उपासना झा की कविता ‘रोना’

Upasana-Jha

उपासना झा

रोना इसलिए भी ज़रूरी था
कि हर बार
हथियार नहीं उठ सकता था

रोना इसलिए भी ज़रूरी था
कि हर बार
क्रांति नहीं हो सकती थी

रोना सुनकर
निश्चिन्तिता उतर आई थी
प्रसव में तड़पती काया में

रोना सुनकर
चौका लीपती सद्यप्रसूता की
छातियों में उतर आया था दूध

रोना था साक्षी संयोग वियोग का…

रोना था साक्षी
संयोग-वियोग का
जीवन-मरण का
मान-अपमान का
दुःख-सुख का
ग्लानि-पश्चाताप का
करुणा-क्षमा का
व्यष्टि-समष्टि का
प्रारब्ध और अंत का

रोकर
नदी बनी पुण्यसलिला
आकाश बना दयानिधि
बादल बने अमृत
पृथ्वी बनी उर्वरा
वृक्षों पर उतरा नया जीवन
पुष्पों को मिले रंग

रोना भूलकर
बनते रहे पत्थर
मनुष्यों के हृदय
उनमें जमती रही कालिख
उपजती रही हिंसा
उठता रहा चीत्कार
काँपती रही सृष्टि

रोना
बनाये रखेगा स्निग्ध
देता रहेगा ढाढ़स
उपजायेगा साहस
बोयेगा अंकुर क्षमा का
इतिहास ने बचा लिया है
शवों के ढेर पर रोते राजाओं को

स्त्री को सुनाई कल्पित मिथकों में
वह कथा सबसे करुण है
जिसमें उसके रोने से
आँसू बनते थे मोती
उनकी माला
आजतक गूँथकर पहना रही है स्त्री
पुरुष ‘नकली है’ कह कर रहा
और मालाओं की इच्छा

रोना है
सबसे सुंदर विधा
अपने आँसुओं से धुलती है
अपनी ही आत्मा

रोना
इसलिए भी जरूरी था
कि मर जाने की इच्छा
टुकड़ो में जीती रहे।

उपासना झा की कविताएं अक्सर अपनी संवेदना और विषय के कारण ध्यान खींचती रहती हैं। वे समस्तीपुर, बिहार से हैं। साहित्य के अलावा फोटोग्राफी में रुचि। हॉस्पिटैलिटी और मीडिया में काम करने के बाद इन दिनों हिन्दी में शोध।


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