डॉ. आनंद वर्धन की कविता ‘कंचनजंघा की बेटियाँ’

डॉ आनंद वर्धन की कविता

डॉ. आनंद वर्धन

ठिठुरती रात की
काली सियाही पोंछ
लंबे बालों वाली गोरी लड़कियाँ
आधी रात
टाइगर हिल पर जाने वाले रास्ते पर
खड़े होकर माँगती हैं
लिफ्ट,
अपने कंधे पर लटके झोलों में
बला की गरमाहट वाली काफी लिए।
उनके थर्मस में बंद रहती है
उगते सूरज की गर्मी।
कंचनजंघा की सुंदर चोटियों से
चमकते उनके दाँत
जीपों की रोशनी में हो जाते हैं
और चमकदार
जैसे चमकता है सूरज
उगते ही।
पारदर्शी रूप देख कंचनजंघा का
याद आते हैं विद्यापति
टपरूब अपरूब रूप।
जीपों के ड्राइवर
उनके अनचीन्हें दोस्त
जीप में भरी भीड़ दिखा कहते हैं
झुंडी आलो झुंडी
और वे
जरा सी धीमी होती जीप के पीछे
वैसे ही लटक जाती हैं
जैसे उनके कंधे पर
लटका हुआ थर्मस।

टाइगर हिल पर
थर्मस की काफी
बिकते न बिकते
उग आता है अलसाया सूरज
नए बिरवे सा।
लोगों की आँखें
बादलों, कोहरे
और सर्द हवाओं के साथ
खोजती हैं आसमान की खिड़की में
सूरज का पौधा
कंजनजंघा की पुत्रियाँ
उन्हें दिखाती हैं संकेत से
उधर देखो उधर,
सूरज उधर से उगता है।

लौट पड़ती हैं
कंचनजंघा की बेटियाँ
फिर से
अपने ठंड से गरमाते घरों में,
कंधे पर
खाली थर्मस
और सीने में बला की गरमी भरे
नए लोगों को
सूरज दिखाना है
कल सुबह उन्हें फिर।

बनारस में जन्मे डॉ. आनंद वर्धन हिंदी के सुपरचिति कवि हैं। ‘ललमुनिया घोंसला कहाँ बनाओगी’ तथा ‘ड्योढ़ी और उसके बाहर’ में उनकी कविताएं संकलित हैं। उनका कहानी संग्रह और आलोचना पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। वे बल्गारिया में रहते हैं।