दीपक जायसवाल की कविताएं : ‘जन्म और मृत्यु’ और ‘हम अपने घोसलों में चांद रखते हैं’

Deepak Jaiswal

युवा कवि दीपक जायसवाल की कविताएं। उनका परिचय उन्हीं के शब्दों में जानते हैं, “भारत और दुनिया के सबसे प्राचीन गणराज्यों में से एक मल्ल महाजनपद (कुशीनगर) जहाँ बुद्ध अपने आखिरी दिनों में पहुँचे और जहाँ उनका महापरिनिर्वाण भी हुआ; के एक छोटे से गाँव सोहरौना में पैदा हुआ हूँ जहाँ से हिमालय की श्रृंखलाएं दिखती हैं जबकी एक ज़माने में महासागर की लहरें उठती थीं। शुरुआती पढ़ाई गाँव में हुई फिर आगे की पढ़ाई के लिए घर वालों ने दिल्ली भेज दिए। फिर ग्रेजुएशन (गोल्ड मेडलिस्ट) दिल्ली विश्वविद्यालय से किया और पोस्ट ग्रेजुएशन (गोल्ड मेडलिस्ट) और पीएचडी भी। हाल-फ़िलहाल सरकारी नौकर हूं कानपुर में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर सेवाएं दे रहा हूं। कहानी-वहानी, कविता-सविता लगातार पढ़ते हुए जीने की इच्छा है और रेणु की ‘तीसरी कसम’ की दुनिया के यूटोपिया को खुद के लिए गढ़ रखा है गाड़ीवान ‘हीरामन’ बनकर जिसे खींचे जा रहा हूँ…।”

1.

जन्म और मृत्यु

हम हर वक्त रिसते रहते हैं
जैसे रिसता है रक्त
जैसे रिसती है नदी
जैसे रिसता है रेत

हमारे भीतर हर वक्त
कुछ भरता रहता है
जैसे भरता है समुन्दर
जैसे भरता है घाव
जैसे आँखों में भरता है आँसू
जैसे बादल में भरता हो पानी
जैसे फसलें भरती हो दाने
जैसे ट्रेन भरती है पैसेंजर

हाँ यह सच है
हम वक्त के साथ पीले होते जायेंगे
जैसे हर पतझर में हो जाते हैं पत्ते
हम डबडबाई आँखो से बह जायेंगे
जैसे बहता है आँसू
हमें पकने के बाद
काट लिए जाएंगे
और ट्रेन हमें न चाहते हुए भी उतार देगी
अगले यात्रियों के लिए….

लेकिन जन्म और मृत्यु
के बीच जो जीवन है
उसे हम भले जीत न सकते हों
पर जी सकते हैं…

2.

हम अपने घोंसलों में चाँद रखते हैं

चाँद हर बार सफ़ेद नहीं दिखता
उनींदी आँखों से बहुत बार वह लाल दिखता है
मेरे दादा जब बहुत देर रात धान काटकर आते
उनका हँसिया चाँद की तरह दिखता।

बहुत बार दादा का पेट इतना पिचका होता कि
उनकी दोनों तरफ़ की पसलियाँ
चाँद की तरह दिखतीं।

मेरी माँ की लोरियों में चाँद
अक्सर रोटी के पीछे-पीछे आता
और बहुत बार आधी पड़ी रोटी
चाँद की तरह दिखती।

ठीक-ठीक याद नहीं शायद
मेरे दादा जैसे-जैसे बूढ़े होते गए
उनकी कमर चाँद की तरफ़ नहीं
जमीन की तरफ़ झुक आई
लेकिन अर्थी पर सोए दादा
हुबहू चाँद की तरह दिखे।

लोग कहते हैं उस रोज़
सारे खेतों में धान की बालियाँ
उनके दुःख और सम्मान में
थोड़ी-थोड़ी-सी आसमान की तरफ़ नहीं
ज़मीन की ओर झुक आईं।