पूनम शुक्ला : ‘मत कहो इसे प्रेम का प्रतीक’ तथा अन्य कविताएं

पूनम शुक्ला की कविताएं

पूनम शुक्ला की कविताएं स्त्री की स्थिति और पितृसत्तात्मक समाज का सिर्फ यथातथ्य चित्रण नहीं करती बल्कि वे अपने पाठकों को इन रचनाओं के माध्यम से एक वैचारिक यात्रा से गुजरने का मौका देता है। कहना न होगा कि उन हर कविता से उपजी ऐसी वैचारिक यात्रा हमारे समाज और उसमें स्त्री की मौजूदगी को देखने की एक नई दृष्टि देती है।

कंप्यूटर साइंस में एमएससी पूनम की रचनाएं नया ज्ञानोदय, पाखी, समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, जनपथ, स्त्रीकाल, संचेतना, रेतपथ, युद्धरत आम आदमी, परिकथा, समालोचन जनसत्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘उन्हीं में पलता रहा प्रेम’ तथा सूरज के बीज’ के नाम से कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत हैं उनकी चार कविताएं।

जीवन एक युद्ध है

नजर आता है
हर तरफ एक युद्ध
अंदर बाहर
घर में, गली में
दुकानों में, माल्स में
अस्पतालों, दफ़्तरों, बैंकों की लंबी कतारों में
अपने उनके सबके विचारों में
खुद के विचारों में

इस शरीर के भीतर भी युद्ध ही है
लड़ती हैं सैकड़ों कोशिकाएँ
आक्रमण,संक्रमण के खिलाफ

हर दिन लोहा लेती है एक स्त्री
विभिन्न विचारों
अनिच्छित कार्यों
जुल्मों के खिलाफ
पर लोहा लेते हुए कम हो जाता है
उसके रुधिर में लोहे का स्तर

एक स्त्री
नव सृजन को
दे देती है
अपनी मजबूत हड्डियों का एक अंश
फिर थोड़ी कमजोर हुई
हड्डियों के सहारे
अपने शरीर का बोझ उठाते
चलती रहती है
सुबह से रात तक
साथ छोड़ने लगती हैं हड्डियाँ
कहीं पोली
कहीं आकृति बदलने लगती हैं हड्डियाँ
औरत फिर लड़ती है
अपनी ही हड्डियों के खिलाफ

कैल्शियम और आयरन की
गोलियाँ गटकती हुई
बखूबी जानती है
आज की औरत
जीवन एक युद्ध है ।

मशीनी हाथ

सुबह से शाम तक
कैसे करते हैं लोग
एक सा ही काम
एक किसान जो हल जोतता है
जोतता ही रहता है दिनभर
कटिया करती महिलाएँ
काटती रहती हैं
दिन भर गेंहूँ बाजरे
ईंटे ढ़ोता वह मजदूर
पूरे दिन कैसे ढ़ोता है ईंटे
फैक्ट्री के भीतर
दिन भर एक सी ही
ऐसेम्बलिंग करते हैं कई हाथ
हाथों में कटर लिए
दिन भर बस धागे ही
कैसे काटते हैं कई हाथ
स्कूल में मास्टर साहब
हर साल पढ़ाते हैं वही
पहले वाले सारे पाठ
और फिर एक से ही सवाल जवाब
दिन भर कैसे जाँचते हैं उनके हाथ

ये हाथ तो सुन्न पड़ जाते होंगे
एक सा ही करते-करते काम
मशीन से बस चलते ही रहते होंगे
बिना किसी आदेश,बिना किसी ज्ञान
पर इन्हें खुराक मिल ही जाती है
पीड़ा और भूख के आग की
इन्हें मिलते हैं सपनों के रंग
घरवाली के हाथों की हरी चूड़ियों की खनक से
सुनते रहते हैं ये हाथ
बच्चों के हाथ में खेलते खिलौनों की बात
बहन के हाथों की मेंहदी
भेज देती है इन्हें जीवन की गंध
नहीं ये मशीनी हाथ नहीं
जुड़े हैं इन हाथों से
कई धड़कते जीवंत हाथ।

पहाड़ का राई

अहंकार का पहाड़
अक्सर रहता है मेरे आस-पास
पर ऐसा कहीं लिखा ही नहीं
कि अगर आपने कैद कर लिया
अपने अहं को अपनी मुट्ठी में
तो अदृष्य हो जाएगा यह पहाड़ भी

पहाड़ ज्यों को त्यों है
लगता है मैं ही लुप्त हो जाऊँगी

सोचती हूँ
उठा ही लूँ अब
चाणक्य नीति की किताब
लिखा है जिसमें
उजागर करना मत कभी
सत्य अहं के सम्मुख
बस उसे तुष्ट करना
और पहाड़ को राई में
तब्दील होते देखना ।

मत कहो इसे प्रेम का प्रतीक

मुमताज़ !
क्या शारजहाँ सचमुच करता था तुम्हें प्रेम
और बनवाया था ताज़महल
ताकि जीवित रहे उनका प्रेम युगों-युगों तक
या बस उन्हें अनगिनत संतानें चाहिए थीं तुमसे

तुम तो तब्दील कर दी गईं थीं एक यंत्र में
जिसे हर वर्ष जननी थी एक संतान
चौदह संतानों के जनने के बाद
आखिर क्या बचा था तुम्हारी अपनी देह में
क्या कभी पूछा तुमसे शारजहाँ नें
कितनी है शरीर मे पीड़ा
किस तरह ऐंठती हैं तुम्हारी नसें
नसों में रक्त दौड़ता भी है
या थम गया है
इतनी संतानों को देते-देते
अपनी हड्डियों का अंश
क्या बची भी हैं वे तुम्हारे अपने शरीर में

तुम समझ नहीं पाईं
अपने शरीर के यंत्र का होना
सात संताने जीवित रहीं
सात मृत्यु को प्राप्त हुईं
और इस तरह चूस लिया गया
तुम्हारे शरीर का एक-एक कतरा
आखिर कार तुम नहीं झेल पाईं और प्रसव पीड़ा
और समा गईं स्वयं ही मृत्यु की गोद में

नहीं मुझे तो कहीं भी नहीं दिखता
तुम्हारे प्रति शारजहाँ का प्रेम
नक्काशियों भरा यह मकबरा
उसके लिए था बस अपने अहं की तुष्टि
जिसके लिए हाथ तक कटवा दिए गए
कर्मठ मजदूरों के
मकबरे में तो तुम जीते जी
तब्दील हो गई थी मुमताज़
तभी तो जनी तुमने औरंगजेब सी नापाक औलाद
जिसमें एक अंश भी न आया प्रेम का
और काट डाले उसने शीश अपने ही भाई
दारा शिकोह, शाहशुजा एवं मुराद बख़्श के
अपने ही वृद्ध पिता को हटा दिया ‘तख्त-ए- ताऊस’ से
और कर दिया आगरे के क़िले में क़ैद

मत कहो इसे प्रेम का प्रतीक
यह बस मकबरा है जिससे मरे हुए लोगों की बू आती है।