प्रतिभा कटियार की कविता ‘नहीं लौटता कुछ फिर भी’

Pratibha Katiyar

प्रतिभा कटियार

हालांकि लौटाये जाने पर भी
सब कुछ लौटता नहीं फिर भी
उधार की चीजें लौटाया जाना जरूरी है

नहीं लौटता वो रिश्ता
जो चीजों की उधारी के दरम्यान
कायम हो जाता है
हमारी जरूरतों से

पढ़ी हुई किताबों के लौटाये जाने पर
नहीं लौटते पढ़े हुए किस्से
किताब के पन्नों पर चिपकी,
मुड़ी ठहरी हमारी नजर
हमारी उंगलियों की छुअन…
देर तक उसका सीने पे पड़े रहना
किताब के पन्नों में भर गई हमारी ठंडी सांसें

मांगी गई स्कूटर लौटाये जाने पर
वापस नहीं लौटता वो सफर
जो उधारी के दौरान तय किया गया हो
उधार के स्कूटर पर बैठकर मिलने जाना महबूबा से
उसका सहमकर बैठना पीछे वाली सीट पर
रास्ते में सफर के दौरान उग आये नन्हे स्पर्श
और रक्ताभ चेहरा, सनसनाहट
नहीं लौटती स्कूटर लौटाने के साथ…

महंगे चाय के कप लौट जाते हैं पड़ोसियों के
लेकिन नहीं लौटती उन कपों को ट्रे में रखकर
लड़केवालों के सामने ले जाने की पीड़ा
और भीतर ही भीतर टूटना कुछ बेआवाज

लौटाये गये म्यूजिक एलबम के साथ
नहीं लौटता उम्र भर का वो रिश्ता
जो सुनने के दौरान कायम हुआ
उस संगीत से

लौटाये जाने पर नहीं लौटते वो आंसू
जो उधार के सुख से जन्मे थे

फिर भी उधार ली हुई चीजों का
लौटाया जाना जरूरी है.

प्रतिभा कटियार लखनऊ में पली-बढ़ी हैं। राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर, विधि में स्नातक और पत्रकारिता में डिप्लोमा। ‘स्वतंत्र भारत’, ‘हिंदुस्तान’ ‘जनसत्ता एक्सप्रेस’ और ‘दैनिक जागरण’ में अहम जिम्मेदारियां निभाईं। इन दिनों अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथ शिक्षा के क्षेत्र में काम। स्त्री मुद्दों पर केंद्रित ‘चर्चा हमारा’ और व्यंग्य संग्रह ‘खूब कही’ का संपादन। ‘प्रतिभा की दुनिया’ नाम से एक ब्लॉग।


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