चंद्रकला त्रिपाठी की कविता ‘बद्दुआएं हैं हैरान’

प्रवासी मजदूर
तस्वीर NDTV से साभार

चंद्रकला त्रिपाठी

सड़कें चाहने लगीं हैं कि वे इन दिनों मखमल हो जाएं
मौसम नम होना चाहते हैं
आग भस्म कर देना चाहती है प्रेम के सारे प्रदर्शन

पृथ्वी हिल रही है कि सही करवट जीना चाहती है
पत्थर शोक में हैं कि वे इतने पत्थर तो नहीं थे

मसखरे क़समें उठा रहे हैं कि उनके जुमले झूठे नहीं होते
बस नकाब खींचते रहे हैं

जानवर चाहते हैं कि वे भी कोई किताब लिखें इंसानों के बारे में
लिखें कि उनके लिए बेरहम होने का अर्थ इंसान होना हुआ जा रहा है

चीलें गिद्ध सियार सभी मरघटों पर इतनी बरक़त नहीं चाहते थे
इतना बड़ा नहीं है उनका पेट

माएं अब बांझ होना चाहती हैं

बद्दुआएं हैं कि हैरान हैं
वे सही जगह लगती ही नहीं