औरत की जिजीविषाः मेधा की कुछ कविताएं


प्रस्तुत है मेधा की कविताएं। मेधा सत्यवती महाविद्यालय ( सान्ध्य) में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। साहित्य- संगीत, पत्रकारिता, जन आन्दोलन, आत्म-अन्वेषण उनके जीवन और सक्रियता के कुछ महत्वपूर्ण आयाम हैं।

मेधा देश की महत्पूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न समाजिक विषयों पर निरन्तर लेखन करती रही हैं। कॅरियर के आरंभ में वे हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के अखबार हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण में कार्यरत रहीं। उन्होंने वैकल्पिक राजनीति की सामयिक पत्रिका सामयिक वार्ता का भी सम्पादन किया है। कुछ समय तक श्री औरोबिंदो सेंटर फ़ॉर आर्ट्स एण्ड कम्यूनिकेशन में हिन्दी पत्रकारिता पाठ्यक्रम के पाठ्यक्रम निदेशक के बतौर कार्यरत रहीं।

कविता उनका पहला प्यार है। ‘भक्ति आन्दोलन और स्त्री विमर्श’ तथा ‘आधुनिकता और आधुनिक काव्य- विमर्श’ दो आलोचना पुस्तकें प्रकाशित।

औरत की जिजीविषा

यह सारी दुनिया
और
दुनिया की सभी
पुरुषवादी सत्ताएं
लगा दें
अपनी तमाम जीवन -शक्ति
मुझे उखाड़ने में .

फिर भी मैं
रहूंगी पनपती
बार-बार उगती
रहूंगी, मैं
कि जब तक है, सृष्टि
तब तक
जितनी बार तुम मारोगे
उतनी ही बार
पहले से दोगुनी ताकत से
धरती पर पैर जमाकर
होती रहूंगी, मैं खड़ी .

क्योंकि जब-जब
तुम करते हो, आक्रमण
तब-तब मैं
जाती हूँ, भर
नए अदम्य उत्साह से .

और तुम तो
अपनी ताकत के अहंकार में
यह भी गए हो भूल
कि
अदम्य-उत्साह की ताबीज
है, जिसके पास
जिसने ओढ़ रखी है
समूची धरती की आस
उसे भला कौन
कर सकेगा
परास्त .


चाँद की मटकी

चाँद की मटकी
माथे पर रख
एक रोज
निकल पडूँगी मैं
आसमान की अनंत
यात्रा पर।

और उस घड़ी
तुम्हारे रोकने से
भी रुक न सकूंगी
कि मेरे भीतर
मैं ही नहीं
उर्मिला, यशोधरा और रत्ना
भी रहती हैं।

और इन सब की
अधूरी यात्राएं
पूरी होने को
मचल रहीं हैं
मेरे भीतर।

यह भी
जानती हूँ, मैं कि
तुम्हारे भीतर
न तो सीता जितना
समर्पण है
न ही प्यार।

सावित्री सा साहस
भी कहां है, तुममें
कि तुम साथ हो
लो, अनंत की मेरी
इस यात्रा में।

और सच तो यह है कि
अकेले ही निकलना चाहो
तो, वह भी कहाँ है
तुम्हारे वश में
कि
अब तक तुमने
बनायी नहीं
वह सीढ़ी –
जिसे चढ़कर
आसमां तक पहुंचते हैं।

हम स्त्रियों को

यदि इस दुनिया को
होना है, सुंदर और सुंदर
खिलती रहनी है
दूधियाचांदनी धरती पर
हर ओर
घुलते रहना है
प्रेम का गहरा रंग
तो
हम स्त्रियों को
करना होगा, स्वयं से प्यार
रोम-रोम में बसे
पुराने दर्द को
सहलाना ही होगा.

अपनी बेकरारी को
देना होगा करार-
स्वयं को अपनी ही
बाहों में भरकर
सुननी होगी अपनी ही
भूख की आवाज
सीखना ही होगा
अपने लिये जीना


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