कविता कादम्बरी : ‘अन्नपूर्णा औरतें’ और अन्य कविताएं

कविता कांदबरी की कविताएं

मेरी अभिव्यक्ति में प्रस्तुत है कविता कादम्बरी की कविताएं। वे इस दौर में हिंदी के कुछ संभावनाशील युवा रचनाकारों में से एक हैं। कविता कादंबरी गया की सेंट्रल यूनीवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

खोई हुई यात्री

रात समंदर की तरह विशाल और गहरी है
और भूखी मछलियाँ है प्रेम
जो नोच नोच खाती हैं मेरी नींद
सपने आंखों के किनारों से फिसली हुई नावें हैं
जो हो जाती हैं चूर

मैं रात की ऊंची लहरों में
टूटी नाव और बिगड़े कुतुबनुमा के साथ
खोई हुई यात्री हूँ

गेंहू और घुन

चौराहे पर
कत्ल कर दिए गए
कुछ निर्दोष लोग

भीड़ ने समवेत कहा
गेहूं के साथ
पिस ही जाता है घुन

किसी एक ने भी ऐतराज नहीं जताया
ऐसी भाषा
ऐसे मुहावरे पर

जिसमें
दोषी, गेहूं का समानार्थी है
क़त्ल पीसने का
और निर्दोष घुन का

और यूँ भूख का समानार्थी
खोजते हुए
मैं डर जाती हूँ
लोकतंत्र के मायने देखकर

रीढ़ की सीढ़ी

अरे!
तुम गिरे!

अपनी आंखों से!
और अटके

कॉलरों पर
जेबों में
आस्तीनों में
कमरबंद में
और जूतों में

चढ़ोगे?
कैसे?
रीढ़ की सीढ़ियां तो
कहीं और टिका रखी हैं

अन्नपूर्णा औरतें

एक औरत
घर में चकला चलाती है
रोटी पकाती है
तुम्हारी भूख मिटाती है

दूसरी औरत
घर में चकला चलाती है
तुम्हारी भूख मिटाती है
रोटी पकाती है

एक अन्नपूर्णा है
तो दूसरी क्यों नहीं?

गिद्ध और गौरैया

गिद्ध उड़ा
आसमान तक पहुँचा
सबने पंख देखा
ताक़त होने की दाद दी

गौरैया उड़ी
आसमान तक पहुंची
सबने जिस्म देखा
हल्के होने की बात की