अपर्णा अनेकवर्णा की ‘प्रार्थना में’ तथा अन्य कविताएं

Aparna Anekverna

प्रार्थना में

कौन है भला ऊपर वहाँ?
जो सुन रहा है
प्रार्थनाएँ
अजब ढंग से बात
उस तक पहुँचती रही है
कभी कहने के बहुत बहुत बाद
कभी सोचने से भी पहले

कौन है?
जिसे ख़याल रहता है
घटनाओं को कैसे गड्ड-मड्ड कर देना है
कि सब अंत में सही ही लगे
कमाल की बात है न!

कुछ भी और करने में जब असमर्थ पाती हूँ ख़ुद को
तो प्रार्थना करने लगती हूँ
ज़रूरतमंद मन ही प्रार्थनारत होता है
एक व्यसन बनती जाती है प्रार्थना
सोते जागते.. मुझसे फूट, बहती रहती है

‘प्रार्थना ईश्वर को नहीं बदलती
वो मुझे बदल देती है’

(inspired by ‘Shadowlands’)

देख लेना

महत्वाकांक्षा की पहाड़ियाँ
चोटी पे खड़ी
यदि एक कदम… आँखें मूँद
विश्वास का उठाऊँ
पता है उड़ने लगूंगी
देख लेना
बिलकुल नहीं गिरूंगी

मार्क्वेज़ की रेमेडिओस की तरह
उठती जाऊँगी एक दोपहर
ठीक चार बजे
ऊंचाइयों में विलीन हो जाने के लिए
नीचे सिर्फ मेरी तह की गयी
सफ़ेद चद्दरें रह जाएँगी

शव-विहीन कफ़न सारी की सारी

अभी-अभी

उसने अभी-अभी
पार कर लिया है
जीते रहने का तरल
सूख रही है अब
अंतिम सी किसी शाखा पर
किसी अभी-अभी बिछड़ने वाली
पत्ती की तरह

अपर्णा अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर हैं। गोरखपुर पली-बढ़ी हैं। कुछ समय तक दिल्ली में पत्रकारिता के बाद अब निरंतर हिन्दी में लेखन तथा अनुवाद कार्य।


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