पूर्णिमा अरुण की कविता ‘छुपी रूस्तम हूँ मैं’


पूर्णिमा अरुण

एक दिन की
बात नहीं सखी
हर दिन
मेरा है
घर की धूरी हूँ मैं
बच्चों की किलकारी
पिया की संगनी हूँ मैं
परिवार की प्यारी

कोई दिन ऐसा नहीं
जो मेरे बिना बीता हो
कोई काम ऐसा नहीं
जो मेरे बिना हुआ हो

घर का चौका चूल्हा हो
या बाहर की जिम्मेदारी
बच्चों की पढ़ाई हो
या बड़े-बूढ़ों की तिमारदारी

सब मेरे दम पर है
ऐसा अहम् नहीं
लेकिन मेरे बिना
ये सम्भव भी नहीं

इसलिए
हर जगह
हर पल
मौजूद हूँ मैं
दिखती भले ही न हूँ
कि
छुपी रूस्तम हूँ मैं

पूर्णिमा अरुण


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