अर्चना कृष्ण पाण्डेय की ‘गोधुलि का प्रेम’ और अन्य कविताएँ

अर्चना कृष्ण पाण्डेय

अर्चना कृष्ण पाण्डेय कविताएं की परंपरागत भाषा और प्रतिमानों से आज के समय के सत्य को टटोलने का प्रयास करती हैं।  अर्चना पेशे से मनीषी बालिका इंटर कालेज गौरीगंज, अमेठी की प्राचार्या हैं। उन्हें लेखन के लिए सावित्रीबाई फुले अवार्ड, आंचलिक साहित्यकार, काव्य स्यंदन, साहित्य रत्न आदि से सम्मानित किया जा चुका है। प्रस्तुत है उनकी तीन कविताएं।

प्रेम और वो

उसे
प्रेम; बेड़ियाँ नजर आती थीं
बेड़ियों से डरता था वो
उसे बेड़ियां नहीं,
किसी आगोश का एक
ढीला कसाव चाहिए था
जिसे जब चाहे, तोड़कर
आजाद हो सके।

उसे
प्रेम; शीतल जल का
सरोवर लगता था,
जिसमें डूबना
नहीं चाहता था वो
किनारे अठखेलियां कर
अपने शरीर का ताप
मिटाना चाहता था वो

उसे
प्रेम; किसी खाली नकारा
ह्रदय की उपज लगता था
कामयाबियों के
पथ पर बढ़ता
बुलंदियों के शिखर का
अन्वेषी था वो

उसे
प्रेम; किसी टीवी का
रिमोट लगता था
जिससे स्वमन:स्थिति अनुसार
कभी गीत, संगीत
तो कभी शोक गीत
बजाना चाहता था वो

उसे
प्रेम; किसी साझा संग्रह
सा लगता था,
उस संग्रह में
अनगिनत कवियों
की रचनाएं
लिखाना चाहता था वो

“वो प्रेम का उपासक तो था
पर साधना उसकी आदत न थी”

और मुझे वो
मेरी कविता की
पृष्ठभूमि लगता था
हमेशा आके
एक कविता देके
चला जाता था ‘वो’

गोधूलि का प्रेम

आज अरसे बाद
मैंने फिर तुम्हें देखा
आज फिर
तुम मुझे भायी वैसे ही
जैसे हो कोई
सरल रेखा

तुम्हारी आँखों में
आज फिर, पढ़ा मैंने
पूछे गए, अतीत के
उन प्रश्नों को
जब पूछा था तुमने
“उम्र की उस दहलीज पर
क्या लिखोगे फिर कोई कविता
यूँ ही देख के मुझे”?

हाँ, मैं लिखता हूँ
परन्तु;
अब मैं
तुम्हारी आँखों को
झील सी गहरी नहीं लिखता
अब मैं उन्हें
प्रज्ज्वलित,
दो दीपक लिखता हूँ
जले हैं जो-
किसी की प्रतीक्षा में
अनवरत, अहर्निश

हाँ, मैं लिखता हूँ
आज फिर, कि-
तुम्हारे चंचल,
अल्हड़पन की जगह
सौम्यता, शालीनता
और गम्भीरता ने-
दस्तक दे दी है
तुम्हारी रेशमी अलकें,
जो उस वृक्ष की-
जड़ों के समान
उलझी हैं
सुनाती हैं
तुम्हारे त्याग और-
शुचिता की
अनकही,
अनगिनत कहानियाँ

हाँ , मैं लिखता हूँ
वो काया जो
किसी कली की भाँति
सकुची, शरमाई रहती थी
तप रही है आज
किसी तपस्विनी के
ऊर्जा के ताप सी

हे देवी!
आज सान्ध्य की
इस बेला में
तुम्हारा चिर उपासक
तुम्हें समर्पण करता है
अपनी सम्पूर्ण
आराधना, वंदना और अर्चना

बोलो..
क्या स्वीकार करोगी..?
आज फिर मेरे इस
“गोधूलि के प्रेम को”

खामोश रिश्ते

हाँ
मुझे अच्छे लगते हैं
खामोश रिश्ते
कुछ ऐसे रिश्ते
जो नि:शब्द हों
निर्विवाद हों
परन्तु
शुचिता का
शंखनाद हों
बिन पराग के
कुछ महके महके से लगते हैं

हाँ
मुझे बेहद अच्छे लगते हैं
कुछ ऐसे रिश्ते
जो भावनाओं में
उलझे हों
मन और बुद्धि से
अनसुलझे हों
कुछ ऐसे
जिसमें अपनेपन
की मिठास हो
सबमें रहके भी
सबसे खास हो
उनमें बँध के भी
स्वतंत्रता का
आभास हो

हाँ
मुझे बेहद प्यारे लगते हैं
ऐसे रिश्ते
जिनमें सागर सी
गहराई हो
आम्रमंजरी की सी
पुरवाई हो
बस शीतल और
सुखदायी हो

हाँ
मुझे बेहद आकर्षक लगते हैं
ऐसे रिश्ते
जिसमें
मीरा सा राग हो
राधा सा त्याग हो
शबरी सी प्रतीक्षा हो
न वासना की इच्छा हो

हाँ
मुझे
सत् शिव सुंदर लगते हैं
ऐसे रिश्ते
हाँ मुझे अच्छे लगते हैं
‘खामोश रिश्ते’