रूपम मिश्रा की ‘ये आदम की बेटियाँ हैं’ और अन्य कविताएं


रूपम मिश्रा

रूपम मिश्रा अपने अलग अंदाज में रचनाएँ लिखने के लिए जानी जाती हैं। रूपम अपने शब्दों में खुद का बहुत छोटा सा परिचय देती हैं, ‘प्रतापगढ़ से हूँ! गृहणी हूँ! मनोविज्ञान और प्राचीन भारतीय इतिहास से एमए हूँ! एक बेटा है!’ किंतु उनकी कविताएँ ही उनकी पहचान हैं और वे किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं।

हमारा हिस्सा

मैं बचपन से गुड़ियों से खेली थी
हमें रंगों से खेलने की इजाजत नहीं थी

इसलिए एक दिन रंगों की गफलत में
मैं आग से खेल बैठी!

सारा दोष मेरी परवरिश का था गुड़िया देकर हमें भी
गुड़िया बना दिया गया !

हमें रंग पहचानना ही नहीं सिखाया गया था

इसलिए नहीं जान पायी तुम्हारा रंग कब बदला

हम कभी कंचे से नहीं खेलने दिया गया इसलिए मेरा निशाना हमेशा बेतरतीब रहा क्यों कि

आजाद रह कर भी, हममें इतनी भी परवाज़ नहीं थी कि
एक शाख से दूसरी शाख पर जा सकूँ

कैसे शजर थे हमारे! जो उड़ना भी नहीं सिखाये !

और तुम मनचाहे रंगों के कंचे से खेले थे
खेल में भी सटीक निशाना साधना बचपन से सिखाया गया था
इसलिए तुम्हारा लक्ष्य प्राप्य रहा !

तुम्हें छुटपन में ही उछलना सिखाया गया था

इस लिये तुमने जब चाहा ऊँची उड़ान भरी
और सारा आकाश तुम्हारा हुआ!

और हमें हमेशा सिर झुकाकर धीरे से चलने को कहा गया
इसलिए हमेशा डर बना रहा कि सिर उठाने पर ठोकर लग जायेगी
और धरती का सहमा कोना हमारे हिस्से आया।

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ये आदम की बेटियाँ हैं

उन्हें बिन बताये ही उनके कई चरित्र गढ़े गये थे

कई कथानक थे उनके ही
जिनमें उनकी उपस्थिति नगण्य रही
सहचरित्र ढेरों थे पर मुख्य पात्रा वे ही रहीं

गौरतलब ये है कि उनके ही नाम से गल्प का सतरंगी महल खड़ा किया गया
और वे उसमें कभी गयीं ही नहीं!
या शायद गयीं हों और भटककर वापस आ गयी हो !

ये वही उपलब्ध और रंगीन तबियत स्त्रियाँ हैं
जिन्होंने हँस-हँस कर पुरुषों से बातें की !

महानुभावों ने उन्हें अपने-अपने हिसाब से
अपनी कल्पनाओं में फिट किया!

जिस पुरुष के साथ वो ऑफिस गयीं
उसके साथ होटल के कमरे में भी जातीं हैं

जिस कलीग से वो ज्यादा बातें करती हैं उससे तो उनका चक्कर है
जो बॉस उनके काम से खुश है उससे तो वो निश्चित फंसी हैं

किसी ने कहा मुझे तो मैसेज करती हैं मैं इग्नोर करता हूँ

जो उनसे भी ज्यादा शरीफ थे उन्होंने कहा यार! मुझे तो रात में फोन करती हैं ! मैं नींद का बहाना बनाकर टाल देता हूँ

जो बेहद सज्जन थे बेचारे आधुनिक होने के साथ संस्कृति का भी लिहाज रखते थे
उन्होंने भाषा को अंग्रेजियत संस्करण में लपेटा
पर लहजा वही पुरनका था
कहा मुझे तो हरदम लिफ्ट देती हैं पर तुमलोग तो जानते हो मैं इसतरह की चालू लड़कियों से बहुत दूर रहता हूँ

श्रीमानों से कह दो ! डरना छोड़ दें इन हँसने वाली लड़कियों से !
ये भीगे परों की तितलियाँ हैं ! ये आदम की बेटियाँ हैं।

लड़कियाँ

हम उनके जी का जंजाल बेवकूफ लड़कियाँ थीं
हम जरा सी दिल्लगी को दिल से लगा बैठी थीं !

हम सभी एक पंख की परियाँ थी
कभी हम सबके भी दोनों पंख हुआ करते थे
हम खूब उड़ते खिलखिलाते थे
पर अब वो पंख दूर देश के जादूगर की जेब में है !

हमसब के गले में पीर की घंटियां बधी थी
जो दुःख देखकर झना झना उठतीं थीं

हम सब को बनाने के लिए ईश्वर ने उसी एक पोखर की मिट्टी ली जहाँ बारहों महीने नमी रहती थी

हम मिलते थे अक्सर भीड़ में और एकदूसरे के आंसुओं को पलको से चख कर पहचान लेते ! फिर गले लगकर रो लेते !

हम अपने- अपने पंखों के चोर जादूगर काम नाम नहीं पूछते ! हमें जरूरत ही नहीं क्यों कि सारे जादूगरों की एक ही जाति होती है

हमारे हँसने से फूल नहीं झरा न ही हमारे रोने से मोती!!
बल्कि हम हँसे तो बेतलब हम रोये तो बेवज़ह!!

पर देखना एकदिन मरुस्थल होती जा रही सारी नदियों की धार लौटने की वज़ह हमीं बनेंगे !!

और हमारी बेमतलब हँसी से ही सारे सूखते जा रहे दरख़्त हरे होंगें।