पंखुरी सिन्हा की लंबी कविता, ‘गांधी जयंती पर बापू’

A poem by Pankhuri Sinha

पंखुरी सिन्हा

तुमने सत्याग्रह का हथियार दिया
अहिंसा का बीज मंत्र
न होते तुम तो
भटकते हम निश्चित ही
बंदूकों, बमों, संभवतः
लैंडमाइंस की भी गलियों में
किन्तु तुमने समेटा सब
गर्म दल वालों
उग्र पंथियों को
तुमने रास्ता अपनाया
अनशन का
मौन व्रत का
कि क्यों दुहराते रहे
हम एक ही बात, एक ही मांग
बना दिए जाने पर उपनिवेश भी
कि जैसे कोई मोल नहीं
हमारी कह दी गयी बातों, हमारी आवाज़ का
और कि हम क्यों दें जवाब
उन्हीं चुनिंदा साम्राज्यवादी सवालों का
जिन्हें चुना है आतताइयों ने
कि उनके चुने घेरे से बाहर
न सवाल होगा, न जवाब
कितना ज़रूरी दुहराना इसे
आज के विकट
उत्तर आधुनिक
उत्तर सत्य के युग में!

2

कि जब सीमाओं
अधिकारों, नागरिक गरिमा
स्त्री मर्यादा की लड़ाई
फिर से चरम पर है!
चरम पर स्त्री सुरक्षा का युद्ध
एक सवाल है तुमसे सैद्धांतिक
बापू, तुम सबके अभिभावक समान
राष्ट्र पिता हो
प्रहरी हो
अहिंसा के
सत्य के द्वार पाल
तुमने गढ़ा असहयोग का नारा
तुमने बुलंद की
भारत छोड़ो की आवाज़
फिर हे जन नायक
क्यों था ज़रूरी
तुम्हारे लिए
ब्रह्मचर्य का ऐसा परीक्षण
कि निर्वस्त्र लेटना पड़े
जवान, खूबसूरत
युवतियों के साथ?
क्यों नहीं था पर्याप्त
अपनी पत्नी के साथ
गरिमा मय
ब्रह्मचर्य पालन?
तुम तो विवाहेतर प्रेम
नहीं कर रहे थे न!
क्यों था आवश्यक हमारी बा को

3

हरिजन बस्ती का मैला
साफ़ करने को विवश करना?
स्त्रिवादियाँ तुमसे पूछेंगी
हे गुरुवर!
यह कैसा आदर्श है
राम राज्य का?
गृहस्थाश्रम की भी क्या यही मर्यादा?
वे कह रहीं हैं तुम्हें
‘बैड हसबंड, बैड फादर’
और मैं सहमत
आदरणीय बापू
तुम क्यों थे ऐसे विचित्र
अपने जीवन में?
क्या दो स्त्रियों के कन्धों पर
हाथ रख जाना प्रार्थना सभा में
स्त्री सशक्तिकरण का तुम्हारा
पर्याप्त दर्शन था?
क्या सत्य नहीं कि शायद
नागपुर की रेल यात्रा में
बेटे तुम्हारे, देवदास
या हरिदास
लेकर आये थे मुसम्बी
केवल बा के लिए
पूछा था तुमने
“क्या मेरे लिए नहीं?”
और मिला था उत्तर
“लाया तो बा के लिए ही हूँ”
सच, हाँ और ना में

4

नहीं मिलता जवाब
किन्तु, महानता तुम्हारी है
हे लोक नायक
कि तुमसे किया जा सकता है सवाल!
शास्त्रार्थ भी
तुम्हारी परंपरा में होना
उदारवादी होना है
निरंकुशता का विरोधी
आज़ाद किन्तु
उत्श्रृंखल नहीं
सदा, अन्याय का विरोधी!
हत्यारे तुम्हारे कायर थे
दब्बू, डरपोक
बोल नहीं सके क्रांति की भाषा वे
हे सहिष्णुता के संस्थापक!
तुम्हें नमन है
सादर प्रणाम हर रोज़
विचार मंथन का खुला आँगन बने
तुम्हारा देश
अहिंसा की पूजा हो जहाँ
ऐसा विचार वान देश!
हे साबरमती के संत!

पंखुरी सिन्हा। दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, 5 हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह। कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का 2016 का पहला पुरस्कार, मथुरा कुमार गुंजन स्मृति पुरस्कार 2019, प्रतिलिपि कविता सम्मान 2018, राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013, 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान। अंग्रेजी लेखन के लिए रूस, रोमानिया, इटली और नाइजीरिया द्वारा सम्मानित। कविताओं का मराठी, पंजाबी, बांग्ला, तेलुगु, बोडो, जर्मन, सर्बियन, रोमानियन, स्पेनिश, चेक, फ्रेंच, हिब्रू, यूक्रेनी, अरबी, उर्दू, तुर्की, उज़्बेक और नेपाली में अनुवाद हो चुका है।