महादेवी वर्मा और उनका रेखाचित्र संसार

महादेवी वर्मा का रेखाचित्र संसार

साधना वर्मा

महादेवी वर्मा ‘छायावाद’ युग के प्रमुख आलोक स्तम्भों में से एक हैं। प्रसाद, निराला, पंत जैसे कवियों की इस काव्य त्रिवेणी के बीच महादेवी जी ने अपनी रचनाधर्मिता के बल पर न केवल स्त्री प्रतिभा का लोहा मनवाया, वरन् इन कवियों की काव्य सरिता को हिन्दी साहित्य सागर रूपी विविध विधाओं के साथ उनका समन्वय किया है। प्रसाद ने जहाँ मुख्य रूप से काव्य और नाटक लिखा, वहीं पंत का सुकुमार मन कविता में अधिक रमा। निराला ने अपने विद्रोही और प्रगतिशील स्वभाव के कारण साहित्य में भी कविता के अतिरिक्त उपन्यास (प्रभा, निरूपमा, अप्सरा), संस्मरण, लेख तथा संपादकीय आदि लिखे। किंतु पद्य के साथ गद्य का जैसा परिष्कृत, विचारोत्तेजक तथा उत्कृष्ट स्वरूप गद्य की नवीन विधाओं के रूप में महादेवी के यहाँ प्राप्त होता है, वह स्वयं में विलक्षण है।

यों तो हिन्दी गद्य विधाओं का सूत्रपात निबंध, नाटक, उपन्यास, कहानी, जीवनी(कश्मीर कुसुम, बादशाह दर्पण) आलोचना, पत्र-पत्रिकाओं के रूप में भारतेंदु युग में ही हो चुका था। किंतु इनका क्रमिक विकास परवर्ती युग में ही संभव हुआ। हिंदी साहित्यकारों ने अपनी प्रतिभा और तत्कालीन स्थितियों-परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पद्य के समकक्ष इन गद्य विधाओं में रचनाएं कर इन्हें संवर्धित एवं परिपुष्ट किया है। प्रेमचंद ने जहाँ कहानी औऱ उपन्यास के माध्यम से सामाजिक चेतना जगाने का प्रयास किया, तो वहीं ‘निबंध गद्य की कसौटी है’ इस अवधारणा को प्रतिपादित करने वाले रामचंद्र शुक्ल ने निबंध तथा आलोचना को नयी ऊँचाई प्रदान की।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ के संपादन द्वारा जहाँ एक ओर नवीन रचनाकारों को साहित्य लेखन में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित किया, वहीं मैथिलीशरण गुप्त ने ‘खड़ीबोली गद्य’ में काव्य सृजन कर न केवल अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया, बल्कि ‘खड़ीबोली गद्य’ के विषय में प्रचलित उस पारम्परिक भ्रान्ति को भी ध्वस्त किया, जो खड़ीबोली को काव्य रचना के लिए अयोग्य मानते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि गद्य में जहाँ नवीन विधाओं को अत्यधिक विकसित होने का अवसर प्राप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर कविता के लिए भी अपार संभावनाओं के द्वार खुल गए। बहरहाल यहाँ मेरा मन्तव्य महादेवी जी के रेखाचित्रों में रचे-बसे उन तमाम अनुभूतियों में गुंफित कोमल, मधुर स्मृतियों को उजागर करना है, जिसके सहारे लेखिका की जीवन दृष्टि को समझते हुए, उन सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करना है, जहाँ पहुंच कर मनुष्य; मनुष्य के मध्य का भेद समाप्त हो जाता है। शेष रहती है तो असीम करूणा और चरम शांति।

‘रेखाचित्र’ हिन्दी साहित्य की नवीन किंतु आधुनिक गद्य विधाओं में से एक है। प्रत्येक साहित्यिक विधा ‘वस्तु’ और ‘शिल्प’ की दृष्टि से अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। कोई भी विषय किसी विशेष शिल्प के अंतर्गत संप्रेषण की विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता है। इस तरह देखा जाय तो कहा जा सकता है कि चित्रकार की चित्र कला को जो महत्व प्राप्त है वही महत्व रेखाचित्रकार की रचना रेखाचित्र का भी है। वास्तव में रेखाचित्र ‘शब्दचित्र’ है। जिस प्रकार चित्रकार रंगों के अंकन और सौष्ठव द्वारा चित्र का निर्माण कर उसे प्रभावशाली और सजीव बना देता है, ठीक उसी प्रकार रेखाचित्रकार सौष्ठवपूर्ण शब्दों की सहायता से अपनी रचना को स्वरूप प्रदान करता है। इसकी सफलता रचनाकार के भाषागत वैशिष्ट्य तथा जीवनानुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति पर आधारित है। हिन्दी साहित्य में जब इस विधा का पहलेपहल पदार्पण हुआ, तो इसकी परिभाषा भी स्वभावतः इसके साथ ही निर्मित हुई। “स्केच की तरह ही रेखाचित्र में भी कम से कम शब्दों में कलात्मक ढंग से किसी वस्तु, व्यक्ति या दृश्य का अंकन किया जाता है। इसमें साधन शब्द होते हैं रेखाएं नहीं”

रेखाचित्र में अनेक साहित्यिक विधाओं की तरंगे उठती रहती हैं। इसमें कहानी का कौतुहल है तो, निबंध की गहराई गद्यकाव्य की भावात्मक लयात्मकता है तो, डायरी में व्यक्त निश्छल मन की अभिव्यक्ति। संस्मरण की व्यक्तिकता है तो, साक्षात्कार का खुलापन। आत्मकथा और जीवनी जैसी आत्मीयता और बेबाकीपन है तो, यात्रावृत्तांत का सीमित विस्तार। व्यंग की छेड़छाड़ है तो, रिपोर्ताज की गुनगुनाहट। विभिन्न साहित्यिक रसों में सराबोर यह रेखाएं अंगड़ाई लेती हुई विशिष्ट शब्द चित्रों में ढल कर एक ऐसा संसार रचती हैं, जिसमें रहने वाले लोग हमारे इसी लोक के प्राणी हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो रेखाचित्र विभिन्न विधाओं की विशेषताओं का विचित्र समुच्चय है। लेकिन सबसे अधिक रेखाचित्र का साम्य संस्मरण के साथ माना जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि लगभग समस्त विधाओं की विशेषताओं को अपने में समेटे हुए रेखाचित्र की अपनी विशेषता औऱ अपनी पहचान है। अतिशय संवेदना, विषय संबंधी एकात्मकता, अंतर्मुखी चारित्रिक विशेषता, विश्वसनीयता, सूक्ष्म परिवेक्षण शक्ति, संक्षिप्तता तथा प्रतीकात्मकता आदि इसकी विशेषताएं मानी जा सकती हैं। यद्यपि यह कथेत्तर गद्य विधाओं मे नवीन विधा है और हिन्दी साहित्य में विधा के रूप में प्रतिष्ठित भी हो चुकी है। लेकिन क्या कारण है कि विद्वानों की दृष्टि से रेखाचित्र का सैद्धान्तिक विवेचन ओझल ही रहा? दूसरे शब्दों में कहें तो रचनात्मक रूप में तो इस विधा को जितनी महत्ता और स्वीकारोक्ति मिली, उतने ही इसके शास्त्रीय स्वरूप की अवहेलना हुई। अतः रेखाचित्र का स्वरूप निर्धारण सरल नहीं है। इसके स्वरूप एवं वैशिष्ट्य को प्रतिस्थापित करने के लिए हमारी दृष्टि में रेखाचित्र लेखकों की रचनाओं का आधार ग्रहण किया जाना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।

‘अतीत के चलचित्र’(1941) की भूमिका में महादेवी जी ने लिखा है “इन स्मृति चित्रों में मेरा जीवन भी आ गया है स्वाभाविक भी था। अंधेरे की वस्तुओं को हम अपने प्रकाश में धुंधली या उजली परिधि मे ही लाकर देख पाते हैं। उसके बाहर हों फिर वे अनन्त अंधकार के अंश हैं। मेरे जीवन की परिधि के भीतर खड़े होकर चरित्र जैसे परिचय दे पाते हैं। वह बाहर रूपांतरित हो जाएगा। जिस परिचय के लिए कहानीकार अपने कल्पित पात्रों को वास्तविकता से सजा कर निकट लाता है उसी परिचय के लिए मैं अपने पथ के साथियों को कल्पना का परिधान पहनाकर दूरी की दृष्टि क्यों करती? परंतु मेरा निकटताजनित आत्मविज्ञापन उस राख से महत्व नहीं रखता, जो आग को बहुत अधिक सजीव रखने के लिए अंगारों को घेरे रहती है। जो इसके पार नहीं देख पाता वह इन चित्रों के हृदय तक नहीं पहुंच पाता”

लेखिका की इस विज्ञप्ति में जहाँ एक ओर स्मृतियों का सहेजना, आत्मीयता, कल्पनाशीलता, संवेद्य दृष्टि तथा वैचारिक सौद्देश्यता जैसी विशेषताओं का प्रकटीकरण हुआ है, वहीं दूसरी ओर रेखाचित्र जैसी नवीन विधा के रचना प्रक्रिया को भी उद्घाटित किया गया है। यह न तो संपूर्णतः कहानी होती है और न ही किसी पात्र का संपूर्ण जीवन वृत्त। कहानी की तरह रोचक और कौतुहल प्रधान होते हुए भी रेखाचित्र मुक्तक के समान स्वतंत्र तथा पूर्ण है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने भी ‘माटी की मूरतें’ नामक रेखाचित्र में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए लिखा है “हजारीबाग की सेन्ट्रल जेल में एकान्त जीवन में अचानक मेरे गाँव और मेरे ननिहाल के कुछ ऐसे लोगों की मूरतें मेरी आँखों के सामने आकर नाचने और मेरी कलम से चित्रण की याचना करने लगीं। उनकी इस याचना में कुछ ऐसा जोर था कि अंततः यह माटी की मूरतें तैयार होकर रही।”

इन दोनों रेखाचित्रकारों के वक्तव्य से दो बातें उभर कर सामने आती हैं। पहला रेखाचित्र की आधार भूमि वायवीय अथवा काल्पनिक न होकर पूर्णतः जीवन के यथार्थ से उपजी जीवन सत्य की प्रामाणिक खोज है। दूसरा रेखाचित्र की संरचना का मूल उस व्यक्ति या वस्तु विशेष के प्रति रचनाकार का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उसका घनिष्ट एवं आत्मीय लगाव है।

हिन्दी साहित्य में सन् 1929 में पद्म सिंह शर्मा का ‘पद्मपराग’ नाम से पहला रेखाचित्र हमारे सामने आता है। इसके पश्चात हम देखते हैं कि हिन्दी में रेखाचित्र लेखन की एक सुदीर्घ परम्परा हमारे सामने उभर कर आती है, जिसके अंतर्गत श्रीराम शर्मा कृत ‘बोलती प्रतिमा’ (1937), महादेवी वर्मा ‘अतीत के चलचित्र’ (1941), ‘स्मृति की रेखाएं’ (1947), रामबृक्ष बेनीपुरी ‘माटी की मूरतें’ (1946), ‘गेहूँ और गुलाब’, (1950), कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ‘दीप जले शंख बजे’, भदन्त आनंद कौशल्यायन ‘जो न भूल सका’ (1945), देवेन्द्र सत्यार्थी ‘रेखाएं बोल उठी’ (1949), सत्यवती मलिक ‘अमिट रेखाएं’(1951), बनारसीदास चतुर्वेदी ‘रेखाचित्र’ (1952), विनयमोहन शर्मा ‘रेखा और रंग’ (1955), प्रेमनारायण टंडन ‘रेखाचित्र’ (1959), जगदीशचंद्र माथुर ‘दस तस्वीरें’ (1963), विष्णु प्रभाकर ‘कुछ शब्द कुछ रेखाएं’(1965), कृष्णा सोबती ‘हमहश्मत’(1977), रामविलास शर्मा ‘विराम चिन्ह’ (1985) आदि रचनाकारों ने रेखाचित्र विधा को अपने साहित्य लेखन का माध्यम बनाया। स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि में जहाँ एक ओर साहित्यकारों ने कहानी, उपन्यास तथा कविता में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का अंकन किया, वहीं दूसरी ओर इन रेखाचित्रकारों ने समाज के दबे-कुचले उपेक्षित जन की पीड़ा का शब्दचित्र खींच कर उनकी सदियों से दबी वाणी को स्वर प्रदान किया है।

इस दृष्टि से हिंदी साहित्य में महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों का अन्यतम स्थान हैं। ‘अतीत के चलचित्र’ (1941) तथा ‘स्मृति की रेखाएं’ (1947) इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। अतीत के चलचित्र में लेखिका हमारा परिचय ‘रामा’, ‘भाभी’, ‘बिन्दा’, ‘सबिया’, ‘बिट्टो’, ‘बालिका’, ‘घीसा’, ‘अभागी स्त्री’, ‘अलोपी’, ‘बदलु’ समेत कुल ग्यारह चरित्रों से करवाती हैं। इन सभी चरित्रों का संबंध कहीं न कहीं रचनाकार के जीवन से अवश्यमेव रहा है। अतः इनमें स्पष्ट रूप से उनके अपने जीवन की विविध घटनाओं तथा चरित्रों के विविध पहलुओं का प्रत्यारोपण अनायास ही हो गया है। महादेवी जी के रेखाचित्रों की यह विशेषता है कि उनमें चरित्र चित्रण के तत्व की प्रधानता रहती है और कथ्य उसका अंश भर है। सेवक रामा का वात्सल्यपूर्ण सेवा भाव, दलित सबिया का पति-परायणता तथा सहनशील स्वभाव, घीसा की निश्छल गुरुभक्ति, साग-भाजी बेचने वाले दृष्टिहीन अलोपी का सरल व्यक्तित्व, बदलु कुम्हार औऱ उसकी पत्नी रबिया का दाम्पत्य प्रेम तथा पहाड़ी लछमा का लेखिका के प्रति अनुपम प्रेम। इन सभी प्रसंगों में समाविष्ट यह सभी चरित्र महादेवी की तुलिका का संस्पर्श पाकर अपने समूचे अस्तित्व में जीवन्त हो उठे हैं। एक उदाहरण दृष्टव्य है-

“रामा के संकीर्ण माथे पर खूब घनी भौंए और छोटी-छोटी स्नेह तरल आँखें कभी-कभी स्मृतिपट पर अंकित हो जाती हैं और कभी धुंधली होते-होते एकदम खो जाती हैं। किसी थके झुंझलाए शिल्पि की अंतिम भूल जैसी अनगढ़ मोटी नाक, साँस के प्रवाह से फैले हुए से नथुने, मुक्त हँसी से भर कर फूले हुए होंठ तथा काले पत्थर की प्याली में दही की याद दिलाने वाली सघन और सफेद दंत पंक्ति के सम्बन्ध में यही सत्य है।”

इतने कम शब्दों में लेखिका ने रामा का जो शब्दचित्र उकेरा है वह किसी भित्ति पट पर खींची गई रेखाओं के बीच छिपे हुए अदृश्य चित्रों के रूप में हमारे समक्ष साकार हो उठा है। रचनाकार ने जिन धुंधली स्मृतियों के आधार पर अमिट रेखाओं द्वारा अत्यन्त सहृदयता के साथ इन समस्त चरित्रों के जीवन के विविध रूपों को चित्रित कर उन्हें अमर बना दिया है।

महादेवी जी मूलतः कवयित्री हैं, परंतु उन्होंने गद्य में भी श्रेष्ठ लेखन किया है। उल्लेखनीय यह है कि हिन्दी साहित्य में उनके रेखाचित्र विषय वैविध्य और कलात्मकता की दृष्टि से जिस शिखर पर अवस्थित हैं उन तक पहुंच पाना साधारण बात नहीं। एक महादेवी जी ही हैं, जिन्होंने गद्य में भी कविता जैसी अनुभूति कराई और ‘गद्यं कविता निकषं वदन्ति’ की उक्ति को चरितार्थ किया। स्मृति की रेखाएं में निरन्तर संवेदनशील एवं सामाजिक सरोकारों के प्रति अत्यन्त सचेत लेखिका ने अपनी स्मृतियों में कैद समाज के हाशिये पर रहने वाले लोगों को अपनी लेखनी द्वारा मूर्तिमान कर दिया है। वृद्ध ‘भक्तिन’ की प्रगल्भता तथा स्वामी-भक्ति, ‘चीनी युवक’ की करूण एवं हृदय- स्पर्शीय जीवन गाथा, पर्वत के कुली ‘जंगबहादुर’ की कर्मठता, ‘मुन्नु’, ‘ठकुरी बाबा’, ‘बिबिया’ तथा ‘गुँगिया’ जैसे चरित्रों की मर्मस्पर्शी जीवन-झाँकियाँ पाठक को अभिभूत कर देने में सक्षम हैं।

“छोटे कद औऱ दुबले शरीरवाली भक्तिन अपने पतले ओठों के कानों में दृढ़ संकल्प और छोटी आँखों में एक विचित्र समझदारी लेकर जिस दिन पहले-पहले मेरे पास आ उपस्थित हुई थी तब से आज तक एक युग का समय बीत चुका है। पर कोई जिज्ञासु उससे इस संबंध में प्रश्न कर बैठता है, तब वह पलकों को आधी पुतलियों तक गिराकर औऱ चिन्तन की मुद्रा में ठुड्ढी को कुछ ऊपर उठाकर विश्वास भरे कंठ से उत्तर देती है—‘तुम पचै का का बताई –यहै पचास बरिस से संग रहित है।‘ इस हिसाब से मैं पचहत्तर की ठहरती हूँ और वह सौ वर्ष की आयु भी पार कर जाती है, इसका भक्तिन को पता नहीं।”

महादेवी जी के कविताओं का संसार जितना वैयक्तिक वेदनाओं के कोमल तंतुओं से बुना गया है, जिसके क्रन्दन में विश्व कल्याण की शुभेच्छा निहित है। उनकी अंतर्मुखी दृष्टि स्व और पर के भेद को समाप्त कर एक ऐसा विश्व रचना चाहती है, जिसमें कोई भेद-भाव तथा किसी प्रकार की विषमता न हो। स्वयं रचनाकार के शब्दों में “कला के पारस का स्पर्श पा लेने वाले कलाकार के अतिरिक्त कोई नाम नहीं। साधक के अतिरिक्त कोई वर्ग नहीं। सत्य के अतिरिक्त कोई पूंजी नहीं। भाव सौंदर्य के अतिरिक्त कोई व्यापार नहीं और कल्याण के अतिरिक्त कोई लाभ नहीं।” जीवन संग्राम में उन्होंने लेखन को ही अपना हथियार बनाया और एकनिष्ठ होकर अबाध गति से भावमय सृजन और कर्ममय जीवन की साधना से आप्लावित अपने चरित्रों एवं विचारों को सार्थकता प्रदान किया है।

काव्य में इतनी कोमल, करूण तथा वेदना की चिर साधिका प्रतीत होने वाली महादेवी जी अपने गद्य में इतनी विद्रोही और सामाजिक विषमताओं के प्रति आक्रोश से भर उठती हैं, जिसे देख कर अद्भुत आश्चर्य होता है। वे निरन्तर अपने चरित्रों के माध्यम से इन जर्जर सामाजिक व्यवस्थाओं का प्रतिरोध करने को उद्धत रहती हैं। इनके रेखाचित्रों में चित्रित सभी चरित्र समाज की उन ह्रासोन्मुखी विकृतियों का पर्दाफ़ाश करते हुए, हृदयविहीन औऱ भाव शून्य मनुष्य को मनुष्य बनने की सीख दे जाते हैं। जन सामान्य की संवेदना की बेरंग और बेनूर जीवन को अपनी कला की तुलिका फेर कर लेखिका ने उनमें जो रंग भरा है, वह अर्थपूर्ण अनुभूतियों के कारण सर्वकालिक बन गया है।

संदर्भ
  1. महादेवी वर्मा, ‘अतीत के चलचित्र’, भारतीय भंडार लीडर प्रेस, इलाहाबाद, ग्यारहवां संस्करण 1970
  2. महादेवी वर्मा, ‘स्मृति की रेखाएं’, भारतीय भंडार लीडर प्रेस, इलाहाबाद, सोलहवां संस्करण 1983
  3. अनिल कुमार, ‘साहित्य चिन्तनधारा’, के.एल पचौरी प्रकाशन, दिगाज़ियाबाद, प्रथम संस्करण 2012
  4. विश्वनाथ त्रिपाठी, ‘हिंदी साहित्य का सरल इतिहास’, प्रकाशक ओरियन्ट ब्लैकस्वान प्राइवेट-लिमिटेड, दिल्ली, संस्करण 2010
  5. प्रेमशंकर, ‘हिंदी स्वछंदतावादी काव्य’, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण 2002

साधना वर्मा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में शोधार्थी हैं। उनसे lsr.sadhana@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।