चैताली सिन्हा ‘अपराजिता’ की लंबी कविता ‘मरी हुई आत्माएं’

चैताली सिन्हा

चैताली सिन्हा ‘अपराजिता’

आत्माएं मर चुकी हैं
इंसान कहलानेवाले
बलात्कारियों की…!
जिसे नहीं है समझ
रिश्तों और भावनाओं की,
बच्चों और बूढों की;
अबोध और व्यस्क की,
जिनमें होता है बहुत अंतर
भावनाओं और विचारों के स्तर पर,
शरीर और मन के स्तर पर !

बलात्कारी की आत्मा
मर चुकी होती है
उस वक्त ;
जब वह उठा ले जाता है
एक अबोध बच्ची को
अपनी हवस मिटाने के लिए,
किसी सुनसान झाड़ी के पीछे,
कभी टूटे–फूटे कच्चे मकान में,
और…कभी
कभी खुद के घर में भी,
देने लगता है वह
इस घृणित कार्य को अंजाम…!

लेकिन उसकी हैवानियत
यहीं नहीं रूकता
इससे भी अधिक निर्मम होता है
उसका चेहरा;
जब वह कर दिया करता है
उस अबोध की हत्या,
कभी उसका दम घोंटकर
और कभी पत्थरों से,
कूच-कूचकर…!
मिटा देना चाहता है हर वो निशान
जिसे बनाया था बलात्कारी ने
उस अबोध की देह पर,
छुपा देना चाहता है अपनी कुंठाओं को,
ताकि वह (बच्चियां) पहचान न ले

बलात्कारी का यह भयानक चेहरा
बलात्कार के समय की उसकी
लाल होती आँखें;
जिसमें उतरा हुआ होता है
लाल-लाल रक्त की शिराएँ
कामाग्नि से बौखलाया हुआ
उसका शरीर,
जिसे देख रही होगी वह
बरबस यूँ ही लगातार,
टकटकी लगाये
ताकि मरने के बाद भी
उसकी आत्मा
याद रख सके;
इंसान से बने
उस हैवान की शक्ल को…!

आत्माएं,
जो कभी मरती नहीं
लेकिन इस कलियुग में
कुछ आत्माएं मर चुकी हैं
और मरी हुई आत्माएं
खुद से संवाद नहीं करतीं,
उन्हें अच्छे-बुरे का फ़र्क नहीं बतातीं
इसीलिए तो होते हैं
इनके जघन्य कार्य,
क्योंकि ये आत्माएं
मरी हुई आत्माएं होती हैं..!