महविश रिज़वी की कविता ‘बिगड़ी हुई लड़कियाँ’

Mahvish Razvi

महविश रिज़वी

कौन होती हैं ये बिगड़ी हुई लड़कियाँ?
नानी से पूछा तो कहा, “खुलकर हँसने वाली, ठहाका लगाने वाली”
भाई से पूछा तो बोला, “प्रेम करने वाली, प्रेमिका होने वाली”
माँ से पूछा तो बताया, “वो लड़की जो हमारी इच्छा के ऊपर अपनी ख़ुशी रखे”
बहन बोली, “उन दिनों पर भी खुलेआम बात करती हो, दीदी तुम तो बिगड़ी हुई हो”

समाज ने समझाया कि उनके मुताबिक़ न चलने वाली लड़कियां भी बिगड़ी हुई होती हैं
रिश्तेदार बोले, पच्चीस की उम्र में कुंवारी लड़की बिगड़ी हुई तो होती है
दफ्तर में एक वरिष्ठ मैडम बोल पड़ी, “घर से दूर रहकर अकेले नौकरी करने वाली होती हैं बिगड़ी हुई लड़कियाँ”

पिता ने कहा, “मेरे सामने चुन्नी नहीं लेती हो, बहुत बिगड़ी हुई हो”
चाचा ने कहा, “तुम मुझसे डरती नहीं हो कितनी बिगड़ गई हो”
मामा बोले, “ददिहाल वालों पर जान छिड़कती हो…
तुम कितनी बिगड़ी हुई हो”
पति ने बताया कि मेरी चाकरी करने से कतराती हो किस क़दर बिगड़ी हुई हो
सास भी बोली, “रसोई नहीं जानती बताओ भला! कैसी बिगड़ी लड़की हो”
नंद ने कहा, “मेरे भाई को प्रेमी बनाकर शादी की…
इसलिए बिगड़ी हुई तो हो”
ससुर ने भी बता दिया कि देर तक सोती हो यूं तो बिगड़ी हुई ही हो

मैंने सखी से भी पूछा तो वो बोली, “रात को निकल जाती हो सो बिगड़ी हुई हो”
मैंने फ़िर थकहार अंतरात्मा से भी पूछ लिया
वो बोली, “सच है कि बिगड़ी हुई हो तुम
मगर बनी हुई भी कभी हो सकती हो भला?”

सर्वोपरि और अंततः तो लड़की ही हो तुम…

महविश रज़वी यानी माही प्रोफेशन से तो जर्नलिस्ट हैं लेकिन उनकी एक और पहचान है। वे एक उभरती हुई रचनाकार हैं। हाल के दिनों में उनकी कुछ कहानियां चर्चित हुई हैं। सिनेमा पर उनका लेखन और फेसबुक पर समसामयिक मुद्दों पर टिप्पणियां भी उल्लेखनीय हैं।


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