दीपाली अग्रवाल की ‘औरत’ तथा अन्य कविताएं

Poems by Deepali Aggarwal

दीपाली अग्रवाल

औरत

ग़ज़लों में किसी शायर के अशआर के लिए
काव्य के रसों में श्रृंगार के लिए
तू नहीं है,
तू नहीं है फ़कत जिस्म बाज़ार के लिए
कि लड़ना है तुझे अपनी आवाज़ के लिए
हिस्सा नहीं किस्सों का उनवान है तू
तमाम जानें हैं जिससे वो जान है तू
रिश्तों की जिल्द है दीवान है तू

तेरे ख़याल तेरे हैं
उनका कानून है, संविधान है तू
तेरे इन्हीं ख़याल और अरमान के लिए
कि लड़ना है तुझे अपने आसमान के लिए

दृश्य

जीवन के एक हिस्से में जहां संसार
संभवतः फिर किसी युद्ध की तैयारी में है,

वैश्विक नफ़रतों के व्यापार फल फूल रहे हैं,
धर्म की चटाई पर जुए की बिसातें बिछी हैं,
और चेहरे पर लगे मुखौटे अब स्थाई हो गए हैं,

वहां कतिपय ही दृश्य मासूम बाकी हैं
जैसे सुखद है आदम के बच्चों का पहला क्रंदन,
किसान के बंजर चेहरे पर हंसी की खेती,
प्रेमी के द्वारा कपाल पर दिया पहला चुम्बन,
ईश्वर के दरवाज़े पर की गई प्रार्थना कि
‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया’

कितना सुखद है भोर के एक प्रहर में
बस्ता टांगे आज को भविष्य की ओर जाते देखना

कतिपय ही दृश्य मासूम बाकी हैं वहां
जहां संसार फिर किसी युद्ध की तैयारी में है

प्रेम कविताएं

सदी के उन दिनों जब तमाम विचारधाराएं
करेंगी आपस में टंकार
समाज के बुद्धिजीवी करेंगे बहस
निकालेंगे निष्कर्ष
खोजेंगे दिशा
समाज की बेहतरी के लिए

सदी के उन चिंतनशील दिनों में भी
मैं लिखूंगी प्रेम कविताएं
चूंकि सभी पड़ावों और
दिशाओं के अंत में भी
प्रेम रह जाएगा अपरिहार्य

दीपाली अग्रवाल, मथुरा निवासी। अमर उजाला के काव्य सेक्शन में कार्यरत हैं। साहित्य और कविताओं में विशेष रूचि। दीपाली के अनुसार कविताएं किसी भी युग में क्रांति और बदलाव की सबसे बड़े गवाह भी हैं और कारण भी।


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