पंखुरी सिन्हा की कविता ‘खजूर का पेड़ और नशे से मुक्ति’

pankhuri sinha poem
Pankhuri Sinha Kavita

पंखुरी सिन्हा

अब जरा देकर आता हूँ
बकरी को अपनी घास
कहते थे गाँधी, बड़े लाट साहबो से
अंग्रेज़ हुक्मरानों से
और टहल आते थे
सत्ता निर्धारित करती
एक राजकीय सभा को
कुछ देर छोड़ कर!

यह जुड़ाव था अपने परिवेश से
संवेदना आसपास के जीवों के लिए
और संवेदना को बचाने, हिंसा की आग बुझाने के लिए, कई सिद्धांत
गढ़े गाँधी ने!

निरामिष भोजन, नशे से मुक्ति
नीरा का सेवन! जीवन में करुणा
सहानुभूति का प्रत्यारोपण!
स्व का नियंत्रण! पुराने आदर्श!
किन्तु नीरा आविष्कार उनका!

सूरज की पहली किरण के लगने से पहले, निकाला खजूर का रस!

वह पेड़ जो गाँव के हर मोड़ पर
खड़ा होता है, बनकर एक मित्र
हरीतिमा का प्रहरी
जो बच्चों के चित्रों में आता है
सबसे पहले! जिसके लगातार
निकलते पत्तों की नाक तले से
पुराने पत्ते, गट्ठर बना सर पर ले जाती हैं,
गाँव की स्त्रियाँ, जलावन में जलाने के लिए,
जिसके नारंगी फलों का गुच्छा,
फूलों से भी अधिक चमकता है!

गाँव भर के बच्चे
जिसपर लपकते हैं, और देखते हैं
पेड़ की छिली हुई सफ़ेद गर्दन पर
सतत लटका, आहिस्ता टपकती
खमीर उठाती, मादक बनती
नशीली होती ताड़ी का मटका!

वह जिसे पीकर धुत्त हो जाते हैं
उनके पिता, चाचा, ताऊ
अभिभावक, पुरुष गाँव भर के
पीटते हैं, बेतहाशे घर भर को
खासकर माओं को!

एक पेय निकास बन जाता है
उनके भीतर के सारे आक्रोश का!

शहरों, कस्बों की गलियों में
मुड़ जायें कहीं भी
मिल जाएगा, ऐसा कोई दृश्य
या फिर लाल आँखे लिये
दिन भर ताश खेलते
मुहल्ले भर के निट्ठल्ले!

जिन्हें शराब बंदी के बाद भी
कहीं न कहीं से मिल जाती है
वह नशीली ताड़ी, जिसके बाद
भूल जाती है यह सारी दुनिया
सब ज़मीनी दुश्वारियों, परेशानियों से
ऊपर उठ जाती हैं नशे में उनकी इंद्रियाँ!

कभी कभी ज़हरीली भी हो जाती है
चोरी छिपे आई , या खुलेआम सस्ती बिकती यह शराब! और लेती है जानें
अपने प्रेमियों की! या बना देती है उन्हें ज़िन्दगी भर के लिए अपाहिज!

बड़ी बारीक रेखा होती है
टपकते हुए महुये और
उसकी मादक सुरा के बीच!

बड़ी आसानी से लौटा जा सकता है
फलों के साथ साथ, होश मन्दी की इस दुनिया में, उसकी सारी असलियत, खराश भरी लेकिन
ताज़ी हवा में, पकड़ कर अपने अपनों का हाथ!

आईए दोस्तों, एक नई मुहिम
एक नई पहल का आगाज़ करें
बढ़ाएँ अपना हाथ, एक दूसरे कीऊ ओर, रौशनी की ओर
खूबसूरत है यह दुनिया
अपनी चुनौतियों के साथ भी!

यों भी सीमित हमारा समय यहाँ
सार्थक बनाएं हर पल यहाँ!

युवा लेखिका पंखुरी सिन्हा के दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, पांच हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कई संग्रहों में रचनाएं संकलित हैं। कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का 2016 का पहला पुरस्कार, कुमुद टिक्कू कथा पुरस्कार 2020, मथुरा कुमार गुंजन स्मृति पुरस्कार 2019, प्रतिलिपि कविता सम्मान 2018, राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013, पहले कहानी संग्रह, ‘कोई भी दिन’ , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान, ‘कोबरा: गॉड ऐट मर्सी’, डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला, ‘एक नया मौन, एक नया उद्घोष’, कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, 1993 में।

अंग्रेजी लेखन के लिए रूस, रोमानिया, इटली, अल्बेनिया और नाइजीरिया, द्वारा सम्मानित, जिसमें चेखोव महोत्सव, याल्टा, क्रीमिया में कविता-कहानी दोनो को मिले पुरस्कार, और इटली में प्रेमियो बेसियो स्पैशल जूरी अवार्ड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं! बीते दिनों इटली की एक कविता प्रतियोगिता में चौथे कविता संग्रह ‘ओसिल सुबहें’ की एक कविता द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित। कविताओं का देश और दुनिया की चौबीस से अधिक भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है। हंगरी और बुल्गारिया में राइटर इन रेजीडेंस कार्यक्रमो में चयनित। प्रस्तुत है उनकी नई कविता ‘खजूर का पेड़ और नशे से मुक्ति’।