रकट करने का साहस करते हैं। निष्कर्षतः एस.आर.हरनोट की यह कहानी ‘भागादेवी का चायघर’ स्त्री समस्या एवं उसकी चुनौतियां ; इन दोनों प्रश्नों को बहुत बेबाकी से पाठकों के सामने प्रस्तुत करने में सफल हुई है, यह कहना अनुचित नहीं होगा। स्त्री कितनी भी परिश्रमी हो, शिक्षित हो, बौद्धिक हो, प्रतिभासंपन्न हो लेकिन पुरुषवर्चस्ववादी समाज में उसका भोग्या रूप कहीं नहीं जाता।

समाज उसे यह कभी भूलने नहीं देता कि वह मनुष्य कम और एक वस्तु के रूप में अधिक देखि समझी जाती रही है, जिसका उपभोग, जिसका व्यापार और जिसकी देह पर एक बड़ा उद्योग भी खड़ा किया जा सकता है। बालेराम (भागादेवी का पति) की मंशा तो यही है कि भागादेवी को चाय की दुकानदारी के बहाने कंपनी वालों के सामने एक ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में प्रस्तुत कर सके और उनसे अपने लिए मन माफ़िक कारोबार खड़ा कर सके ! अपनी अलग पहचान बना सके। कितने आश्चर्य की बात है कि बालेराम जैसा पुरुष अपनी तरक्की स्त्री (पत्नी/प्रेमिका) को आगे लाकर, उसके देह की मांसलता को केंद्र में रखकर पाना चाहता है। यह और बात है कि भागादेवी के मज़बूत चरित्र और व्यक्तित्व के आगे बालेराम की सारी मुरादें फीकी पड़ जाती हैं। स्त्री कोमल होती है यह तो सब जानते और मानते हैं लेकिन वह कमज़ोर भी नहीं है यह कोई-कोई ही जान पाता हैं। जैसे कि बालेराम…!

अंत में, हरनोट की यह कहानी और भी गहरे विश्लेषण की मांग करती है। विचार-विमर्श की मांग करती है। अभी भी ऐसा बहुत कुछ है जो हो सकता है आँखों से ओझल रहा, पीछे छूट गया, कहीं कुछ तार जुड़ने थे लेकिन जुड़ नहीं पाये। ऐसे में यह कहानी पुनः विश्लेषण और बहस की मांग करती है…!


डॉ.चैताली सिन्हा ‘अपराजिता’ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी की शोधार्थी हैं। चिंतनपरक आलेखों के अलावा वे कविताएं भी लिखती है और मेरा रंग की नियमित लेखिका हैं। 


एसआर हरनोट से शालिनी श्रीनेत की बातचीत

संदर्भ सूची

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  9. जर्मेन ग्रीयर, ‘बधिया स्त्री’, (अनु.) मधु बी. जोशी, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, पहली आवृत्ति : 2014 : पृष्ठ. 36
  10. सीमोन द बउआर, ‘द सेकेंड सेक्स’, (अनु.) प्रभा खेतान, ‘स्त्री उपेक्षिता’, हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, संस्करण : 1998 : पृष्ठ. 57
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