‘मैं रात के दस मिनट की मलिका हूँ’ : पढ़िए जया जादवानी की पांच कविताएं

जया जादवानी

जया जादवानी की कविताएं अपनी भाषा और मुहावरे की वजह से हिंदी कविता के परिदृश्य में एक अलग स्थान रखती हैं। वे हिंदी और मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर हैं और यायावरी, दर्शन तथा मनोविज्ञान में विशेष रूचि रही है। उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं, ‘मैं शब्द हूँ’, ‘अनंत संभावनाओं के बाद भी’ और ‘उठाता है कोई एक मुठ्ठी ऐश्वर्य’। प्रमुख कहानी संग्रह हैं, ‘मुझे ही होना है बार –बार’, ‘अन्दर के पानियों में कोई सपना कांपता है’ तथा ‘उससे पूछो’। इसके अलावा ‘तत्वमसि’ उनका काफी चर्चित उपन्यास रहा है। अनेक रचनाओं का अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, उड़िया, सिन्धी, मराठी, बंगाली भाषाओँ में अनुवाद।

1.

दस मिनट

मैं रात के दस मिनट की मलिका हूँ
जब तुम गिडगिडाते हो मेरे सामने
और मैं दया करती हूँ तुम पर
यह दस मिनट का जुगनू
सुबह तक मर जाता है मेरी मुट्ठी में

मेरे घर के पिछवाड़े

2.

छोटी सी चाह

बहुत छोटी सी चाह थी
बहुत आहिस्ता-आहिस्ता
डग-डग धरती नापने की
तुम्हारे साथ

फेनिल लहरों पर
बाढ़ से बहते तुम्हारे शब्दों के सम्मुख
टिके रहना देर तक
और थाम लेना ऊँगली तुम्हारी

लड़खड़ाते ही कई बार
तुम्हारे ज्ञान की विषम ऊँचाइयों के सम्मुख

बने रहना

गीली घास सा क़दमों तले
कि ज्ञान को भी एक दिन
झुक के छूनी पड़ती है धरती
बने रहना चांदनी की चूनर सा

उन अँधेरी सुरंगों में
जिन पर लगातार चलते ठोकरें खाईं न जाने कितनी
फूट पड़ती हैं वहां से एकाएक
कोई रौशनी सी
और जब तक दिखे कुछ भी
खो जाती चुंधियाती आँखों के भीतर

बहुत छोटी सी चाह थी
जिसे समय अंतराल ने बड़ा बना दिया.

3.

मेरा रोना

वे मेरी कलम पर चढ़ कर बैठ गए और
वह-वह लिखवाया जो वे चाहते थे
सबसे पहले उन्होंने पढ़ाया पाठ
देह का
और तरीके समझाए वही
जिससे थे वे ही अवगत

फिर समझाई रिश्तों की परिभाषा
देह जिससे जुड़ी अनिवार्यतः

फिर बताया भूखों की किस्मों के बारे में
उन्हें मिटाने के उन उपायों को
जिन्हें वे ही आजमाते थे

ले गए मुझे पशुओं के बाड़े में
दिखाया पलते-कटते-पकते-खाते और खिलाते
और समझाए नियम
सिखाई तरकीब
रटवा दिए सारे शास्त्र और परिभाषाएं मुहरबंद

उन्होंने सिखाए परिवार चलाने के तरीके
संसार चलाने के रखे खुद तक महफ़ूज़

उन्होंने यात्राएं कीं हमारे जिस्मों की
रौंदा ….. रौंदा …… और रौंदा ….
जब नहीं पहुँच पाए वहां, कहा
सुरंग तेरी आत्मा की किस चाबी से खुलती है
मुझे हंसी आ गई

तब से दोस्तों मैं हँसे जा रही हूँ
क्या आपको मेरा रोना सुनाई दे रहा है?

4.

दिमाग ख़राब औरतें

‘दिमाग ख़राब है क्या ?’
‘दिमाग ख़राब है क्या ?’

कान झर गए हैं उनके सुनते-सुनते
शब्द अंततः शोर में बदल खो चुके अर्थ अपना

यही औरतें जाती हैं ऑफिस
अपने सुबह के काम ताबड़तोड़ निपटाते
जींस, कोट और टाई पहन
काला चश्मा दिखने नहीं देता नम आँखें
खटखट जूतों से कुचल देती हैं भीतर का बहुत कुछ

शाम को लौटती थकी-हारी लादे
सब्जियों के पैकेट दवाएं ससुर की
देर रात बच्चों के होमवर्क और रसोई में खटते
कनखियों से देख लेतीं बाकियों का जीवन

कितनी खुशनसीब हैं ये औरतें
जिनके दिमाग ख़राब नहीं हैं
खुश हैं जो मिल जाता है
बाकी रद्दी के भाव तुल जाता है

मुहर हैं ये परिवार के सीलबंद पैकेट पर
भीतर दफ्न कचरे से सांस घुटती है कभी-कभी

पर लोग क्या कहेंगे का टैटू छाती पर खुदवाए
कुछ और होने के सपने को
कोख में ही मार देती हैं
और देखकर रक्त राहत की सांस लेती हैं
महलों जैसे घरों में दिन भर जुगाली करती

कभी छोड़ दी जाती हैं गायों सी
शॉपिंग माल की हरी-भरी घास कुतरने को
गधों को घोड़ों की तरह दौड़ातीं
हंस के दुलत्ती भी खा लेती हैं.

थकी-हारी लेटती हैं जब दिमाग ख़राब औरतें
जांचता है पति गौर से तो वे मन ही मन हंसती हैं

वे आसानी से रोती नहीं
पर उन्हें अच्छा लगता है जब कोई आंसू पोंछ देता है

वे झटपट उतार देती हैं सूत सी पतली
लहूलुहान देह

प्रेयसी सी दिखतीं पत्नीत्व निभाने को अभिशप्त
सपने टूट जाने की आशंका से आतंकित
कभी-कभी वे असहाय डायन सी दिखाई देती हैं
जो हंसती-रोती एकाकी अपना मांस खुद खाती है

समय स्तब्ध है उनके दुस्साहस पर
और वे भूत से भविष्य छुड़ा भाग रहीं सरपट

दिन-महीने-बरस-युग गुज़ारते
बदल रही हैं अपना आसपास
कहीं बदल न दें समूचा संसार
लोग दिमाग ख़राब औरतों से डरने लगे हैं.

5.

अकेली

कितने सारे पहाड़
कितनी सारी नदियाँ
कितनी सारी सदियाँ
और एक प्रेम

कितने सारे व्यक्ति
कितने समाज
कितने धर्म
और एक प्रेम

आसमान कितने सारे
कितनी सारी धरती
आकाशगंगाएं कितनी सारी

और एक प्रेम
समुद्र कितने सारे
कितनी सारी प्यास

सीपें कितनी सारी
एक मोती प्रेम

कितने सारे तुम
एक अकेली मैं