जीव-जंतुओं के प्रति करुणा जगाती महादेवी वर्मा की रचना ‘मेरा परिवार’

महादेवी वर्मा की रचना मेरा परिवार

डॉ.चित्रा

आधुनिक युग की प्रमुख कवयित्री के रूप में महादेवी वर्मा का नाम प्रख्यात हैं। अपनी काव्यात्मक प्रतिभा, और दार्शनिक गम्भीरता के लिए आधुनिक हिन्दी कविता में महादेवी वर्मा का नाम उल्लेखनीय है । महादेवी वर्मा छायावाद की एक प्रख्यात कवयित्री हैं । महादेवी वर्मा और छायावाद दो ऐसे नाम है जिन्हें एक- दुसरे से अलग कर पाना मुश्किल है। छायावादी काव्य में अपनी अनुभूति की सूक्ष्मता, करुणा, प्रेम, रहस्यवाद, चिन्तन की गम्भीरता, मानवतावाद, स्वाधीनता की चेतना, आत्मियता, सौन्दर्य-चित्रण, प्रकृति-चित्रण और विद्रोह भाव जैसे तत्वों से सदैव इनकी रचनाओं को रेखांकित किया गया है। इनकी रचनाओं की इन्ही विशेषताओं के कारण महादेवी हिंदी साहित्य जगत में एक विशिष्ट व्यक्तित्व प्राप्त करती हैं।

कवयित्री के रूप में जो ख्याति इन्हें हासिल है वही ख्याति गद्य साहित्य में भी कम नहीं है। फाल्गुन पूर्णिमा (वसन्तोसव) 1907 ई. के दिन जन्मी महादेवी वर्मा उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले से सम्बन्ध रखती है। अपने माता-पिता की पहली संतान ‘महादेवी वर्मा’ का जन्म सभी परिजनों के लिए ख़ुशी का लम्हा था क्युंकि लम्बे समय के बाद घर में किसी कन्या का जन्म हुआ था। छोटी आयु में विवाह हो जाने से इन्होने जीवन में अनेक संकटों का सामना किया परन्तु पति की जल्दी मृत्यु हो जाने के बाद भी इन्होने पुनर्विवाह नहीं किया और अपना सारा जीवन साहित्य साधना को समर्पित कर दिया। मानवीय संवेदनाओं से सराबोर महादेवी वर्मा ने मानव और मानवेत्तर जीवन दोनों ही को गहरी अनुभूति प्रदान की है और इनके कल्याण के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सम्पर्पित कर दिया।

रचनाकार संस्मरण में जीवन की किसी महत्वपूर्ण लम्हे, घटना या जीवन में संपर्क में आये किसी ना भुला देने वाली झांकी को प्रस्तुत करता है। हिंदी साहित्य में संस्मरण लेखकों में पद्म सिंह, कन्हैयालाल मिश्र, रामवृक्ष बेनीपुरी, शांतिप्रिय द्विवेदी, श्री राम शर्मा, धर्मवीर भारती और प्रभाकर माचवे आदि नामों को लिया जाता है परन्तु चाहे संस्मरण लेखन हो या रेखाचित्र महादेवी वर्मा का नाम सर्वोपरि है। इनके संस्मरण और रेखाचित्रों में समाज के उन हशियेग्त विषयों को आधार बनाया गया है जिनकी तरफ ज्यादा किसी का ध्यान कभी नहीं गया। इसलिए इनके द्वारा रचित गद्य साहित्य सभी गद्य साहित्यों में बहुत ही महत्वपूर्ण है।

ये कृतियाँ मानवीय भावज्ञता, संवेदना के साथ-साथ अद्भुत कलात्मक चमत्कार के नमूने हैं। ‘मेरा परिवार’ में सम्मलित पशु-पक्षियों के प्रतिदिन और पल -पल की दिनचर्या के साथ-साथ क्रीड़ा-कौतुक को कवयित्री ने जिस शिल्प से प्रस्तुत किया वह अद्भुत है।

एक संवेदनशील साहित्यकार अपने भीतर एक गहरी संवेदना का अनुभव करता है जिनकी अभिव्यक्ति के लिए वह खुद से ही संघर्ष करना प्रारंभ कर देता है और अभिव्यक्ति के लिए साहित्य के विविधांगों का प्रयोग करना प्रारंभ कर देता है। विषय के अनुसार ही कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध आदि विधाओं का सृजन होता है। इसीलिए महादेवी वर्मा का गद्य उनकी कविता से कम महत्वपूर्ण नहीं। प्रासंगिकता की दृष्टि से उनका गद्य साहित्य भी काव्य के समान ही अर्थवान है क्युंकि उनका गद्य भी उनके संवेदनशील कवि-हृदय से ही सम्भव हुआ है जिनकी पूर्णतः मौलिक एवं स्वतंत्र सत्ता है। संस्मरण और रेखाचित्र जैसी गद्य विधाओ के विकास में महादेवी वर्मा का योगदान सर्वप्रमुख है। वर्मा जी ने अपने गद्य साहित्य में समाज के शोषित और प्रताड़ित तबके को अपने साहित्य का केंद्र बनाकर रचनाएँ की है। महादेवी वर्मा के गद्य साहित्य में मुख्य रूप से शामिल है संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध, संभाषण। संस्मरण के चार संकलन प्रकाशित हुए है जिसमे सर्वप्रथम है ‘अतीत के चलचित्र’ जो 1941 ई. में प्रकाशित हुआ इसके बाद ‘स्मृति की रेखाएं’ जो 1943 ई. में प्रकाशित हुआ, ‘पथ के साथी’ 1956 ई. और ‘मेरा परिवार’ 1971 ई. में प्रकाशित हुआ।

‘मेरा परिवार’ संस्मरण महादेवी वर्मा द्वारा रचित है जिसमें मानवेत्तर प्राणियों की कथा को आधार बनाया गया है। मानवेत्तर प्राणियों के साथ करुणा, प्रेम और आत्मीयता से भरा हुआ यह संस्मरण कई बार पाठकों को अचम्भित कर साहस प्रदान करता है। इस संस्मरण में वर्मा जी ने जीव-जन्तुओं व पशु-पक्षियों के इतने सुंदर पलों को उभारा है उनसे पाठक शुरू से अंत तक जुडाव महसूस करता है। इस संस्मरण में महादेवी वर्मा ने उन सभी जीव-जन्तुओं व् पशु-पक्षियों की यादों को उभारा है जिन्होंने वर्मा जी के जीवन में एक गति प्रदान की, उनके जीवन के साथी बने। इस संस्मरण में संग्रहीत पशु-पक्षी इस प्रकार है- 1. नीलकंठ (मोर), 2. गिल्लू (गिलहरी), 3. सोना (हिरणी), 4. दुर्मुख (खरगोश), 5. गौरा (गाय), 6. नीलू (कुत्ते) और 7. निक्की (नेवले), 8. रोजी (कुतिया) तथा 9. रानी (घोड़ी) । इस कृति में प्रत्येक संस्मरण का अपना अलग महत्व है। प्रत्येक मानवेत्तर प्राणी की अपनी अलग विशेषता, रंगों और लक्षणों का वर्णन किया गया है जिसने प्रत्येक पाठ को अद्भुत बना दिया है। “इस प्रकार सब पशु-पक्षियों के संख्या, रंग, विशेष लक्षण, नाम आदि लिखे गये। उस समय ज्ञात नहीं था कि भविष्य में ऐसे स्मत्यंकन की परम्परा अटूट हो जाऐगी। परन्तु बालक-पन की इसी गद्यात्मक अभिव्यक्ति के बाजू पर मेरे सारे संस्मरण अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित हुए है।”

‘मेरा परिवार’ में सबसे पहला पाठ नीलकण्ठ (मोर) का वर्णन मिलता है जो अपनी सुन्दरता के कारण महादेवी वर्मा को बहुत प्रिय था। महादेवी मोर के दो बच्चों (मोर-मोरनी) को अपने घर लेकर आती है और जाली में रखती है ताकि बाकि के पशु-पक्षी उन्हें कोई हानि ना पंहुचा सके। मोर की विशेषता के कारण लेखिका मोर का नाम नीलकंठ और मोरनी का नाम राधा रखती है। महादेवी का नीलकंठ के प्रति अत्यधिक प्रेम व् स्नेह था, नीलकंठ अपने कठ-काठ के कारण अत्यंत सुन्दर था जिसके कारण वह सभी की आँखों का तारा था। यह कहानी धीरे-धीरे मोर- मोरनी के बड़े होने, उनके शरीर में आ रहे बदलावों का वर्णन और नीलकंठ और राधा के मानवेत्तर परिवार में सम्मिलित होने की कहानी है। इस कथा में राधा और नीलकण्ठ के मेलजोल व् नृत्य आदि का मनोहारी वर्णन किया गया है। फिर एक दिन लेखिका को एक ओर मोरनी दर्दनाक स्थिति में मिलती है तो लेखिका से उसका दर्द देखा नही जाता और वह उसे भी अपने साथ घर ले आती है और उसका नाम कुब्जा रखा जाता है।

कुब्जा धीरे-धीरे नीलकंठ और राधा के बीच दुरी की वजह बनने लगती है क्युंकि कुब्जा भी नीलकंठ के प्रति आकर्षित होने लगती है और उसे राधा का नीलकंठ के पास रहना बिलकुल पसंद नहीं था इसलिए कुब्जा राधा के पंखों और कलगी को नोच कर नष्ट कर देती है। “इस कलह कोलाहल से और उससे भी अधिक राधा की दुरी से बेचारे नीलकंठ की प्रसन्नता का अंत हो गया।” और फिर नीलकंठ राधा की जुदाई सहन नही कर पाता और थोड़े ही दिनों में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। “अंत में तीन-चार मास के उपरांत एक दिन सवेरे जाकर देखा कि नीलकंठ पूँछ-पंख फैलायें धरती पर उसी प्रकार बैठा हुआ है, जैसे खरगोश के बच्चों को पंख में छिपाकर बैठता था। मेरे पुकारने पर भी उसके न उठने पर संदेह हुआ। वास्तव में नीलकंठ मर गया था।” पशु-पक्षियों के माध्यम से महादेवी वर्मा ने उनके बीच उपस्थित संवेदनाओं, प्रेम और अपनेपन का वर्णन किया है।

इस संग्रह का दूसरा पात्र ‘गिल्लू’ नामक गिलहरी है। महादेवी वर्मा की नजर गिल्लू पर तब पड़ती है जब खिड़की के बाहर आंगन में गमले के पीछे कौए गिल्लू पर प्रहार कर रहे थे। यह प्रहार इतना बुरा और इतना बड़ा प्रहार था कि गिल्लू का बच पाना मुश्किल था क्युकी उसके पुरे शारीर पर चोटों के बहुत निशान थे। इतनी क्षतिग्रस्त हालत में मिलने के बाद भी लेखिका हार नहीं मानती और गिल्लू को अपने घर ले आती है। गिल्लू की देख रेख शुरू हो जाती है परिणामस्वरूप गिल्लू धीरे-धीरे ठीक होने लगती है। “कई घंटों के उपचार के उपरांत उसके मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा और आश्वस्त हो गया कि मेरी उंगली अपने दो नन्हें पंजों से पकड़कर नीले काँच के मोतियों जैसी आँखों से इधर-उधर देखने लगा।” गिल्लू की चंचलता के प्रति महादेवी वर्मा का अत्यधिक स्नेह और प्रेम था। गिल्लू भी महादेवी वर्मा से उतने ही स्नेह और प्रेम से हिल-मिल गया था। “मैं जैसे ही खाने को कमरे में पहुंचती, वह खिड़की से निकलकर आंगन की दीवार-बरामदा पार करके मेज पर पहुँच जाता और मेरी थाली में बैठना सीखा, जहाँ बैठकर वह मेरी थाली में से एक-एक चावल उठाकर बड़ी सफाई से खाता रहता”।

लेखिका की अनुपस्थिति में गिल्लू कुछ भी नही खाता था और महादेवी के लौटते ही तुरंत कमरे में खिड़की से प्रवेश कर जाता और लेखिका के उपर कूदने-फुदकने लगता था। चूँकि गिलहरी का जीवनकाल दो वर्षों का ही होता है इसलिए गिल्लू जल्दी ही अपना जीवनकाल पूरा कर सबको अलविदा कहता है “रात में अंत की यातना में भी वह मेरी वही उंगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था। पंजे ठण्डे हो रहे थे परन्तु प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी ओर के जीवन को जगाने के लिए सो गया।” उसकी समाधि उसी जूही की कलि के नीचे बनाई गई जो गिल्लू को बहुत प्रिय थी “सोनजुही की लता के नीचे गिल्लू को समाधि दी गयी। इसलिए भी कि उसे वह लता सबसे अधिक प्रिय थी इसलिए भी कि उस लघुघात का, किसी वासंती दिन, जूही के पीताभ छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास मुझे संतोष देता है।” गिल्लू की कहानी इन्हीं सब घटनाओं के इर्द गिर्द घुमती है। गिल्लू की इस कथा से हमें लेखिका के संवेदशील व् करुणा से भरे हुए हृदय के दर्शन होते है। लेखिका के लिए पशु- पक्षी भी उतने ही महत्वपूर्ण है जितने मानव। इन जीव-जन्तुओं को लेखिका उनकी शैशव अवस्था से लेकर यौवन और फिर जीवन के अंतिम समय तक भी पूरी तरह साथ रहना, उनके सुख-दुःख को समझने के लिए लेखिका बहुत बड़ा हृदय रखती है। अपने जीवन में आये कष्टों का संतोष वह इनके जीवन की क्रिया- कलापों में पाती है।

‘मेरा परिवार’ का तीसरा पात्र ‘सोना’ नामक हिरणी भी महादेवी को अत्यधिक प्रिय थी। किसी परिचित के आग्रह पर महादेवी सोना का पालन पोषण करना प्रारंभ करती है। सोना बहुत छोटी थी जब लेखिका के संपर्क में आई थी। महादेवी उसे बच्चों की तरह पालना शुरू कर देती है “उसका मुख इतना छोटा-सा था कि उसमें शीशी का निपल समाता ही नहीं था उस पर उसे पीना भी नहीं आता था। फिर धीरे-धीरे उसे पीना ही नहीं दूध की बोतल पहचानना भी आ गया।” ‘सोना’ का लेखिका के पैरों में स्नेह से बैठना, साड़ी और चोटी को मुँह में भर लेना ही उसका प्रेम व् स्नेह जताने का तरीका था। इस कथा में लेखिका ने सोना के उछलने-कुदने, दूध पीने, नियत समय पर प्रार्थना के मैदान पहुँचने आदि अन्य घटनाओं को समाविष्ट किया हैं । गर्मियों की छुट्टियों में महादेवी वर्मा की बद्रीनाथ की यात्रा पर जाना और उनके जाने से सोना का बेचैन होंकर मृत्यु को प्राप्त होना बहुत ही दुखदाई घटना थी। “ज्ञात हुआ कि छात्रवास के सन्नाटे और फ्लोर के तथा मेरे अभाव के कारण सोना इतनी अस्थिर हो गई कि इधर-उधर कुछ खोजती-सी व प्राय: कम्पपाउंड से बाहर निकल जाती थी। इतनी बड़ी हिरनी को पालने वाले तो कम थे, परन्तु उसमें खाद्य और स्वाद प्राप्त करने इच्छुक व्यक्तियों का बाहुल्य था। इस आशंका से माली ने उसे मैदान में एक लम्बी रस्सी से बांधना आरंभ कर दिया था।” रस्सी से आजाद होने के लिए एक लम्बी छलांग सोना को मृत्यु की ओर ले जाती है।

इसी संग्रह का अगला मानवेतर पात्र ‘दुर्मुख’ खरगोश है। इस कथा में महादेवी ने ‘दुर्मुख’ के उसके मनमोहक व्यक्तित्व, मिट्टी खोदकर सुरंग बनाने के अतिरिक्त कबूतर, मोर आदि अन्य पशु-पक्षियों पर झपटने का भी उल्लेख किया है । ‘दुर्मुख’ खरगोश में स्थिरता लाने के लिए महादेवी ‘हिमानी’ नामक खरगोश – वधू को उसके साथ रहने की व्यवस्था भी करती है। ‘दुर्मुख’ हिमानी के बच्चों को घायल भी कर देता है। ‘दुर्मुख’ का अंत भी बहुत भयावह होता है। एक साँप के बच्चे द्वारा काटे जाने पर ‘दुर्मुख’ की मृत्यु हो जाती है । ‘मेरा परिवार’ संग्रह का पाँचवाँ पात्र ‘गौरा’ गाय का वर्णन है जिसे एक दुधारू पशु के रूप में दर्शाया गया है। ‘गौरा’ को लेखिका अपनी बहन के घर से लेकर आती है और उसके रंग-रूप को देखते हुए उसका नाम ‘गौरा’ रखा जाता है। “गाय के नेत्रों में हिरन के नेत्रों जैसा चकित विस्मय न होकर एक आत्मीय विश्वास ही रहता है। उस पशु को मनुष्य से यातना ही नहीं, निर्मम मृत्यु तक प्राप्त होती है परन्तु उसकी आँखों के विश्वास का स्थान न विस्मय ले पाता है, न आतंक।”10 यहाँ गौरा को देखकर लेखिका को सोना की स्मृति हो आती है। एक वर्ष के उपरांत ‘गौरा’ माता बनती है और बछड़े को जन्म देती है जिसका नाम लालमणि रखा जाता है। ‘गौरा’ के दूध से सभी पशु-पक्षियों का पेट आराम से भर जाया करता था। ‘गौरा’ की यही विशेषता उसकी मृत्यु का भी कारण बनती है। लेखिका ग्वाले से दूध मंगवाना बंद कर देती है जिससे रुष्ट होकर ग्वाला ‘गौरा’ को गुड में सुई रखकर खिला देता है और धीरे धीरे ‘गौरा’ मृत्यु के करीब पहुँच जाती है। “तब गौरा का मृत्यु से संघर्ष आरंभ हुआ, जिसकी स्मृति मात्र से आज भी मन सिहर उठता है।

डॉक्टर के कहने पर नित्य कई-कई सेर सेब का रस निकाला जाता और नली से गौरा को पिलाया जाता। शक्ति के लिए इंजेक्शन पर इंजेक्शन दिये जाते। गौरा अत्यंत शांति से बाहर और भीतर दोनों ओर की चुभन और पीड़ा सहती थी। केवल कभी-कभी उसकी सुन्दर पर उदास आँखों के कोनों में पानी की दो बूंद झलकने लगती थी।” और एक दिन सुबह चार बजे महादेवी जब ‘गौरा’ को देखने गई तब गौरा ने अपनी आखिरी साँस ली। महादेवी के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी थी बहुत मुश्किल था उनके लिए खुद को संभाल पाना। जिस पशु ने अपने दूध, अपनी आत्मीयता से सबको पाला उसका इस कदर धडाम से जमीन पर गिर पाना एक दुखदाई घटना थी। ‘मेरा परिवार’ का एक ऐसा सदस्य जिसने कभी भी किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया बस केवल अपनी ममता से दूसरों को सराबोर रखा है। लेखिका प्रत्येक पालतू पशु के पार्थिव शारीर को गंगा में बहाकर आती थी परन्तु इस बार उनके लिए यह बहुत ही कठिन पल था।

महादेवी वर्मा की इन्ही विशेषताओं से प्रभावित होकर इलाचन्द्र जोशी लिखते है- “एक साधारण से लघुप्राणी गिल्लू (उनकी गिलहरी का यही नाम है) की उसके मानवेत्तर जीवन के क्षुद्र कोटगत मंच से इस सफाई के साथ मानवीय मंच के व्यापक परिप्रेक्ष में उभारकर उतारा गया है कि साँस को बार- बार रोककर उस नाटक के क्लाइमेक्स की उत्सुकता की पूर्ति के लिए उन्मुख होना पड़ता है। यही जादू इनकी गौरा (गाय), नीलू (कुत्ता), सोना (हिरनी), दुर्मुख (खरगोश) आदि जीवों के जीवन-इतिहास-चित्रण में अम्ष्त-स्पर्श की तरह व्याप्त पाया जाता है।” ‘मेरा परिवार’ का अंतिम में निक्की (नेवले), रोजी (कुतिया) और रानी (घोड़ी) की कथा का वर्णन किया गया है। इस संस्मरण में इन पशुओं की अद्भुत मित्रता का परिचय दिया गया है। जो इन पशुओं में आरंभ से अंत तक परस्पर विद्यमान रहती है । इन संस्मरणों में उस समय की कथा है, जब लेखिका बच्चपन में अपने पिताजी के घर में रहा करती थी और ये तीनों पशु वहीं उनके साथ रहा करते थे।

मेरा परिवार संस्मरण में महादेवी जी ने विशिष्ट मानवेतर प्राणियों के प्रति अपनी जिस सहज, सौहार्द और एकांत आत्मीयता की अभिव्यंजना की है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। इन्होने अपनी कला-कौशल को चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया है जो कि बहुत ही उत्तम है। वर्मा जी की ये कृतियाँ मानवीय भावज्ञता, संवेदना के साथ-साथ अद्भुत कलात्मक चमत्कार के नमूने हैं। मेरा परिवार में सम्मलित पशु-पक्षियों के प्रतिदिन और पल पल की दिनचर्या के साथ-साथ क्रीड़ा-कौतुक को कवयित्री ने जिस शिल्प से प्रस्तुत किया वह अद्भुत है। इन मानवेत्तर प्राणियों ने गद्य-साहित्य में इस तरह से जान डाल दी है कि जो मानव आधारित साहित्य को भी पीछे छोड़ दें और इसका पूरा-पूरा श्रेय लेखिका को ही जाता है। लेखिका के पात्र भले ही मानव न हों, पर वे सब मानवीय संवेदना की सूक्ष्मतर अनुभूति से ओत-प्रोत है। सरल तथा स्पष्ट शैली के माध्यम से लेखिका ने अपने अनुभवों को संस्मरण विधा के माध्यम से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है जो मानवेत्तर प्राणियों के प्रति एक अपनेपन, करुणा, प्रेम और संवेदना का संचार करती है।

लेखिका डॉ.चित्रा वर्तमान में ज्योति विद्यापीठ विश्वविद्यालय, जयपुर में सहायक प्रवक्ता हैं। उनसे chitra.14_singh@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।

संदर्भ

  1. वर्मा महादेवी, मेरा परिवार, आत्मिका, पृष्ठ स.-29
  2. वही, नीलकंठ, पृष्ठ सं-29
  3. वही, पृष्ठ सं-30
  4. वही, गिल्लू, पृष्ठ सं- 34
  5. वही, गिल्लू, पृष्ठ सं-36
  6. वही, पृष्ठ सं-37
  7. वही, पृष्ठ सं-37
  8. वही, सोना, पृष्ठ सं- 43
  9. वही, पृष्ठ सं-49
  10. वही, गौरा, पृष्ठ सं- 64
  11. वही, गौरा, पृष्ठ सं-67
  12. वही, गिल्लू, पृष्ठ सं-10