मोहिनी की कविता ‘ईश्वर’

A Poem by Mohini

मोहिनी

ईश्वर एक ऊबी हुई औरत है
जिसकी रातों की बातें
पति की नींद काट ले जाती है
उसका अभिशाप है कि सृष्टि में कभी कोई बात पूरी नहीं हुई

ऊबी हुई औरत रोज़ वही रोटियां बेलती जाती है
उगते रहते हैं चाँद और सूरज यूँ ही

ये ईश्वर नाम की जो औरत है
उसका बदन काला है
और उसे पसीना बहुत आता है
उसके श्रम में इतना प्यार है
कि बरसात की रात में प्रेमी
अभिव्यंजना से भर उठते हैं

ये ईश्वर नाम की बला
लड़ती बहुत है
गुस्से में पटकती है पैर
दिनों तक श्रृंगार नहीं करती
उसके सूखे हृदय में तब समा जाते हैं
कितने बीज
जो कभी अंकुरित नहीं होंगे।

ये ईश्वर औरत अब तक परेशान है
कि उसके अचार में स्वाद ठीक क्यों नहीं
कि उसने जो मांस पकाया
उसकी खुशबू क्यों बदली सी है
उसके खेत मे टमाटर अब ज़्यादा लाल और कम स्वादिष्ट क्यों है
क्यों उसकी गाय का दूध कम मीठा है

वो परेशान और लाचार ईश्वर
चिढ़ जाती है ईश्वर होने से
फिर बैठकर सोचती है कुछ
सोचते सोचते जमीन पर झाड़ू की सींक से रंगोली बना देती है
वो ईश्वर न हो तो और हो भी क्या
कहा न, ऊबी हुई है वो!

मुझे इस ईश्वर से इतना प्रेम है
कि उसके पति के सो जाने के बाद
मैं उसकी सहेली बनके बैठती हूँ
चूमती हूँ उसे वहाँ
जहाँ उसे कभी चूमा नहीं गया
वो हँस के मुझे कहती है
कि मैं उसका संसार हूँ

उसे क्या पता जिस संसार में मैं रहती हूँ
वहाँ उसके ईश्वरत्व का हो चुका है लिंग परिवर्तन
और हमारा प्रेम अब एक रंगीन संघर्ष है

मोहिनी। सामाजिक शोधकर्ता और कार्यकर्ता। मूलतः बिहार की निवासी, फिलहाल दिल्ली में रहती हैं और जल, जंगल, ज़मीन के मुद्दों पर तथा दलित आदिवासी अधिकारों पर काम कर रही हैं।


कोई जवाब दें