युवा कवयित्री वंदना पराशर की सात कविताएँ

वंदना पराशर की कविताएं

वंदना पराशर

युवा कवयित्री वंदना पराशर में स्त्री विमर्श का स्वर बहुत मुखर है। अपनी कविताओं के माध्यम से वे हमारे समाज और अपने आसपास की स्त्रियों के जीवन को देखती-परखती हैं और उनकी व्यथा और विंडबना को स्वर देती हैं। सन् 1984 में सहरसा, बिहार में जन्मी वंदना ने एमए और अलीगढ़ मुसलिम यूनीवर्सिटी से पीएचडी की शिक्षा हासिल की है। वे हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत तथा अपनी मातृभाषा मैथिली जानती हैं। वंदना की कविताएं कादंबनी, अभिनव, प्रत्यक्षा समेत कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वे अलीगढ़ में रहती हैं। प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएं –

अपना घर

स्त्री
भटकती है
जन्म से मृत्यु तक
खोजती हुई
एक घर
पिता से
भाई,
पति से
पुत्र तक
ढूँढ़ती हुई/अपना घर।

औरत

माँ की आंखें नम थीं
पिता ने एक बार फिर से
माँ को औरत होने का एहसास करवाया है
पिता
जिसके कमज़ोर शरीर का भार
टिका है माँ के कंधे पर
फिर भी पिता,
पिता है
और माँ…
पिता उतने भी निष्ठुर नहीं थे
जितना कि पितृसत्ता ने ढाल दिया है उसे
उसे प्यार था माँ से
वह चूमता था माँ को
उसके माथे को छूता था
जब वह ज्वर से पीड़ित होती
ख़्याल था उसे माँ के जने का भी
फिर भी पिता
पिता थे
मैंने हमेशा ही माँ का आँचल ढूंढा
जहाँ अथाह प्रेम और करुणा थी
निस्वार्थ, निश्छल और
अहम से कोसों दूर

चाक

स्त्री
गीली मिट्टी की तरह होती है
कई बार
कई रूपों में
वह ढलती है
चाक पर
उसका आकार कभी
स्थायी नहीं होता
वह बदलती रहती है
समय के हिसाब से
कई धूप खाई
वह पकती है आग में
आग में तपकर निकली हुई मूर्तियों में
कुछ के कान
कुछ के मुँह,
नहीं होते हैं
होती हैं तो
गाय-सी बड़ी-बड़ी आँखें
जो झाँकती है
कुम्हार की आँखों में।

आओ मिलकर साथ बिता लें

नदी के उस पार ‘तुम’
और ‘मैं’ नदी के इस पार
समय की धाराओं में हम
यूँ ही चलते रहे किनारे-किनारे
ज़रूरत तुम्हें भी थी
और मुझे भी
पुकारा तो तुमने भी होगा
कभी नदी की तेज़ लहरों में
तो कभी तेज़ हवा के झोकों में
गूँज बनकर वह अनसुनी-सी रह गयी
सोचा तो कई बार की हम
ले आये कहीं से पतवार
या बना ले नदी के ऊपर एक पुल
ख़ैर,
अब जाने दो बीती बातों को
जीवन के इस अंतिम पड़ाव में
आओ मिलकर साथ बिता लें।
आओ मिलकर,साथ-साथ हम
नदी को अपने में समा लें।

रीढ़-विहीन लोग

उसकी रीढ़ की हड्डी
झुकती जा रही है
वह हैरान नहीं है,
थोड़ा परेशान है
अपने बचपन की मासूमियत को खोकर
आशंका है कि
कल लोग रीढ़- विहीन हो जाएंगे
उनके कान लम्बे किन्तु
छिद्र प्राय: बंद होंगे
सबके आंखों पर एक मोटी कांच की दीवार होगी
जिसमें सबकुछ धुंधला दिखेगा
स्वंय के बनाए हुए यंत्र ही
उसे ढाल देंगे एक यंत्र में
जहां उसके सोचने- समझने की शक्ति
संचालित होगी रोबोट की रिमोट से
हाड़- मांस का बना यह शरीर
एक यंत्र में बदल जाएगा
खत्म हो जाएगी उसकी संवेदना
उसकी हंसी, उसके आंसू
सब नकली होंगे
रीढ़- विहीन लोग
हताश होकर दौड़ रहें हैं
चारों दिशाओं में
कभी आकाश, कभी पाताल
अंतरिक्ष के हरेक कोने में झांक रहे हैं
और ढूंढ रहे हैं अपने लिए
एक पहाड़- खुशियों का।

अंधी दौड़

यह भीड़तंत्र है,
भीड़तंत्र है!
हुजूम चली है चूहों की
अंधे,लंगड़े,गूंगे,बहरे
चल पड़े हैं सभी
किसी एक स्वर के पीछे
आगे-आगे बिल्ली ने
थाम लिया है झंडा
बिल्ली की तो पौ-बारह
बिल्ली ने हुंकार भरी है-
जीत हमारी निश्चित है
चिल्लाओ सभी,मेरे इस नारे को
कुत्ते की क्या है औकात
हमीं पड़ेंगे सब पर भारी
जीवन के अंतिम सांसों तक
लड़कर पूरी रोटी पानी है
यह हक़ है हमारा
चूहे की थी हालत पस्त
कुछ ऊंघते,कुछ सोते,कुछ अनमने से
केवल सबके पांव चल रहे थे
और नींद में बड़बड़ा रहे थे सभी
बिल्ली के सिखाए हुए मंत्र
देख रहे थे सभी सुखद स्वप्न
पूरी रोटी खाने की
कि तभी एक विस्फोट हुआ
झंडा छोड़कर भागी बिल्ली
चूहे सभी हुए वहीं ढेर
मत पूछो,इस तंत्र की बात
यह भीड़तंत्र है,
भीड़तंत्र है!

संताप

व्यथा के भार से
धंसी आंखें
आज अपनी ही देह की आंच पर
पका ली अपनी देह
मौसमी फल की तरह भी
सुख कहां नसीब था उसे
सुख की राह ताकते
एक लंबा सफर
तय कर लिया उम्र ने
आशा की लौ जलाए
जीती रही
जलती रही उम्र-भर
बांटती रही अपने हिस्से का सुख
और आज
टूट गया वो सब्र का बांध
बुझ गई ‘लौ’ आशा की
असहनीय थीं पीड़ा
कातर नज़रों से
वह घूर रही थीं उसे
जिसे बांटती चली आई थी,अपने हिस्से का सुख
उपेक्षित ह्रदय, हाहाकार कर उठा
धधक उठी ज्वाला हृदय की
थका हुआ शरीर,
थका हुआ मन
आज अपने ही देह की आंच पर
पका ली अपनी देह।