दिव्यांशी सुमराव : ‘अम्मा नहीं जानती’ तथा अन्य कविताएँ

Divyanshi Sumrao

दिव्यांशी सुमराव

डायन

कुत्ते के रोने की आवाज़ों से वो नहीं जगते,
उसकी चार इंच की हील जो आवाज़ें
करती है,
टक-टक, टक-टक, टक-टक
हिला देती है उनके घरों की खिड़कियाँ
आधी रात में।

अडवांस्ड फ्रेम्स जो weather-resistant होते हैं,
औरत-रेसिस्टेंट नहीं होते।

अमेज़ॉन से मँगवाये हुए पर्दे भी हिलने लगते हैं
बिना अंधड़ के,
जब वो ठिकाने लगाती है
आधी रात के अँधेरों को
आँखों के गहरे गड्डों में कहीं
जहाँ सुबह लगाए काजल की
आख़िरी निशानियाँ दम तोड़ती हैं।

वो अपनी चाबी से घर का दरवाज़ा खोलती है
जिसे बैग उल्टा कर बमुश्किल ढूँढा था
दो मिनट की जद्दोजहद के बाद।
लाल कंघी के दाँतो में उलझा रहा था वो चाबी का गुच्छा
कई दिनों तक,
इसलिए रिहाई के वक़्त ख़ुशी से चिल्लाता है।

वो उसकी चीख भी सुनते हैं
खिड़कियाँ खोल दी जाती हैं
बेचैनी सहन नहीं होती,
एक साया चमकता है,
फिर दो,
कंक्रीट की सड़क पर दो साये बातें करते हैं,
दोनों फिर गायब।

तीसरा मौन रहता है, फिर ग़ायब हो जाता है
ताला तंत्र से खुलता है।

वो 2 हफ़्ते बाद घर में घुसती है
दरवाज़ा बंद करती है, और सो जाती है।

सुबह कूड़ेवाले से सुनती है –
मैडम, आप तंतर वंतर जानती हो क्या,
आपको पड़ोसी ‘डायन’ कहते हैं।

वो कुछ नहीं कहती,
अपनी सलवार ऊपर खींच कर
अपने टेढ़े पैर दिखाती है।

कूड़ेवाला चला जाता है, बिना कुछ कहे।
और सामने खुली खिडकियों से झाँक रही,
औरतें भी,
खाना बनाने रसोई मे।

रसोई घर की खिड़की सड़क की तरफ़ नहीं खुलती,
पर ‘डायन’ देख लेती है
दीवारों के आर पार भी।

**

ज़िन्दा

मैं उस तबक़े से आती हूँ,
जिन्हें कुरेदा जाता है नाखूनों से,
और काटा जाता है दाँतो से!
इसलिए नहीं हूँ मैं वाकिफ़,
छुअन के किसी भी खूबसूरत एहसास से!

मेरे ज़ेहन में रेंगती हैं बस कुछ तारीखें,
जिनमें सँभाले रखती हूँ
मैं अपनी हर चीख को,
ताकि हर रात सोने से पहले
जब नींद मुझे मरने से ज़्यादा
ज़िन्दा होने का एहसास कराए
तो छोड़ दूँ उन नंगी चीखों को खुला
और भगा दूँ नींद को कोसों दूर ख़ुद से!

मर जाने की तमाम कोशिशों में,
फिलहाल यही कारगार है!

**

अम्मा नहीं जानती

अम्मा नहीं जानती
भूगोल के रहस्य,
ग्रहों की सतह
खुरदुरी होगी या निगलती होगी
इंसानों का जिस्म,
उसे नहीं मालूम।
विज्ञान का शुक्रिया अदा
वो बस तब करती है
जब उसे नहीं धोने पड़ते
हमारे हफ़्ते भर के गंदे कपड़ें
अपने बूढ़े हाथों से।

उसे नहीं मालूम
भाषा की बारीकियाँ,
शब्दों और भ्रमों में अंतर
तीलियों का सच,
आग की लपटें
रोटियाँ पका देती हैं
जैसी पिताजी को पसंद है
इसलिए आग से दोस्ती गाँठे हैं,
पसीने की छुहन को
माथे की लकीरों में छुपाए।

अम्मा को कुछ भी तो नहीं मालूम
सिवाय इसके कि
उसके एक दिन देर से उठने से
बाबा की दवाई छूट जाएगी,
और बच्चों का खाना।

सन 1995 में जिला अमरोहा में जन्मी दिव्यांशी, 13 साल की आयु से ही कविता-कहानियाँ लिखने लगीं।  2017 में  दिल्ली विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में स्नातक। दिल्ली की एक निजी मार्केटिंग कंपनी में डिजिटल मीडिया लेखक के तौर पर कार्रयत हैं।  कविता को आज़ादी का पर्याय मानने वाली दिव्यांशी,मुख्यतः हिंदुस्तानी भाषा में लिखती हैं। स्पोकन वर्ड पोएट्री में भी गहरा रुझान है।  2 वर्षों में करीब 100 से ज़्यादा काव्य पाठ कार्यक्रमों का हिस्सा रह चुकी हैं। यूट्यूब पर कुछ चुनिंदा कविताओं के वीडियो।


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