देवयानी भारद्वाज की ‘खुद मुख्तार औरत’ और अन्य कविताएं

देवयानी भारद्वाज की कविताएं

हिंदी कविता के मौजूदा चलन से थोड़ा देवयानी भारद्वाज की कविताएं बिना लाउड हुए अपनी बात कहती हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए आपको ये महसूस होता है कि ये रचनाएं धीरे-धीरे खुलती हैं और देर तक आपके भीतर ठहरती हैं। देवयानी शिक्षाविद हैं और विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ हिन्दी भाषा के संदर्भ व्यक्ति के रूप में काम करती रही हैं। हाल तक वे अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के साथ जयपुर से भाषा के संदर्भ व्यक्ति के रूप में काम कर रही थीं। वर्तमान में ह्यूमना पीपुल टू पीपुल इंडिया, दिल्ली में वरिष्ठ सामग्री निर्माण विशेषज्ञ के तौर पर काम कर रही हैं। ‘प्रेम भाटिया फ़ेलोशिप’ के तहत युवा पत्रकार के रूप में ‘विकास की असमानता और विस्थापन’ के विषय पर अध्ययन। कविता संग्रह ‘इच्छा नदी के पुल पर’ प्रकाशित हो चुका है, जिसे ‘मेजर दिवजोत कौर चावला सम्मान’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 2016 में राजस्थान पत्रिका कविता पुरस्कार से भी सम्मानित।

खुद मुख्तार औरत

अपने श्रम के पसीने से
रचती हूँ स्वाभिमान का हर एक क्षण

रोज गढ़ती हूँ एक ख़्वाब
सहेजती हूँ उसे
श्रम से क्लांत हथेलियों के बीच
आपके दिए अपमान के नश्तर
अपने सीने में झेलती हूँ
सह जाती हूँ तिल-तिल
हँसती हूँ खिल-खिल

क्षमा करें श्रीमान
मेरा माथा गर्व से उन्नत है
मुझसे न आवाज नीची रखी जाती है
न निगाहें झुकाना आता है मुझे

जो न देखी जाती हो आपसे यह खुद मुख्तार औरत
तो निगाहें फेर लिया कीजिए

उसने सबको क्षमा करना चुना

वह और कर ही क्या सकती थी
उसने सबको क्षमा करना चुना
नहीं सीख सकी थी वह
छोटी-छोटी बातों में छुपे
अन्याय को नज़रंदाज़ करना
उसने सबको क्षमा करना चुना

उनसे सहा तो यह भी नहीं जाएगा
कि उसने क्षमा करना चुना
और कहा
उसने नियति की तरह माना नहीं उनके नियमों को
उसने जब क्षमा किया
तो वह याद दिला रही थी उन्हें
कि अपने मुखौटे के पीछे
वे भी अन्यायी थे
आइने में चेहरा नहीं देखते थे वे
चेहरे से टपकता दर्प देखते थे

वह जब चुनती है उन्हें क्षमा करना
तो न चाहते हुए भी
मलिन हो जाता है आइना
यही बात तो उन्हें मंजूर नहीं होती
वे कहते हैं तुम्हें तो हमेशा ही
आदत रही है शिकायत करने की
जबकि उसने शिकायत करना नहीं
क्षमा करना चुना था

उसके गले में दबी हुई है
बरसों की रुलाई
उसे सांस लेने में दिक्कत होती है अक्सर
वह चुप रहना नहीं
चीखना चाहती है
क्षमा करना नहीं
मांगना चाहती है
अनगिनत सवालों का जवाब
जिस मचान पर वे खड़े हैं
उसकी जड़ों में कितनी दीमक है
उसने अपने कंधे पर टिका रखा है
इस मचान को
यदि वह हटाती है कंधा
गुनहगार कहलाएगी
वह और क्या कर सकती है
उसने सबको क्षमा करना चुना

दोबारा नहीं होता

वह जो छुप गया था
बादलों के पीछे सूरज

दोबारा नहीं निकलता
उसी जगह

वह निकलता है
थोड़ा और तल्ख
धरती कर चुकी होती है
थोड़ा और घूर्णन
दृश्य बदल चुका होता है
चाय की प्याली अब खाली है
सुबह का अखबार
हो चुका बासी

रोज़ाना की सैर
दोबारा नहीं होती
हर दिन
थोड़ा नए मिलते हैं रास्ते
थोड़ा बढ़ता जाता है परिचय
किसी दिन
आप निकल पड़ते हैं खोजने
एक नई पगडंडी
थोड़ा और रोमांच

किसी एक शहर में फिर से जाना
दोबारा जाना नहीं होता
हर बार बदल जाता है
शहर के साथ रिश्ता
पहली बार का अपरिचय
नहीं पाया जा सकता
दोबारा के जाने में
दूसरी बार
एक परिचित शहर से मिलते हैं आप

दोबारा नहीं होता प्रेम
दोबारा का मातृत्व
नहीं होता पहली बार के मातृत्व सा
एक नया जीवन
एक अधिक अनुभवी स्त्री की बाँहों में
अलग होता है नितांत

बची रहे आँखों में
पहली बार की हैरत
बचा रहे नए को जीने का आवेग
बार-बार

दूसरी बार पकड़ना किसी दोस्त का हाथ
दोबारा नहीं होता
हर बार एक नया अर्थ देता है जीवन
हर बार
थोड़े से नए होते हैं हम