पत्थर गली : ये कहानियाँ कहीं की भी हों… लगता है मेरे शहर की हैं

पत्थर गली

अनुजा

हिन्दी की महिला कथाकारों में कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी की पीढी के बाद जो नाम उभरे, नासिरा शर्मा उनमें अलग से पहचानी जाती हैं । कहानी के अलावा उपन्यास विधा में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। पत्थर गली उनकी कहानियों का एक महत्वपूर्ण संग्रह है, जिस पर अनुजा चर्चा कर रही हैं। अनुजा अध्यापन, पत्रकारिता तथा गैरसरकारी संस्थाओं के साथ स्त्री, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, ग्रामीण पत्रकारिता मुद्दों पर कार्य व प्रशिक्षण से जुड़ी रही हैं। वे पिछले तीन दशकों से अधिक समय से सृजनरत हैं।

नासिरा जी के लेखन से मेरी पहली मुलाक़ात हुई अब से कई बरस पहले ‘ख़ुदा की वापसी’ के साथ और फिर ‘औरत के लिए औरत’, ‘शाल्मली’…और अब ‘पत्थर गली’। स्त्री विमर्श की दृष्टि से नासिरा जी की कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जिन औरतों की संवेदनाओं को व्यक्त करने की कोशिश की है वह धर्म और सत्ता के बीच फँसी रहती है। इन कहानियों का दायरा बहुत व्यापक है। ये मुस्लिम समाज से उठकर तथाकथित सभ्य होती दुनिया के कोनों अतरों तक पहुँचती हैं।

‘पत्थर गली’ उनका दूसरा कहानी संग्रह है। प्रकाशन बरस 1986 है। यह वही 80 का दशक है जब देश दुनिया के स्तर पर व्यापक बदलाव आ रहे थे..! पुराने दौर को बिना समझाए, बिना तैयार किए, नया दौर दस्तक दे रहा था। दशक का यह बरस 90 के दशक से बहुत दूर नहीं था। इस समय इन बदलावों के साथ घुटन, आक्रोश, लालच और नासमझी की बहुत सी कहानियाँ लिखी जा रही थीं। नासिरा जी भी मुस्लिम समुदाय की ऐसी ज़िंदगियों पर से परदा उठा रही थीं। भूमिका में वे कहती हैं, “पत्थर गली नासमिझयों के अक्खड़ दौर से निकल कर आयी है। एक ऐसा दौर, जो अपनी पहचान खोने और नई पहचान को अपनाने के द्वंद्व के बीच फंसा हुआ था।” इस दौर के समाज के सामने, नई सदी, अपने को बचाए रखने की एक चुनौती के तौर पर आ रही थी। यही द्वंद्व बहुत मुखर होकर इन कहानियों में उतर आया है, कैनवास सबके एक हैं पर लकीरें उन्हें एक दूसरे से भिन्न करती हैं।

आज लगभग 20 बरस बाद भी दुनिया के किसी न किसी कोने में ये जी जा रही हैं। थोड़ी बहुत बदली स्थितियों के साथ वैसे ही….। वो ठीक कहती हैं, “ये कहानियाँ धरती पर बसे किसी भी इंसान की हो सकती हैं क्योंकि यह दर्द सर्वव्यापी है।”इस पूरी किताब को पढ़ते हुए, हर कहानी से गुज़रते हुए, लगातार ऐसा महसूस होता है कि यह आपके घर से कुछ दूरी पर बने कुछ घरों की कहानियाँ हैं… या इसके पात्र आपके साथ रोज़-ब-रोज़ मिलते-जुलते, बात करते रहते हैं। यह स्पष्ट होने लगता है कि घर किसी भी मज़हब या समुदाय का हो, मिट्टी का चूल्हा हर घर में है। जीवन के सारे रंग और समाज के सारे रूप हर समुदाय और वर्ग में हैं, खासकर तब, जब निर्भया, हाथरस और ऐसी ही अनेक जघन्य घटनाएँ आज भी हो रही हैं। जब हम तथाकथित रूप से सभ्यता के सबसे विकसित दौर में हैं, ये कहानियाँ प्रासंगिक हैं। इसलिए यह बातचीत केवल कहानियों पर बातचीत नहीं है… बल्कि इन कहानियों के बहाने ज़िंदगी पर बात है। ज़िंदगी को देखने समझने के हमारे नज़रिये पर बातचीत है।

मैं जब इसे पढ़ और सोच रही थी… कई बार अवसाद की स्थिति में पहुँचते-पहुँचते बची। इतना दुख रचना था जग में तो फिर मुझे नयन मत देता, मैंने कई बार गुनगुनाया । कई बार सोचा इसे छोड़ दूं, न करूं, इतनी तकलीफ क्यों सहना… पर फिर हिम्मत जुटाकर कर डाली। यह हिम्मत ही हर दौर में मनुष्य का साथ देती है… और यही इन कहानियों का स्वर भी है । इन कहानियों में वह सब कुछ है जिससे वह पूरा दौर गुज़रा है। बहुत ही साफ तौर पर वो सारी चीज़ें आँखों के सामने आती हैं, जिनसे समाज में ‘स्त्री और मजलूम’ का स्थान तय किया जाता है।

संग्रह में कुल 9 कहानियाँ हैं। सभी कहानियों का परिवेश मध्य व निम्नवर्गीय मुस्लिम परिवार है। हर कहानी की अपनी कथा है और अपने ही कोण। इनमें स्त्री जीवन की त्रासदी, उस पर बंद दरवाज़े, धनवान से निर्धन होते परिवारों की दारूण कथा, पारस्परिक शत्रुता के शिकार हुई निर्दोष ज़िंदगियाँ, अहंकार और ज़िद की भेंट चढ़ते प्रेमी युगल और ऐसे अन्य बहुत से पात्र, जो कहानियों के बाहर हर कहीं बिखरे हुए हैं। संग्रह की शुरूआत में ही नासिरा जी की बात “मुस्लिम समाज सिर्फ ग़ज़ल नहीं है बल्कि एक ऐसा मर्सिया है जो वह अपनी रूढ़िवादिता के सिरहाने पढ़ता है” गहन अर्थ समेटे हुए है । एक अफसोस सी लगती है यह पंक्ति… और बहुत सुंदर भी है।

इन कहानियों के पात्र किस शहर या देश के हैं, मुझे नहीं पता पर मुझे लगता है कि ये मेरे शहर के हैं। किसी कहानी में मुझे नज़ीराबाद की सड़क पर बना हाता दिखाई देता है, कोई कहानी चैक-चैपटियाँ की किसी गली के अंदर के किसी घर की है, कोई बाराबंकी के किसी गाँव की है और कोई कहानी… मौलवीगंज या गोलागंज की गलियों के भीतर से आती लगती है। कहीं ये दिल्ली के दरियागंज, चावड़ी बाज़ार, चाँदनी चैक से बोलती सी लगती हैं। ये कहानियाँ कहीं की भी हों… लगता है ये मेरे शहर की हैं।

पहले बात पत्थर गली पर। यह संग्रह की आठवीं कहानी है। नायिका फरीदा में आसमान को छूने की हसरतें हैं, कोशिशें हैं, संभावनाएं हैं, वह बदलते दौर की संधि रेखा है, उसके मुँह में बोल है, और यही उसका अपराध है…। वह एक संवेदनशील किशोरी है। बचपन से ही उसे घर, उसकी चारदीवारी और बंदिशों के बीच में घुटन सी महसूस होती है। वह उड़ना चाहती है पंछियों सी, प्रतिभाशाली है पर उसकी प्रतिभा के पैरों में रवायतों की जंज़ीर है और ताले की चाभी भाई के हाथ में… माँ की उपयोगिता बस पैसे देने में है। निर्णय लेने का हक़ केवल भाई को है। कहानी अन्य दृश्यों और घटनाओं के साथ ही फरीदा की झुंझलाहट और बेबसी के तार खोलती चलती है।

फरीदा अकेली नहीं है… उसके जैसी और भी लड़कियाँ हैं जो खानदान की झूठी मर्यादा और रवायतों के नाम पर खूँटे से बंधी बकरी भर रह गयी हैं..किसी भी दिन जिबह कर दी जाने वाली… जिनके घर में पिता हैं…वहाँ हालात थोड़े बेहतर हैं और जहाँ पिता का साया उठ गया है…वहाँ नाकारा भाइयों की तमाम बंदिशों और झूठी शान की शिकार हैं लड़कियाँ…। कुछ शादी कर शौहर का घर आबाद करती हैं, कोई प्रेमी के साथ घर छोड़कर चली जाती है… बीए तक पहुँचते कुल सहेलियों में से चार बचती हैं। फरीदा और उसकी सखियाँ अकेली नहीं हैं…यहां हर दूसरे घर में ऐसी लड़कियाँ मौजूद हैं… ऐसे भाई भी…अनकहे तौर पर जहाँ बेटे हैं… पिता के बाद वहाँ बेटियों का कोई अधिकार नहीं है…. उनके लिए कोई स्थान नहीं…स्थान चाहिए तो टम्र्स एण्ड कंडीशंस एप्लाइड…वाली लाइन, बिना कहे शामिल है।

बेटियाँ और दूसरी औरतें केवल सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए हैं… उनकी राय, इच्छा का कोई महत्व नहीं है… खानदानी मर्यादाओं और शान के नाम पर बेटे जो चाहें, वह करने और कहने को आज़ाद हैं, चाहे वो ज़िम्मेदार हैं या नहीं है…. जहाँ ऐसा कुछ पता नहीं है…। वहाँ खोदने और खोजने की कोशिश कर पैरों के नीचे ज़मीन लाने की पुरजोर कोशिश है….। बेनाम रहने से डर लगता है मर्दों को…, उन्हें पहचान चाहिए… अपने लिए… औरतों के लिए उस पहचान का संघर्ष और इच्छा उन्हें बेमानी लगती है! फरीदा समझती है, जानती है… इसलिए पागलखाने पहुँच जाती है। पागलखाना उसे अपने घर से बेहतर लगता है। पहचान का संकट और पहचान का संघर्ष आपको संग्रह की सभी कहानियों में कमोबेश दिखाई देगा….!

बावली कहानी को देख लीजिए..! संग्रह की पहली ही कहानी है । बावली कहानी में जब आप उतरते हैं तो एकबारगी समझ नहीं पाते कि यह बावली की आत्मकथा है या स्त्री जीवन की त्रासदी और नियति के अंतर्निहित बयान । पर जैसे-जैसे कहानी खुलती है, स्त्री के सनातन दुःख की रेखाएँ दिखाई पड़ने लगती हैं। इस कहानी में तीन दृश्य हैं- पहला नियति का आघात, दूसरा परिवार की एक स्त्री से अपेक्षाएँ और तीसरा स्त्री का अपना द्वंद्व और बलिदान । इन तीनों दृश्यों में सलमा मुख्य किरदार है पर एक और किरदार है-सुहेला, जो अभी मुखर तो नहीं हुआ पर अपने नाम की मौन उपस्थिति से भी एक प्रश्न छोड़ गया है। इसके अलावा इसमें अन्य कई किरदार हैं जिनका चिंतन, चिंता और संवाद- समय, समाज और मनुष्य के भावनात्मक और यथार्थ द्वंद्वों को पाठक के सामने उधेड़ता है।

नायिका सलमा विवाह के सात वर्ष बाद भी माँ नहीं बन पाती है। सास अपनी गोद में अपने बेटे के बच्चे को खिलाने का आनंद लेने की इच्छुक है । वह अपने बेटे और सलमा को, बेटे की दूसरी शादी के लिए राज़ी करती है । शादी की तैयारियों से शादी के बीच तक सलमा के मानसिक द्वंद्व का चित्रण है। शादी हो चुकी है और इस गहमागहमी में अचानक जब वह बेहोश होकर गिरती है तो पता चलता है कि वह माँ बनने वाली है । यह पता चलना पाठक को और सलमा के पति दोनों को हतप्रभ छोड़ जाता है। लेकिन इस अंत के बीच में कहानी जीवन के अनेक सिरे छोड़ती है जिससे किसी स्त्री का जीवन बुनता है..और स्त्री का ही क्यों, कभी कभी पुरुष का भी। सलमा के शौहर की खामोशी में बहुत से प्रश्न हैं…सलमा उसकी दूसरी शादी के लिए राज़ी होती है पर शौहर कैसे राज़ी होता है…? कहानी की माने तो वह अपनी पत्नी से प्रेम करता है पर फिर इस प्रेम से भी आगे, ये अपना नाम चलाने की महत्वाकांक्षा है या माँ की इच्छा का विरोध करने में होने वाले संघर्ष से मुँह चुराने की कोशिश?

यहाँ मुझे एक बात लगती है कि लेखिका इस पात्र के माध्यम से पुरुषों के चरित्र के एक अन्य ऐसे पहलू को दिखाने में सफल रही हैं जहाँ वे निर्णय न ले सकने की अक्षमता और अपनी इच्छा व प्रेम के मध्य के द्वन्द्व को खामोशी की चादर उढ़ा गुज़र जाने देते हैं और यथास्थिति को स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि अन्ततः उन्हें तो कोई फर्क पड़ता नहीं, उनका तो स्थान बदलता नहीं, उनका तो भविष्य असुरक्षित होता नहीं… वैसे भी उन्हें यह पता है कि परिस्थिति विपरीत होने की स्थिति में पत्नी की दूसरी शादी तो होनी नहीं…! ये पारंपरिक पुरुष हैं। इन्हें परंपरा प्यारी है क्योंकि परंपरा इन्हें सुरक्षित रखती है। तर्क से दूर रखती है… इसमें बहुत से प्रश्न हैं… यदि कुरेदे जाएँ! सलमा का मानसिक द्वंद्व इस प्रश्न को पूछता है.., किंतु नाम चलाने का शगल और लोभ तो पितृसत्ता और पुरुषों का है। स्त्री का तो कोई नाम नहीं, कोई घर नहीं….यह बहुत ही स्पष्ट रूप से कहानी में निकलकर आया है।

कहानी के अन्य पात्रों में हैं – सलमा की बहनें, जो शादी के बाद अपने गरीब मायके से हर बार कुछ दहेज की उम्मीद करती हैं और ले भी जाती हैं। माँ कहती है- “जितना हो सकता है, बहनों के साथ कर देने में कुछ हर्ज नहीं । उलटा लड़कियों की साख ससुराल में जमी रहती है। मियाँ भी दबता है कि लड़की के घर वाले ऐरे गैरे नत्थू खैरे नहीं हैं ।” ये जो पूरी सोच है, ये स्त्री को हमेशा दोयम दर्जे़ पर रखती है और बेटी के परिवार का स्थान नीचा करती है…। ये भय और असुरक्षा बेटी और उसके परिवार वालों में भरा रहता है और उसे निचोड़ता रहता है….। बहुत सहज तरीके से एक छोटे से संवाद में ये पूरी बात निकलकर आ जाती है।

तीसरी घटना है, बेटे की मौत और मकान के चले जाने के बाद बेसहारा माँ-बेटी का खाला के घर में शरण लेना । वहाँ भी खाला की अपेक्षाएँ तथा सलमा और उसकी माँ के समझौतों में स्त्री की स्थिति और दुनिया में गरीबी और बदहाली, उसके संघर्ष और कहे अनकहे भयों से संचालित जीवन बहुत स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यह निश्चित रूप से केवल किसी दौर की बात नहीं है। यह उन मानकों की कथा है जो हमने सदियों से बना रखे हैं और जो इंसान से उसकी मर्ज़ी का जीवन जीने का हक़ छीनते हैं।

औरत के लिए बावली उपमान… बेहद अलग सा है। दोनों के चरित्र के साम्य को उनकी उपयोगिता से बहुत सुंदर तरीके से दर्शाया गया है और यही इस कहानी का सौंदर्य है कि शुरू में आप समझ ही नहीं पाते कि यह किसी स्त्री की कहानी है…और किसी पर्दे के पीछे औचक सी सलमा निकल के आती है तो पता चलता है कि ओह ! अभी तक आप किसी उपमान में अटके थे। बावली अपने दोनों अर्थों में यहाँ स्त्री की स्थिति के संदर्भ में सार्थक है।

अब इसके उलट कहानी देखिए बंद दरवाज़ा । खानदानी शान पर कुर्बान कर दी जाती है बच्चों की खुशी, यहाँ तक कि ज़िंदगी भी। काज़िम और शबाना के दाम्पत्य जीवन के बरबाद होने और बिछुड़ जाने का कारण उन दोनों के पिताओं के बीच का वैमनस्य है । दोनों बेहद प्रेम करते हैं पर शबाना के पिता उसे ससुराल नहीं भेजते और काज़िम अपने पिता की वजह से उससे मिल नहीं पाता । शादी के दौरान होने वाली कोई छोटी सी ग़लतफहमी और सावधानीवश ओढ़ी गयी ख़ामोशी क्रमशः तैश और आन-बान-शान में बदल जाती है और दो घनिष्ठ खानदानों के बीच उग आयी अहं की तलवार…बचपन की मासूमियत से जवानी तक परवान चढ़े प्रेम को चाक कर देती है। अंतत इस ग़म में न केवल शबाना मरती है, क़ाज़िम की भी स्थिति सही नहीं रह पाती ।

पुरुषों के अहंकार और तथाकथित खानदानी मर्यादा की वेदी पर कुर्बान होने वाली औरतों और औलादों की एक लंबी फेहरिस्त है। अहंकार हो या हिच..इस बेबसी की सान पर इंसानों को बलिदान करने में ये तथाकथित खानदानों के नुमाइंदे ज़रा भी नहीं हिचकते बल्कि फ़ख्र महसूस करते हैं । नौशाबा के इसी सवाल के उत्तर में मीर साहब फरमाते हैं- “जब तक मैं ज़िंदा हूँ बीबी, खानदानी तौर तरीकों में तब्दीली नहीं आ सकती और इसके लिए कुर्बानी तो देनी ही पड़ती है।” माने कुल जमा बात यह कि वो खानदान जो इंसानों ने बनाए और बढ़ाए हैं, वही खानदान अब इंसानों की कद्र करना भूल गए…परंपराएँ इतनी ही क्रूर होती हैं।

और इस सो कॉल्ड समाज की यह परंपरा अनपेक्षित नहीं कि दुश्मनी और अहंकार की यह तलवार शबाना की मौत के साथ ही गिर जाती है और रईस मिर्ज़ा जाकर मीर साहब को गले लगा लेते हैं- “मौत तो दुश्मन की भी हो तो भी उसमें शरीक होना चाहिए और यह तो…!” अचानक रईस मिर्ज़ा को याद आ जाता है कि शबाना और उसका परिवार उसके रिश्तेदार है।
यह अकेली घटना नहीं है… रोज़ होती हैं। जीते जी हम क्रोध, नफरत और इगो पालते हैं और मरते ही महान बनने की जुगत में जुट जाते हैं। हम बड़े हिप्पोक्रेट टाइप के लोग हैं। लोक में एक कहावत है, “जियत न दीन्हें कौरा मरे उठाए चैरा!” यह बिल्कुल सटीक बैठती है यहाँ पर । सामाजिक व्यवस्था के कट्टरपन की यह व्यवस्था मनुष्य को मनुष्य होने से ज़्यादा केवल एक रस्म बनाकर क्यों छोड़ देती है? कहानी यह सवाल छोड़ती है।

सरहद के इस पार कहानी भी कमोबेश इसी रंग की है । बस यहाँ पर मुद्दा अहं न होकर जाति है- “सैयदों की लड़की शेखों में नहीं जाएगी । खानदान भी छोटा फिर औसत लोग।” यह केवल एक डॉयलॉग नहीं है। यह संवाद पूरी सामाजिक व्यवस्था का आईना है। खाप पंचायतें यहां भी हैं… रूप अलग है। पर इसमें और भी कहानियाँ हैं । रेहान, जिसे लोग बावला समझते हैं…दरअसल एक ज़हीन युवक है। एम.ए. प्रथम श्रेणी में पास किया। इसी बीच सुरैया बिछुड़ गयी और पीएचडी से उसका जी उचट गया। सुरैया के बिछुड़ने का कारण केवल जाति ही नहीं है, बल्कि बेरोज़गार होना भी है । हिंदू-मुस्लिम फसाद और कर्फ्यू के बीच छत पर खड़े होकर सरकार, सत्ता को गालियाँ देने वाला सो कॉल्ड पागल रेहान एक भी बात ग़लत नहीं कहता…पर कहानी जो, एक बात बहुत शिद्दत से उठाती है कि इस सारी फ्रस्ट्रेशन की जड़ कहाँ है… और यह किस बात और समय पर आकर खत्म होता है? पहला- मुस्लिम समाज का जातीय अहंकार, दूसरा बेरोज़गारी।

तीसरी और बहुत ज़रूरी बात है – वो सारे मैसेज, जो समाज में जा रहे हैं कि आप मुस्लिम हैं और देश नहीं पसंद है तो तुमको पाकिस्तान दे दिया गया है, जाओ । पर अपनी मिट्टी से प्यार करने और विभाजन के बाद भी यहीं रुकने और जीने वाले लोगों के लिए यह गहरी पीड़ा और असुरक्षा की बात है, इसके राजनैतिक संदर्भ अलग हैं। सामाजिक और आर्थिक पक्ष बिल्कुल भिन्न हैं। बावजूद इसके कि शायद आम लोग इस सब पर इतना कान न दें, यह उनको इस देश में पराया महसूस कराने में कोई कसर नहीं छोड़ता । रेहान समझता है, सब घरों से बटोरकर इकबाल का दीवान जलाता है- “जो शायर दिलों को काटने की बात करते हैं, इंसानी रिश्तों को तोड़ने की बात करते हैं, उनका अदब कोयला है, जिसे छूकर हाथ काले हो जाएंगे।” ये बात तो रेहान जैसा कोई दीवाना ही कह सकता है।

निजी और सामाजिक नफ़रत का मेल भी उसके मनुष्य को नहीं मार सका…. पर रेहान को मार दिया जाता है एक हिंदू लड़की की इज़्जत बचाने के अपराध में अपने ही समुदाय के द्वारा। और यह हिंसा केवल मारने तक सीमित नहीं है…कैसे मारा जाता है…यह भी गौर करने की बात है… वही हिंसा…वही जघन्यता… जो आज निर्भया, उन्नाव और हाथरस के मामले खड़े करती है…सोते सैनिकों के सर काट ले जाने को उकसाती है…वही हिंसा और घृणा उस दौर में पनपनी शुरू हो गयी थी…कहानी इन सारे पहलुआंे पर बात करने में समर्थ है।

कातिब कहानी संग्रह की दूसरी कहानियों से जुदा है..हाँ, दर्द वहाँ भी बदस्तूर है बस मुद्दा अलग है, वहाँ व्यावसायिक उत्पीड़न है । समाज में संवेदनशील कहे जाने वाले दानिशमंद एक पूरे भाषाई परिवेश के नुमाइंदे मरती हुई भाषा के पैरोकार,पर वास्तव में निहायत ही संवेदनशून्य हैं। दौर था उर्दू के लिए जीने मरने का, बहसों का…आज भी भाषाई बहसें जारी हैं, पर आज के दौर के कम ही लोग जानते होंगे ‘कातिब’ के बारे में। नई तकनीक, कंप्यूटर, इंटरनेट, ईमेल, मोबाइल, सूक्ष्म संदेशों की बदलती दुनिया ने जैसे भारतीय भाषाओं और संचार के अन्य अनेक पुराने तरीकों को खारिज कर दिया है और उनके हुनरमंदों को जिस तरह रोज़ी-रोटी के संकट में लाकर खड़ा कर दिया है। उर्दू के अवसान के दौर का यही संघर्ष इस कहानी में दिखाई पड़ता है।

कहानी कहीं तिल-तिल कर मरती प्रथाओं पर रौशनी डालती है तो कहीं पर बदलते दौर की ओर इशारा करती है और कहीं निर्मम और मतलबपरस्त सो कॉल्ड बुद्धिजीवी वर्ग का असली चेहरा भी दिखाती है, जिसके पास एक भाषा को बचाने की कवायद के लिए बड़े आयोजन करने, विदेशी मेहमानों को बुला उनकी खातिर तवज्जो में के लिए पर्याप्त समय भी है, धन भी है पर एक गरीब हुनरमंद की मेहनत का मुआवज़ा देने या उसकी ज़रूरत की बात सुनने के लिए उनके पास समय भी नहीं है । भाषा इंसान से बड़ी है… इंसान अदना… भाषा से कमतर… किस दौर में आ गए हैं हम !

अकरम एक कातिब हैं, जो उर्दू में मजमुआ लिखते हैं। उर्दू की लिखाई भी एक हुनर है उस दौर का, एक शान का काम है, एक खानदानी हुनर है जिससे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपना रोज़ी रोज़गार चलाते थे। अकरम एक अपने उसी खानदानी हुनर के बल पर अपनी रोज़ी कमाते हैं। पर दुर्भाग्य यह कि बदलते दौर में यह खानदानी हुनर भी उनके परिवार को चलाने में बहुत मदद नहीं कर पाता।

महत्वाकांक्षी प्रोफेसर, जो अपनी नज़मों का मजमुआ लिखाना चाहते हों या यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग के कार्यक्रम के निमंत्रण, काम के वक़्त तो कातिबों के घर के चक्कर काटते हैं पर काम की क़ीमत चुकाने के समय वे क़ातिबों को दौड़ाते हैं। समय से उनका मूल्य न मिलने से अकरम के घर पर फाकाकशी और बदहाली का मंज़र है, यह मंज़र केवल अकरम का नहीं, कहीं पाठक का भी मनोबल तोड़ता है।

आज के दौर के हिसाब से देखें तो अकरम फ्रीलांसर है । 80 का दशक, वह दशक था जब फ्रीलांसर के काम में व्यावसायिकता ठीक से नहीं आयी थी। हालांकि उस दौर में भी अनेक क्षेत्रों में इस तरह से काम करने वाले थे पर आज के दौर सी व्यावसायिकता नहीं थी। क़ातिबों के लिए भी उनका काम, उनका हुनर था, शान थी, गौरव था। शुद्ध व्यावसायिकता और मुरव्वत में काम की नियमावली न तय करने की सज़ा बार-बार अकरम को मिलती है।

कहानी कहीं इस बात की ओर भी इशारा करती है कि खानदानी हुनर की शान के नाम पर जिन लोगों ने यथार्थ से समझौता कर हुनर और रोज़ी को अलग कर नया मुकाम नहीं बनाया वे इस शोषण का बेरहम शिकार हुए । जिन्होंने बदलते वक्त की थाप को सुना, समझा और सीमाओं को तोड़ा, वे कहीं हुनर और रोज़ी में संतुलन बना दोनों को साधने और लोगों को आईना दिखाने में कामयाब हुए।

कहानी में मोड़ भी है। हिंदी उर्दू को लेकर अकरम और माज़िद मियां के बीच का संवाद और चिंतन काबिले गौर है। उर्दू की हालत और उसे बचाने के लिए जो फिक्र और तकरीर बड़े-बड़े जलसों में होती हैं वह केवल लफ्फाज़ी है, शोषण है, नीयत और समझ नहीं। उर्दू के दुश्मन और हमदर्दों के बीच की खटपट को अखबार में पढ़ने के बाद अकरम का चिंतन दरअसल आम हिंदुस्तानी का चिंतन है। वह सवाल उठाता है और पूछता है-“दौलत जब किसी भी शक्ल में बंटती है तो उसका फैलाव बढ़ता है मगर अपने बागों, अपने खलिहानों, अपने ख़जानों में आग तो दीवाना ही लगा सकता है। यह दीवाने कौन हैं चचा मियाँ ..?” ये बड़ा ज़रूरी सवाल है- ये दीवाने कौन हैं ? आप भी सोचिए, ये दीवाने कौन हैं? चचा मियाँ समझते सब हैं इसलिए कुछ बेज़ारी से कहते हैं “सभ्य होकर हम ज़्यादा शातिर हो गए हैं, क्योंकि हमारा दिमाग़ तालीम हासिल कर चुका है, शिक्षा प्राप्त कर चुका है।”

आखिरी बात इसे और खोलती है “नए फैशन की बातें हैं। अब लोग तालीमयाफ्ता हो गए हैं…इल्म ख़त्म हो चुका है….और यही सारी जद्दोजहद है…”, इसे आज के दौर से ज़रा मिलाकर देखें…चारों ओर कातिब मिल जाएंगे। ताबूत कहानी को देखें। कई स्त्री पात्र हैं। सबकी जुदा कहानियाँ। ख़ातून से सबसे पहले सामना होता है। लोग कहते हैं कि वह कमदिमाग़ किशोरी है…पर उम्र उस पर भी छायी है। ख़ाला बी ने उसे पाला है। ख़ाला बी बहुत कम उम्र की बेवा थीं…उनके शौहर की कई पत्नियां थीं…पत्नियां क्या..पूरा हरम था…”अमीरी की अय्याशी और औरत का जिबह… इसका आपस में बड़ा गहरा नाता है।”

छोटी उम्र की लड़कियां बड़ी उम्र के आदमियों से ब्याह दी जाती हैं और जब उनकी ज़िंदगी शुरू होती है…वे मर चुकी होती हैं… ख़ाला बी वैसी ही औरत हैं। मुश्किल से हाथ में आए ज़मीन के टुकड़े पर कुछ कमरे बनवाकर उन्हें किराये पर चढ़ाकर अपना गुज़ारा कर रही हैं। ज़िंदगी मिली नहीं तो खुदा से लौ लगा जीने का बहाना तलाश कर लिया। तीसरी पात्र है फहमीदा जो पड़ोस के घर में रहती है। पिता की तीन बेटियां, बेटा न होने के ताने सुन-सुन खुद कमाने में लग गयीं। बीड़ी बनाने वाली तीनों बहनों में फहमीदा बड़ी है

जाति और कुनबे के गुरूर की क़ीमत यहाँ फहमीदा ने चुकाई। तीन मुद्दे हैं, बडे़ आम से… कहानी घर घर की… सैयदानी होने, बेटी होने और सुंदर न होने की सज़ा वह काट लेती है। खातून को कोई बड़ी उम्र का आदमी फुसला लेता है। फहमीदा मर जाती है। ख़ाला बी खामोश रह जाती हैं। कहानी में गरीबी से शिकस्त खायी औरतों का अंबार दिखाई पड़ता है। ये वही सामाजिक स्थिति और रवायतें हैं जिन्होंने औरतों को एकदम पीछे छोड़ दिया है। शायद इंसान भी नहीं समझा है। औरतें समझती सब हैं… पर इससे बचने और आगे जाने के सारे रास्ते उन पर बंद हैं। ‘रवायतों’ का ताला खोलने के लिए ‘हिम्मत’ की चाबी उठा नहीं पाती और बस एक-दूसरे के लिए सांत्वना भर बन जिंदगी गुज़ार देती हैं बिना कुछ कहे सुने।

कच्ची दीवारें कहानी का कोण थोड़ा अलग है। ये नीयत की कहानी है। बेऔलाद बुज़ुर्ग दम्पत्ति की संपत्ति पर आँख लगाए रखने वाले एक व्यक्ति की कहानी है। इस तरह के तमाम लोग हैं….दरियागंज, मौलवीगंज और हर शहर के ऐसे कितने पुराने मोहल्लों में ये कहानी फैली हुई मिल जाएगी। इब्ने मियाँ धूर्त और लालची हैं, बाकर अली और सुगरा बेबस। जैसे एक चिड़िया को पकड़ने के लिए बहेलिया दाना डालता है, कहानी में बाकर अली और सुगरा चची को राज़ी करने और उनका मकान हासिल करने के लिए इब्ने मियाँ की वैसी ही चालों से कहानी भरी पड़ी है। तब भी जब वह बाकर अली को चाय पर बैठा रहे हैं, चची के लिए इत्र दे रहे हैं और बीमार बाकर अली की सेवा कर चची को प्रभावित कर रहे हैं।

उनके मन में कहीं रत्ती भर भी यह ख़्याल नहीं है कि वे सेवा के लिए सेवा कर रहे हैं। वह सोद्देश्य सेवा है…सुगरा भी जानती है… इब्ने मियाँ, बाकर अली और इब्ने मियाँ की बीवी भी यह जानती है। अपनी बीमार बेटी की ज़िंदगी की दुहाई दे वह इब्ने को ऐसा करने से रोकती है। इब्ने मियाँ इसी जायदाद के लालच में उन कच्ची दीवारों को बाकर मियाँ और सुगरा के लिए पक्की करा चुके हैं। पर ज़िंदगी एक कच्ची दीवार ही है और पकी हुई उम्र में तो यह पता ही नहीं चलता कि कब गिर जाए। इब्ने के सारे हथकंडों को समझती हुई भी सुगरा जाने कब पिघल जाती है और अपने कच्चे मकान की वसीयत इब्ने मियाँ के नाम कर जाती है। दोनों बुज़ुर्गों के मरने के बाद हारे और झुंझलाए हुए इब्ने मियाँ के लिए यह एक अनपेक्षित तोहफा सा होता है। हालांकि कहानी अंत तक कहीं भी यह स्पष्ट नहीं करती कि क्या उसमें जीवन में थोड़ा प्रेम, दया, उपकार भरने और लोगों के साथ सहृदयता से पेश आने का संदेश है, लेकिन दरअसल यह ज़रूर बोलती है कि चालाकियों से चाहतें अधिक मजबूत होती हैं।

आखिरी ख़त सी संग्रह की आखिरी कहानी सिक्का है। यह कुछ आत्मकथ्य सा है, डायरी सी शैली की कहानी है।
सामाजिक और दुनियावी संघर्षों और मुद्दों से दूर यह एक औरत के अनलहक़ तक पहुँचने की यात्रा है… जिसमें मानवीय रिश्तों के व्यापार हो जाने की शिकायत है और इंसानी जज़्बे के खो जाने की हूक है। औरत और मर्द की ज़हनी कैफ़ियत के फर्क को बहुत स्पष्टता से इसमें कहा गया है । इश्क इस दुनिया की बुनियाद है, तथा आदम और हव्वा के बीच का सारा संघर्ष इसी के बीच का है । मर्द दिमाग़ हैं और औरत दिल…मर्द बाज़ार है…और औरत घर….मर्द पता नहीं कौन है पर औरत कुदरत…। और हव्वा का यह भ्रम टूटने के बाद की दास्तान है यह आत्मकथा… “मैं तो जानती थी कि इंसानी रिश्ते ही खरे सिक्के होते हैं । मगर बाद में पता चला, मर्द की शक्ल में इश्क भी एक खनकता खरा सिक्का होता है।”

मैं देर तक सोचती रही कि इस बात में क्या है ? यह अनर्गल आत्मालाप है या ज़िंदगी के अनुभवों का निचोड़ ? पर इतना ही समझ आया कि यह इश्क मजाज़ी से इश्क हक़ीकी तक की यात्रा की कथा है। यह आत्मकथ्य है उस औरत का जो इश्क़ की समझ रखती है, इश्क करती है… पर उसकी तलाश उसे आदमी तक लाती है… वह भीतर के इश्क को बाहर दूसरे में तलाश करती है। यह आदम और हव्वा के बीच सदियों से घटती पूरी एक अपेक्षाओं और निराशाओं की गाथा की डायरी है, जिसमें इश्क को आदम में तलाश करती हव्वा, तमाम आंतरिक आत्मालाप और अपनी अपेक्षाओं के निराश होने के बाद अनल हक़ यानि अहं ब्रह्मास्मि को स्वीकार कर लेती है और अपने ही भीतर छुप जाती है।

यहीं पर ट्विस्ट है और रस्मी दुनिया का आईना दिखाने वाली अंतिम पंक्ति है जिसमें औरत इसे बाहर ज़ाहिर भी नहीं होने देती कि उसने दुनिया का सच जान लिया है। वह अपने जज़्बातों के साथ अपने भीतर ही जज़्ब हो जाती है। इसकी आखिरी पंक्ति पूरी डायरी के आत्मालाप का निचोड़ है- “दिल के सारे दरवाज़े खिड़कियाँ बंद कर लेती हूँ कि अनलहक़ की आवाज़ को कोई भी मेरे वजूद से उठता न सुन सके।”

कहानी कभी भी कोई एक बात नहीं कहती। वास्तव में कोई भी रचना कोई एक बात नहीं कहती। उसमें अपने पहले, वर्तमान और आने वाले दौर को देखने की खूब ताक़त होती है। ये कहानियाँ हर दौर में दुनिया के किसी न किसी कोने में जिंदा रही हैं…और रहेंगी। ये पात्र बदल-बदल कर आते रहेंगे। इन कहानियों में एक बात जो दिखाई पड़ती है, वह है इनकी भाषा। भाषा में रवानी है। पात्रों के साथ चलती है। डॉयलॉग के साथ ही जो नेपथ्य कथा चलती है, वहाँ एक अजब किस्म की रवानी है। आँखों देखा हाल सा है । पर वह पाठक को बाँधे रखने में समर्थ है। कहीं-कही प्रूफ संबंधी त्रुटियाँ हैं पर ये बहुत कम हैं। इन कहानियों की सफलता मैं इसमें आंकती हूं कि ये संवेदनशील पाठक को अवसाद में घसीट ले जाने में सफल हो सकती हैं, यही इनकी सत्यता और सजीवता की कसौटी है। ये हमारे आपके आस-पास के बदलाव के लिए बेचैन लोगों की कहानियाँ हैं।

अनुजा
अनुजा

गोपालदास ‘नीरज’ के गीतों से लिखने का रूझान शुरू हुआ। छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के रचनाकारों को पढ़ते गुनते अपनी राह बनाने की कोशिश रही। इस तरह 90 के दशक में सक्रिय लेखन व प्रकाशन से जुड़ीं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में फीचर, लेख, कहानियाँ, कविताएं, समीक्षाएं प्रकाशित।