प्रतिमा सिंहः ‘वो लड़का मेरा प्रेमी नहीं’ तथा अन्य प्रेम कविताएं

Pratima Singh

प्रतिमा सिंह

वो लड़का मेरा प्रेमी नहीं

वो लड़का मेरा प्रेमी नही है,
जिसे मेरे समर्पण की जरूरत है
वो मेरा दोस्त भी नही है
जिसके लिए जरूरी हूँ मैं हाथो की तरह
न भाई है
जिसकी जिम्मेदारी हूँ मैं..

फिर भी जब भी मिलता है
मेरी झुकी हुई नज़रें उठा देता है
ठुड्डी पकड़ कर,
मेरे विश्वास के कंधे सीधे कर देता है
चुरा लेता है मेरा डर चुपके से

मेरे नकली पँखों में उड़ान की
ख्वाहिश भर देता है
कदमों को रास्ते की मुश्किलें नही
चलने के हुनर दिखाता है

वो पहला और शायद आख़िरी लड़का है
जो मुझसे दायरों के पार मिला है
मुझे मजबूर करता है सोच अपनाने को नही
किसी भी सोच पे खुद की सोच बनाने को…

वो मुझमें सब कुछ मुझ-सा चाहता है
कहने को कोई नाम नही इस रिश्ते का
एक आज़ाद रिश्ता जो बस ख्वाहिशो में जीता है
लेकिन कोई भी रिश्ता जो किसी का हो

यकीनन ऐसा होना चाहिए

प्रेमिका से मां

जिस क्षण
मेरी गर्दन के ठीक नीचे,
लिपटे चेहरे पे
सोई तुम्हारी आँखों से,
कुछ कतरे उदासी के,
मेरी आँखों मे आ गिरे

बस उसी क्षण,
मैं प्रेमिका से मां हुई,
और ये मेरे प्रेम का प्रारब्ध है,
जो बस मेरा है।

पुकारना

वो संजीदा होता था,
सिर्फ तभी मेरे नाम से पुकारता था मुझे

मैं वक्त के होठों पे
झट से उंगलियां रख देती थी
अपने नाम से इतनी बेचैनी फिर कभी नहीं हुई…

बचपन से साहित्य में दिलचस्पी ने प्रतिमा सिंह को एक संवेदनशील रचनाकार बना दिया। वे अर्थशास्त्र से एमए हैं और फैजाबाद में रहती हैं। कफस नाम के फेसबुक पेज पर उनकी कविताएँ पढ़ी जा सकती हैं।


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