सोनिया बहुखंडी की कविता ‘ब्रेस्ट कैंसर’

A poem on breast cancer

सोनिया बहुखंडी गौड़

ब्रेस्ट कैंसर

पृथ्वी सी चंचल मेरी देह में
उसे पसंद थी मेरी दोनों धुरियां
ये धुरियां जिंदगी में डूब कर
ऋतुएं बना रही थी

वो अक्सर खो जाता था ठंडी-गर्म
ऋतुओं के बीच,
और देखता था वहां से निकलती दूध की नदियों को
जिसकी याद अब तक मेरे बच्चे के होंठो पर है

ऋतुएं डूबती रहीं परिवर्तन की गर्म बाल्टी में
उभर आई धुरियों में दो पॉपकॉर्न सी गांठे
पृथ्वी सुन्न!
जड़ से काट दी गई गांठों वाली धुरियां
छूट गया दूध की सूखी नदी का निशान
और एक सपाट मैदान

जब कोई कहता था पृथ्वी का अंत निकट है
वो उम्मीदों की हंसी घोलता है और कहता-
तुम दुनिया की सबसे सुन्दर गंजी औरत हो
दर्द की अनंत गुफाओं को पार कर मैं बाहर निकलती

क्योंकि पृथ्वी की गति बंद नहीं होती
वह सूर्य के चक्कर काटती रहती है
हाँ मौत सहम के जीवन के अंत में जरूर खड़ी हो जाती है
सूखी नदियों के निशान ताकते ताकते जीवन ठहर जाता है

मेरा बेटे के होंठो में खिल जाते हैं धुरियों की यादों के फूल
उसके मुस्कराने से मौसम बदल रहा है।

सोनिया बहुखंडी गौड़ का जन्म 21 अप्रैल, 1982 में हुआ था। उन्होंने जनसंपर्क एवं पत्रकारिता तथा प्राचीन इतिहास परास्नातक किया है। वे स्वतंत्र लेखन करती हैं और उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा ऑनलाइन ब्लॉग्स में प्रकाशित होती रहती हैं। आप soniyabgaur@gmail.com पर उनसे संपर्क कर सकते हैं।


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