राखी सिंह की ‘मरीचिका’ तथा अन्य कविताएं

Poems by Rakhi Singh

राखी सिंह

साथ

मैने जितनी पुकार लगाई
वे सब मुझ तक वापस लौट आई हैं
नितांत सन्नाटे में मैं उन्हें सुनती हूँ

मेरी अकेली ध्वनि
मुझसे छूटकर भी
मुझे अकेला नही छोड़ती

मैने साथ रहने की जितनी कल्पना की है
और तुमने दावे,
उन सबमें
अकेलेपन ने ही सम्पूर्णतः
साथ निभाया है।

छन्न की ध्वनि

मै मूढ़
इतना ही जान पाई प्रेम कि
एकांत की तन्द्रा भंग करने की शक्ति
है केवल आकुल पुकार के पास

इतनी तीव्र थी घात
कि देर तक गूंजती रही
मन के एकांत में
मन के टूटने की ध्वनि!

मन

सूने, एकांत कक्ष से मन।
क्यों नही लगाया कोई किवाड़ ?
ना ही एक भी कुंडी
कमसकम
हवाओं के खरखराने से
उपजी ध्वनि का भरम तो पनपे

मेरे मन! भय किस बात का?
भला किस प्रकार रह लेते हो
यूँ दुर्ग समान अभेद किले के भीतर ?

हर उपद्रव उपरांत करते हो चौकस दुगनी
तदोपरांत भी असफल रहे हो घुसपैठियों से

अच्छा कहो तो !
बचते हो फिर भी कितने दिन?
रहते हो कितने सुरक्षित ?

मरीचिका

मेरे ओंठ;
रेत से सूखे ओंठ
मीठे जल से भरे ओक बने
तुम्हारे लिए

तुम्हारी दो आंखों में मुझे
मीलों फैला मरुस्थल दिखता है
तुम मेरी आँखें देखो
मेरी आँखों मे तुम खुद को देखो

तुम इस झील में स्वयं को डूबता देखो।

परिकल्पना

सोचो !
तुमने मुझे सोचा और
मैं तुम्हारे समक्ष आ खड़ी हुई

तुम, सोच के
सच होने की कल्पना करो

तुम देखना;
मुझ तक आने के
सारे रास्ते
तुम्हारे पैरों मेंबिछ जाएंगे

तुम,अपना और मेरा मिलन देखना।

प्रभाव

तुम मेरा नाम पुकारो
हवाओं मे और देखो;
मैं कविताएं लिखती हूँ, कि नही

तुम उन्हें पढ़कर मुस्कुरा दो
और देखो;
कुछ फूल उगते हैं, कि नही

तुम अकेले में हंसकर,
मेरी तस्वीर छूकर,
कह दो – पागल !

तुम आंखे मूंदो
और देखो;
मैं तुम्हारे अँकवार में हूँ कि नही!

राखी सिंह अपनी कविता के जरिए मन और प्रेम के बड़े ही अनछुए पहलुओं को सामने लाती हैं। राखी पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए हैं। वे शिक्षण कार्य से जुड़ी हैं और पटना में ही रहती हैं।


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